“बस्ती में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पर बड़ा सवाल—कहीं आपकी रिपोर्ट भी बिना हस्ताक्षर की तो नहीं?” - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

बुधवार, 25 मार्च 2026

“बस्ती में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पर बड़ा सवाल—कहीं आपकी रिपोर्ट भी बिना हस्ताक्षर की तो नहीं?”


“बिना हस्ताक्षर की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट! ओझा डायग्नोसिस सेंटर का बड़ा खेल, स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा अवैध धंधा”

बस्ती 


जनपद बस्ती में स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर में संचालित ओझा डायग्नोसिस सेंटर को लेकर जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं बल्कि स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सीधा प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। आरोप है कि इस डायग्नोसिस सेंटर से मरीजों को बिना चिकित्सक के हस्ताक्षर वाली अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट तक जारी की जा रही हैं, जो सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है।चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार किसी भी अल्ट्रासाउंड जांच की रिपोर्ट पर मान्यता प्राप्त रेडियोलॉजिस्ट या संबंधित चिकित्सक के हस्ताक्षर होना अनिवार्य होता है। हस्ताक्षर यह प्रमाणित करते हैं कि जांच विधिवत तरीके से हुई है और रिपोर्ट को विशेषज्ञ ने देखा व सत्यापित किया है। लेकिन यदि रिपोर्ट बिना हस्ताक्षर के दी जा रही है तो यह न केवल गैरकानूनी है, बल्कि मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ भी है। 

सूत्र बताते हैं कि ओझा डायग्नोसिस सेंटर में यह खेल कोई नया नहीं है। काफी समय से यहां जांच और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब सामने आ रही बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। ऐसे में यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं जांच किसी अधिकृत रेडियोलॉजिस्ट की निगरानी में हो ही नहीं रही है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे यह सब कैसे हो रहा है? जनपद में मुख्य चिकित्सा अधिकारी और उनकी टीम नियमित रूप से नर्सिंग होम, पैथोलॉजी और डायग्नोसिस सेंटरों की निगरानी का दावा करती है। इसके बावजूद यदि किसी सेंटर से बिना हस्ताक्षर की रिपोर्ट जारी हो रही है, तो यह प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत दोनों की ओर इशारा करता है।

अल्ट्रासाउंड से जुड़े मामलों में सरकार ने पीसीपीएनडीटी एक्ट (PCPNDT Act) जैसे कड़े कानून लागू किए हैं, जिनका उद्देश्य जांच की प्रक्रिया को पारदर्शी और नियंत्रित रखना है। इस कानून के तहत अल्ट्रासाउंड मशीन के संचालन, रिपोर्टिंग और रिकॉर्ड रखने के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। यदि किसी सेंटर पर इन नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो उसके लाइसेंस को रद्द करने से लेकर कानूनी कार्रवाई तक की जा सकती है।

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ खुला खिलवाड़ है। मरीज अपनी बीमारी का सही निदान पाने के लिए डायग्नोसिस सेंटरों पर भरोसा करते हैं। अगर वही रिपोर्ट संदिग्ध हो जाए तो पूरे इलाज की प्रक्रिया ही गलत दिशा में जा सकती है।इस मामले में स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। लोगों का कहना है कि यदि समय-समय पर कड़ी जांच और निगरानी की जाती, तो इस तरह के आरोप सामने ही नहीं आते। कई बार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होने से ऐसे सेंटरों के हौसले और बढ़ जाते हैं।

अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले और ओझा डायग्नोसिस सेंटर की जांच कराए। यदि जांच में बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट जारी करने का मामला सही पाया जाता है तो संबंधित सेंटर के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।जनपद के जिम्मेदार अधिकारियों के लिए यह एक कड़ी परीक्षा भी है कि वे स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए कितनी गंभीरता से कदम उठाते हैं। क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में थोड़ी सी भी लापरवाही सीधे लोगों के जीवन से जुड़ी होती है।

अब पूरे जनपद की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर आरोप की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा.

.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad