जहाँ रावण से कम और सीता से अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

सोमवार, 29 जून 2026

जहाँ रावण से कम और सीता से अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं

 रावण अपराधी, सीता पीड़िता — फिर भी प्रमाण सीता से ही क्यों?

भारतीय समाज के लिए एक आत्ममंथन


"जब अपराधी से कम और पीड़ित से अधिक प्रश्न पूछे जाने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि न्याय की आत्मा घायल हो चुकी है।"भारत की सांस्कृतिक चेतना में माता सीता केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि मर्यादा, त्याग, धैर्य और आत्मसम्मान की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति हैं। फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब अपराधी रावण था, तब अग्निपरीक्षा सीता की क्यों हुई? जब दोष रावण का था, तब प्रमाण सीता से ही क्यों माँगा गया?यह प्रश्न केवल रामायण का नहीं है। यह प्रश्न हर उस युग का है जहाँ अपराधी से अधिक कठघरे में पीड़ित खड़ी कर दी जाती है।

अपराधी कौन था?::रावण ने छल किया। साधु का वेश धारण किया। विश्वास का दुरुपयोग किया। मर्यादा का उल्लंघन किया। एक विवाहित स्त्री का अपहरण किया। उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध बंदी बनाकर रखा।अपराध की दृष्टि से देखें तो अपराधी केवल और केवल रावण था। सीता ने न किसी का अधिकार छीना, न किसी की मर्यादा भंग की। वे तो स्वयं अन्याय की शिकार थीं।फिर भी इतिहास में सबसे अधिक प्रश्न उन्हीं से पूछे गए।

पीड़िता पर संदेह की परंपरा::दुर्भाग्य यह है कि यह मानसिकता आज भी समाप्त नहीं हुई।आज भी यदि किसी महिला के साथ अपराध होता है तो समाज के कुछ लोग सबसे पहले पूछते हैं—कहाँ गई थी?किसके साथ थी?क्या पहन रखा था?देर रात बाहर क्यों थी?विरोध क्यों नहीं किया?अर्थात अपराधी से पहले पीड़िता की परीक्षा।यही मानसिकता हजारों वर्ष पहले भी दिखाई देती है।

अग्निपरीक्षा का वास्तविक अर्थ::रामायण का गंभीर अध्ययन बताता है कि अग्निपरीक्षा को केवल व्यक्तिगत संदेह के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण है। अनेक परंपराएँ इसे तत्कालीन राजधर्म, लोकमत और प्रतीकात्मक शुद्धि से जोड़कर देखती हैं। विभिन्न रामायणों और टीकाओं में इसके अलग-अलग अर्थ मिलते हैं।फिर भी एक सामाजिक प्रश्न बना रहता है—यदि समाज को संतुष्ट करने के लिए पीड़िता को ही प्रमाण देना पड़े, तो यह समाज की कमजोरी है, पीड़िता की नहीं।

समाज का भय::समाज को सत्य से अधिक चर्चा की चिंता रहती है।लोग क्या कहेंगे?लोक क्या बोलेगा?प्रतिष्ठा पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसी भय में अक्सर निर्दोष को स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है।आज भी यही होता है।सोशल मीडिया पर किसी घटना के बाद पीड़ित व्यक्ति से ही सफाई माँगी जाती है।रावण आज भी जीवित है,रावण केवल दस सिर वाला व्यक्ति नहीं था।रावण एक मानसिकता है—शक्ति का अहंकार,स्त्री को वस्तु समझना,छल द्वारा अधिकार प्राप्त करना,सत्ता का दुरुपयोग,ज्ञान होते हुए भी चरित्रहीन होनाजब तक यह मानसिकता जीवित है, तब तक रावण जीवित है।

सीता का उत्तर::सीता ने बार-बार स्वयं को सिद्ध किया।उन्होंने अशोक वाटिका में रावण के सामने झुकने से इंकार किया।उन्होंने ऐश्वर्य नहीं चुना।उन्होंने भय नहीं चुना।उन्होंने आत्मसम्मान चुना। यह उनकी सबसे बड़ी विजय थी।उनकी पवित्रता अग्नि से नहीं, उनके चरित्र से सिद्ध थी।

न्याय का मूल सिद्धांत::सभ्य समाज का नियम होना चाहिए—अपराध सिद्ध करने का दायित्व अपराधी पर हो, पीड़ित पर नहीं।यदि हर पीड़ित को अपनी पीड़ा सिद्ध करनी पड़े, तो न्याय व्यवस्था का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।आधुनिक भारत के लिए संदेशआज आवश्यकता है कि हम अ::पने बच्चों को यह शिक्षा दें—यदि किसी के साथ अन्याय हुआ है, तो सबसे पहले उसके साथ खड़े हों। सबसे पहले अपराधी की जांच करें। सबसे पहले अन्याय करने वाले से प्रश्न करें।पीड़ित को बार-बार कटघरे में खड़ा करना न्याय नहीं, संवेदनहीनता है।

सीता का मौन::सीता ने बहुत कम बोला, पर उनका जीवन स्वयं घोषणा बन गया।उन्होंने सत्ता से बड़ा आत्मसम्मान चुना।उन्होंने राजमहल से बड़ा सत्य चुना।उन्होंने अपमान से बड़ा स्वाभिमान चुना।इसीलिए वे केवल राम की पत्नी नहीं, भारत की चेतना हैं।

कौटिल्य दृष्टि::यदि राज्य अपराधी को दंड देने के स्थान पर पीड़ित से प्रमाण माँगने लगे, तो अपराधियों का साहस बढ़ता है और निर्दोषों का विश्वास टूटता है। न्याय का पहला सिद्धांत है—दोषी की जांच, निर्दोष की रक्षा। यही सुशासन की पहचान है।रावण अपराधी था। सीता पीड़िता थीं।फिर भी यदि प्रमाण सीता से माँगा गया, तो यह हमें आत्ममंथन का अवसर देता है कि कहीं हमारा समाज भी आज अनजाने में वही भूल तो नहीं दोहरा रहा?सीता की महानता उनकी अग्निपरीक्षा में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि उन्होंने विपत्ति, अपमान और संदेह के बीच भी अपने चरित्र, धैर्य और आत्मसम्मान को कभी नहीं छोड़ा।आइए संकल्प लें—प्रश्न अपराधी से होंगे, पीड़ित से नहीं।संदेह अन्याय पर होगा, सत्य पर नहीं।और न्याय का आधार लोकापवाद नहीं, धर्म, संवेदना और प्रमाण होगा।"जहाँ रावण से कम और सीता से अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं, वहाँ समाज को स्वयं अपनी अग्निपरीक्षा देनी चाहिए।"

राजेन्द्र  नाथ  तिवारी, 272001

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad