राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001
जब गुरु ब्लैकबोर्ड छोड़कर पोर्टलों, सर्वेक्षणों और सरकारी फाइलों में उलझ जाए, तब शिक्षा का भविष्य कौन सँभालेगा?
भारत को सदियों से "गुरुओं की भूमि" कहा गया है। हमारे यहाँ गुरु को केवल नौकरी करने वाला कर्मचारी नहीं माना गया, बल्कि उसे राष्ट्र के चरित्र का निर्माता, संस्कृति का संवाहक और भविष्य का शिल्पकार समझा गया। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में कहा गया—"गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।"लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या आज का सरकारी अध्यापक वास्तव में शिक्षक रह गया है, या वह सरकार का सबसे सस्ता, सबसे सुविधाजनक और सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला बहुउद्देशीय कर्मचारी बन चुका है?
उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों की स्थिति पर यदि गंभीर दृष्टि डाली जाए तो स्पष्ट दिखाई देता है कि शिक्षक का अधिकांश समय बच्चों को पढ़ाने के बजाय प्रशासनिक कार्यों, पोर्टलों, सर्वेक्षणों और सरकारी अभियानों में व्यतीत हो रहा है। यह केवल शिक्षकों की समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों के भविष्य का प्रश्न है।शिक्षा का अधिकार या शिक्षक के अधिकारों का हनन?शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 की धारा 27 स्पष्ट भावना व्यक्त करती है कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए, सिवाय चुनाव, जनगणना और आपदा राहत जैसे सीमित कार्यों के। इस प्रावधान का उद्देश्य स्पष्ट है—शिक्षक का अधिकतम समय शिक्षण में लगे।न्यायालयों ने भी समय-समय पर यही कहा कि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा जब शिक्षक कक्षा में उपलब्ध रहेगा।किन्तु शिक्षक संगठनों का आरोप है कि व्यवहार में स्थिति इसके विपरीत है।शिक्षक या सरकारी योजनाओं का प्रबंधन अधिकारी?आज अनेक शिक्षक बताते हैं कि उन्हें शिक्षण के अतिरिक्त अनेक प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं, जैसे—DBT सत्यापन,प्रेरणा पोर्टल पर डेटा फीडिंग,UDISE+ अपडेट,ऑनलाइन उपस्थिति,निपुण भारत मूल्यांकन,मिड-डे-मील का संचालन,राशन का हिसाब,छात्रवृत्ति कार्य
यूनिफॉर्म वितरण,बैंक खातों का सत्यापन,आधार सीडिंग,SMC खाते का संचालन,कंपोजिट ग्रांट का व्यय,BLO कार्य,मतदाता सूची संशोधन,घर-घर सर्वे,स्कूल चलो अभियान,पोलियो अभियान,विभिन्न जागरूकता अभियान,रिकॉर्ड संधारण,बैठकों की कार्यवाही,अनेक ऑनलाइन पोर्टलों पर प्रतिदिन रिपोर्टिंग,शिक्षक संगठनों के अनुसार ऐसे कार्यों की संख्या कई स्थानों पर 30 से 50 से अधिक बताई जाती है। यदि यही स्थिति बनी रही तो शिक्षक बच्चों को पढ़ाएगा कब?डिजिटल इंडिया का पूरा भार शिक्षक पर क्यों? डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य कार्य आसान बनाना था।लेकिन अनेक शिक्षकों का कहना है कि वास्तविकता इसके विपरीत है।मोबाइल उनका।इंटरनेट उनका।बिजली उनकी।समय उनका।गलती होने पर जवाबदेही भी उनकी।ऐसे में डिजिटल सुविधा कई बार डिजिटल बोझ बन जाती है।एकल शिक्षक विद्यालयों की सबसे बड़ी त्रासदी,उत्तर प्रदेश में आज भी अनेक विद्यालय ऐसे हैं जहाँ केवल एक शिक्षक कार्यरत है।यदि वही शिक्षक BLO ड्यूटी पर चला जाए...यदि वही जनगणना में भेज दिया जाए...यदि वही सर्वेक्षण में लगा दिया जाए...तो विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने वाला कौन बचेगा?सबसे अधिक नुकसान गरीब, ग्रामीण और वंचित परिवारों के बच्चों का होता है।शिक्षा की गुणवत्ता आखिर सुधरेगी कैसे?सरकार हर वर्ष शिक्षा सुधार की योजनाएँ बनाती है।निपुण भारत...राष्ट्रीय शिक्षा नीति...डिजिटल शिक्षा...स्मार्ट क्लास...लर्निंग आउटकम...लेकिन प्रश्न यह है कि—यदि शिक्षक का आधा समय प्रशासनिक कार्यों में चला जाएगा तो शिक्षा सुधरेगी कैसे?कोई भी शिक्षा व्यवस्था शिक्षक से बड़ी नहीं हो सकती।विद्यालय की आत्मा भवन नहीं...
स्मार्ट बोर्ड नहीं...पोर्टल नहीं...बल्कि शिक्षक होता है।हर विभाग का काम शिक्षक क्यों करे?यदि बैंक का काम है...तो बैंक कर्मचारी करें।यदि सर्वेक्षण का कार्य है...तो अलग सर्वे टीम बने।यदि डेटा एंट्री का कार्य है...तो डेटा ऑपरेटर नियुक्त हों।
यदि जनसंपर्क अभियान है...तो सूचना विभाग कार्य करे।लेकिन हर विभाग की पहली पसंद शिक्षक ही क्यों बन जाता है?
क्या इसलिए कि शिक्षक विरोध कम करता है?क्या इसलिए कि वह सबसे अनुशासित सरकारी कर्मचारी माना जाता है?
या इसलिए कि शिक्षा सबसे कम प्राथमिकता बन चुकी है?सबसे बड़ा नुकसान बच्चों का,शिक्षक की अनुपस्थिति केवल उपस्थिति रजिस्टर में दर्ज नहीं होती।उसकी कीमत एक बच्चा जीवन भर चुकाता है।एक दिन गणित छूट गया...एक सप्ताह विज्ञान छूट गया...एक महीना भाषा कमजोर हो गई...धीरे-धीरे पूरी पीढ़ी सीखने में पीछे रह जाती है।
यही कारण है कि विश्व की विकसित शिक्षा प्रणालियाँ शिक्षक का अधिकतम समय केवल शिक्षण को देती हैं।
गुरु को क्लर्क मत बनाइए आज आवश्यकता शिक्षक और सरकार के बीच संघर्ष की नहीं है।आवश्यकता व्यवस्था के पुनर्गठन की है।यदि सरकार वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहती है तो शिक्षा विभाग से गैर-शैक्षणिक भार क्रमशः कम करना होगा। प्रत्येक प्रशासनिक कार्य के लिए अलग प्रशिक्षित मानव संसाधन विकसित करना होगा।
डिजिटल कार्यों के लिए विद्यालय स्तर पर तकनीकी सहायक उपलब्ध कराने होंगे।एकल शिक्षक विद्यालय समाप्त करने होंगे।शिक्षक के समय का सम्मान करना होगा।
भारत विकसित राष्ट्र तब बनेगा जब उसकी कक्षाएँ मजबूत होंगी।कक्षाएँ तब मजबूत होंगी जब शिक्षक पढ़ा सकेगा।शिक्षक तब पढ़ा सकेगा जब उसे शिक्षक रहने दिया जाएगा।राष्ट्र निर्माण संसद से शुरू नहीं होता।राष्ट्र निर्माण विद्यालय से शुरू होता है।और विद्यालय का प्राण केवल एक है—शिक्षक।यदि हमने शिक्षक को सरकारी योजनाओं का स्थायी कर्मचारी बना दिया,तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।आज समय की सबसे बड़ी माँग है—गुरु के हाथ से फाइल हटाइए, पुस्तक लौटाइए।मोबाइल ऐप का बोझ कम कीजिए, ब्लैकबोर्ड का सम्मान बढ़ाइए।शिक्षक को आदेशों का डाकिया नहीं, ज्ञान का दीपक बनने दीजिए।क्योंकि जिस राष्ट्र में शिक्षक सम्मानित होता है, वहाँ केवल परीक्षा के परिणाम नहीं, बल्कि सभ्यता का भविष्य उज्ज्वल होता है।
— कौटिल्य दृष्टि

अतिविशिष्ट लेख।।
जवाब देंहटाएंसादर प्रणाम निवेदित है।।
आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल।।