वन्देमातरम्: संस्कारों से निर्मित होता राष्ट्र
"राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, राष्ट्र संस्कारों से बनता है। भूमि शरीर है, संविधान व्यवस्था है, लेकिन संस्कार उसकी आत्मा हैं।""वन्देमातरम्" केवल दो शब्द नहीं हैं, यह भारत की आत्मा का उद्घोष है। जब कोई भारतीय "वन्देमातरम्" कहता है तो वह केवल मातृभूमि का अभिवादन नहीं करता, बल्कि उस संस्कृति, सभ्यता, इतिहास और उन मूल्यों को प्रणाम करता है जिन्होंने हजारों वर्षों से भारत को जीवित रखा है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के संस्कारों में निहित होती है।आज विश्व के अनेक देशों के पास आधुनिक हथियार, विशाल संसाधन और विकसित अर्थव्यवस्था है, फिर भी वे सामाजिक विघटन, पारिवारिक टूटन और सांस्कृतिक संकट से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर भारत ने हजारों वर्षों के आक्रमण, गुलामी और विभाजन के बाद भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा। इसका कारण केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय समाज के संस्कार हैं।
संस्कार क्या हैं?संस्कार मनुष्य के भीतर स्थापित वे मूल्य हैं जो उसे सही और गलत का विवेक देते हैं। शिक्षा ज्ञान देती है, लेकिन संस्कार ज्ञान के सदुपयोग की दिशा तय करते हैं। एक प्रतिभाशाली व्यक्ति यदि संस्कारहीन है तो वह समाज के लिए खतरा बन सकता है, जबकि सीमित साधनों वाला संस्कारित व्यक्ति समाज का निर्माता बनता है।भारतीय परंपरा में कहा गया है"सा विद्या या विमुक्तये।"अर्थात वही विद्या है जो मनुष्य को मुक्त करे—अज्ञान, अहंकार, हिंसा और स्वार्थ से।
भारत की शक्ति: परिवार और संस्कृति,भारत में बच्चे का पहला विद्यालय उसका परिवार होता है। माँ उसकी पहली गुरु होती है। दादा-दादी और नाना-नानी केवल रिश्तेदार नहीं, बल्कि जीवित विश्वविद्यालय होते हैं। परिवार में सत्य, सेवा, संयम, त्याग और परिश्रम का अभ्यास ही राष्ट्र निर्माण की पहली पाठशाला है।जब घरों में माता-पिता बच्चों को केवल सफल बनने की नहीं, बल्कि सज्जन बनने की शिक्षा देते हैं, तभी राष्ट्र महान बनता है।इसीलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया,"मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।"यह केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था का वैज्ञानिक आधार है।
इतिहास का संदेश::भारत के इतिहास में जितने भी महान व्यक्तित्व हुए, उनके पीछे श्रेष्ठ संस्कारों की परंपरा रही।छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व का निर्माण उनकी माता राजमाता जीजाबाई के संस्कारों ने किया। उन्होंने केवल पुत्र नहीं, राष्ट्ररक्षक तैयार किया।स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व में उनकी माता भुवनेश्वरी देवी के संस्कारों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया कि सत्य और अहिंसा का पहला पाठ उन्हें उनकी माता से मिला।इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि राष्ट्र निर्माण संसद से पहले परिवार में प्रारंभ होता है।
शिक्षा और संस्कार::आज शिक्षा का उद्देश्य अधिकांश स्थानों पर केवल रोजगार तक सीमित होता जा रहा है। विद्यालय उत्कृष्ट अंक तो दे रहे हैं, लेकिन क्या वे उत्कृष्ट चरित्र भी बना रहे हैं?यदि डॉक्टर ईमानदार न हो, इंजीनियर जिम्मेदार न हो, शिक्षक आदर्श न हो और प्रशासक राष्ट्रनिष्ठ न हो, तो डिग्रियाँ राष्ट्र का भला नहीं कर सकतीं।नई शिक्षा नीति ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल विकास पर बल दिया है। किंतु वास्तविक परिवर्तन तभी होगा जब विद्यालय, परिवार और समाज मिलकर संस्कारों का वातावरण बनाएँ।
तकनीक और संस्कार::आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट और सोशल मीडिया ने संसार बदल दिया है। ज्ञान पहले से अधिक उपलब्ध है, परंतु विवेक पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।तकनीक स्वयं न अच्छी होती है, न बुरी। उसका उपयोग करने वाले व्यक्ति के संस्कार तय करते हैं कि वह तकनीक मानवता के लिए वरदान बनेगी या अभिशाप।यदि संस्कार होंगे तो AI चिकित्सा, शिक्षा और कृषि को सशक्त करेगा। यदि संस्कार नहीं होंगे तो वही तकनीक झूठ, भ्रम और सामाजिक विभाजन का साधन बन सकती है।
राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ::राष्ट्रवाद केवल नारों या राजनीतिक मतभेदों का विषय नहीं है। सच्चा राष्ट्रवाद वह है जिसमें नागरिक कर ईमानदारी से दे, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे, कानून का सम्मान करे, पर्यावरण बचाए और अपने कर्तव्यों का पालन करे।राष्ट्रभक्ति केवल सीमा पर शहीद होने में नहीं, बल्कि प्रतिदिन ईमानदारी से अपना कार्य करने में भी है।संस्कारहीन समाज की चुनौतियाँजब समाज में संस्कार कमजोर होते हैं तब.भ्रष्टाचार सामान्य बन जाता है।परिवार टूटने लगते हैं।नशाखोरी बढ़ती है।हिंसा और अपराध बढ़ते हैं।जातीय और सांप्रदायिक विद्वेष गहराता है।राष्ट्रहित से अधिक स्वार्थ को महत्व मिलने लगता है।ऐसे समाज की आर्थिक प्रगति भी स्थायी नहीं रह सकती।
भारतीय संस्कृति का वैश्विक संदेश::भारत ने सदैव विश्व को जोड़ने का संदेश दिया।वसुधैव कुटुम्बकम्।"यह विचार आज भी मानवता के लिए प्रासंगिक है। जब विश्व युद्धों, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है, तब भारतीय संस्कृति संतुलन, सह-अस्तित्व और कर्तव्य का मार्ग दिखाती है।युवा शक्ति की भूमिका::भारत विश्व के सबसे युवा देशों में है। यदि यह युवा पीढ़ी केवल नौकरी खोजने वाली पीढ़ी बन गई तो अवसर सीमित रह जाएंगे; यदि यही पीढ़ी चरित्रवान, अनुशासित और नवाचारी बनेगी तो भारत विश्व का मार्गदर्शक बन सकता है।युवा को पाँच संकल्प लेने चाहिए—सत्य बोलूँगा।भ्रष्टाचार नहीं करूँगा और न सहूँगा।परिवार और समाज का सम्मान करूँगा।भारतीय संस्कृति पर गर्व करूँगा।राष्ट्रहित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखूँगा।
वन्देमातरम् का वास्तविक अर्थ::"वन्देमातरम्" केवल स्वतंत्रता आंदोलन का नारा नहीं था। यह उस चेतना का उद्घोष था जिसने लाखों भारतीयों को व्यक्तिगत सुख छोड़कर राष्ट्र के लिए बलिदान देने की प्रेरणा दी।जब हम "वन्देमातरम्" कहते हैं, तब हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि—हम राष्ट्र की एकता की रक्षा करेंगे।समाज में सद्भाव बढ़ाएँगे।आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ संस्कार देंगे।अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे।
राष्ट्र का भविष्य संसद, न्यायालय या सरकार अकेले तय नहीं करती। उसका भविष्य उन घरों में तय होता है जहाँ माता अपने बच्चों को सत्य सिखाती है, पिता परिश्रम का उदाहरण प्रस्तुत करता है, शिक्षक चरित्र निर्माण करता है और समाज अच्छे आचरण का सम्मान करता है।भारत को यदि पुनः "जगतगुरु" बनना है, तो केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा। हमें संस्कार, चरित्र, शिक्षा, विज्ञान और राष्ट्रभक्ति का समन्वय करना होगा।वन्देमातरम् का अर्थ केवल भारत माता की वंदना करना नहीं, बल्कि ऐसा जीवन जीना है जिससे भारत माता का मस्तक सदैव ऊँचा रहे।
आइए संकल्प लें,"हम केवल सफल नागरिक नहीं, संस्कारित नागरिक बनेंगे। क्योंकि संस्कारित व्यक्ति से श्रेष्ठ परिवार बनता है, श्रेष्ठ परिवार से श्रेष्ठ समाज, और श्रेष्ठ समाज से ही एक महान राष्ट्र का निर्माण होता है।"
वन्देमातरम्।
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