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गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

“शिक्षा के सवाल पर जलेगी 13अप्रेल क़ो मशाल”,उदय शंकर शुक्ल

  शिक्षा के सवाल पर एकजुटता: बस्ती में


शिक्षकों का मशाल जुलूस और जागती चेतना

बस्ती जनपद एक बार फिर शिक्षा के प्रश्न पर जागृत हो रहा है। यह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि व्यवस्था से संवाद का वह प्रयास है जिसमें शिक्षक अपने अधिकारों, सम्मान और शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप को लेकर सड़कों पर उतरने को बाध्य हुए हैं। आगामी 13 अप्रैल को प्रस्तावित मशाल जुलूस इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो न केवल बस्ती बल्कि पूरे प्रदेश के शैक्षिक विमर्श को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ के आह्वान पर आयोजित इस कार्यक्रम की तैयारी अब तेज़ हो चुकी है। प्रेस क्लब, बस्ती में आयोजित बैठक में विभिन्न शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में इस आंदोलन को सफल बनाने का संकल्प लिया। इस बैठक का नेतृत्व कर रहे शिक्षक नेता उदय शंकर शुक्ल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह आंदोलन किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि समूचे शिक्षक समाज की सामूहिक पीड़ा और आकांक्षा का प्रतीक है।

मूल प्रश्न है—टेट (टीचर एलिजिबिलिटी टेष्ट )की अनिवार्यता। शिक्षकों का कहना है कि यह व्यवस्था न केवल उनकी नियुक्ति प्रक्रिया को जटिल बनाती है, बल्कि वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों के साथ भी अन्याय करती है। इस संदर्भ में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, नेता प्रतिपक्ष तथा योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजे जा चुके हैं, किंतु अब तक कोई ठोस पहल न होना शिक्षकों के आक्रोश को और प्रबल कर रहा है।बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 13 अप्रैल को मशाल जुलूस प्रेस क्लब, बस्ती से प्रारंभ होकर जिलाधिकारी कार्यालय तक जाएगा, जहां एक ज्ञापन सौंपा जाएगा। यह ज्ञापन केवल एक औपचारिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उन हजारों शिक्षकों की आवाज़ है जो व्यवस्था से न्याय की अपेक्षा रखते हैं। इसके बाद 3 मई को लखनऊ में प्रस्तावित महारैली इस आंदोलन को प्रदेश स्तर पर एक व्यापक स्वरूप देगी।

इस आंदोलन की विशेषता इसकी व्यापकता और समावेशिता है। इसमें विभिन्न संगठनों—प्राथमिक शिक्षक संघ, जूनियर हाई स्कूल शिक्षक संघ, माध्यमिक शिक्षक संघ, अटेवा और अन्य संगठनों—का सक्रिय सहयोग दिखाई दे रहा है। अटेवा के अध्यक्ष तौआब अली, जूनियर हाई स्कूल शिक्षक संघ के अध्यक्ष अम्बिका पाण्डेय, माध्यमिक शिक्षक संघ एकजुट के अध्यक्ष अजय वर्मा, टीएससीटी के अध्यक्ष प्रमोद ओझा तथा प्राथमिक शिक्षक संघ के जिला मंत्री राघवेंद्र प्रताप सिंह जैसे नेताओं ने इसे जनांदोलन का रूप देने का आह्वान किया है।

यहां यह समझना आवश्यक है कि मशाल जुलूस केवल विरोध का प्रतीक नहीं है। भारतीय परंपरा में मशाल ज्ञान, जागरूकता और परिवर्तन का प्रतीक रही है। जब शिक्षक—जो स्वयं समाज के पथप्रदर्शक हैं—मशाल लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो यह एक गहरे संदेश का संप्रेषण करता है कि अब शिक्षा के प्रश्न को टालना संभव नहीं है।टेट की अनिवार्यता पर उठ रहे प्रश्न केवल नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें यह पूछा जा रहा है कि क्या शिक्षा की गुणवत्ता केवल परीक्षाओं और प्रमाणपत्रों से तय होगी, या फिर अनुभव, समर्पण और सामाजिक उत्तरदायित्व भी इसमें समान रूप से महत्वपूर्ण हैं? शिक्षक समाज का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि वर्तमान व्यवस्था में संतुलन की आवश्यकता है, जहां योग्यता का मूल्यांकन हो, लेकिन वह अत्यधिक जटिल और अव्यवहारिक न हो।

इस पूरे घटनाक्रम का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि शिक्षक समाज अब अपने मुद्दों को लेकर अधिक सजग और संगठित हो रहा है। लंबे समय तक बिखरे रहने के बाद अब विभिन्न संगठन एक मंच पर आ रहे हैं, जो लोकतंत्र की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक स्वस्थ संकेत है कि समाज का बौद्धिक वर्ग अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति जागरूक हो रहा है।

बस्ती जैसे अपेक्षाकृत छोटे जनपद से उठी यह आवाज़ प्रदेश और देश स्तर पर गूंजने की क्षमता रखती है। यदि यह आंदोलन शांतिपूर्ण, संगठित और तर्कसंगत बना रहता है, तो यह निश्चित रूप से नीति-निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करेगा। साथ ही, यह अन्य वर्गों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है कि अपने अधिकारों के लिए संगठित और सकारात्मक तरीके से संघर्ष किया जा सकता है।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि 13 अप्रैल का मशाल जुलूस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक विचार का उदय है—एक ऐसा विचार जो शिक्षा को केवल नौकरी का माध्यम नहीं, बल्कि समाज निर्माण का आधार मानता है। यदि इस आंदोलन से संवाद की नई राहें खुलती हैं, तो यह न केवल शिक्षकों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक शुभ संकेत होगा।

इस प्रकार, बस्ती में उठती यह मशाल केवल अंधकार को चुनौती नहीं दे रही, बल्कि एक उज्जवल भविष्य की राह भी प्रकाशित कर रही है—जहां शिक्षा, सम्मान और न्याय का संतुलन स्थापित हो सके।

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