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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

भ्रष्टाचार साउघाट ब्लाक का स्थाई चरित्र,मातहत करेगा जांच?

 “अपने ही मातहत से जाँच—भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की खुली व्यवस्था

बस्ती, संवाददाता 


साऊँघाट विकास खण्ड का यह मामला अब केवल अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक नैतिकता के पतन का प्रत्यक्ष उदाहरण बन चुका है। जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप हों, उसी के अधीन काम करने वाला कर्मचारी यदि जाँच अधिकारी बन जाए—तो यह जाँच नहीं, बल्कि पूर्वनियोजित क्लीन चिट का दस्तावेज़ बन जाती है।यह पूरी प्रक्रिया एक सुनियोजित “सिस्टम” की ओर इशारा करती है—जहाँ भ्रष्टाचार को रोकने के बजाय उसे संरक्षित किया जाता है। एडीओ पंचायत जैसे अधीनस्थ अधिकारी से बीडीओ की जाँच कराना, न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि यह जनता की आँखों में धूल झोंकने जैसा है। यह वही स्थिति है जैसे “चोर से ही चोरी की जाँच कराना”।

तरेता ग्राम पंचायत का प्रकरण दिखाता है कि जैसे ही शिकायत ऊपर तक पहुँची, ब्लॉक स्तर पर हड़बड़ी मच गई। जिला स्तरीय जाँच टीम के पहुँचने से पहले ही ब्लॉक कर्मियों का मौके पर पहुँचना इस बात का संकेत है कि सच को दबाने की तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी थी। शिकायतकर्ता को सूचना न देना—यह कोई भूल नहीं, बल्कि जाँच को प्रभावित करने की सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि— क्या जाँच का उद्देश्य सच सामने लाना है, या कागजों में सब “ठीक” दिखाना?

ग्रामीणों में फैल रही नाराज़गी और अविश्वास यह साफ बता रहा है कि अब ऐसी औपचारिक जाँचों से भरोसा टूट चुका है। यदि प्रशासन वास्तव में पारदर्शिता चाहता है, तो उसे इस तरह की आंतरिक सांठगांठ वाली जाँच प्रणाली को तुरंत समाप्त करना होगा।स्पष्ट है— यह जाँच नहीं, भ्रष्टाचार को वैधता देने का तंत्र बन चुका है।और यदि यही चलता रहा, तो “जाँच” शब्द अपने अर्थ खो देगा और “भ्रष्टाचार” व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन जाएगा।

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