लोकसभा: संख्या नहीं, गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व
सम्पादकीय, राजेंद्र नाथ तिवारी, मुख्य सम्पादक,25मार्च 26,समय 1.45
भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था लोकसभा है। यही वह मंच है जहाँ देश की दिशा निर्धारित होती है, नीतियाँ निर्मित होती हैं और जनता की आकांक्षाएँ अभिव्यक्ति पाती हैं। किंतु आज एक मूल प्रश्न हमारे समक्ष खड़ा है—क्या यह संस्था केवल संख्या का खेल बनकर रह गई है, अथवा यहाँ वास्तविक अर्थों में गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो रहा है?
लोकतंत्र में संख्या का महत्व असंदिग्ध है। बहुमत से ही सरकार का गठन होता है और उसी के आधार पर नीतिगत निर्णयों को वैधता प्राप्त होती है। परंतु क्या मात्र संख्या ही पर्याप्त है? क्या संसद की गरिमा केवल इस आधार पर निर्धारित की जा सकती है कि किस दल के पास कितनी सीटें हैं, या इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन सीटों पर आसीन प्रतिनिधियों की योग्यता, दृष्टि और राष्ट्रबोध का स्तर क्या है?
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक चिंताजनक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है—संख्या बढ़ाने की अंधी दौड़। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी रणनीतियों तक, अनेक बार प्राथमिकता “विजय की संभावना” को दी जाती है, न कि “नेतृत्व की गुणवत्ता” को। परिणामस्वरूप, लोकसभा में ऐसे प्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि हो रही है जिनके लिए राष्ट्रहित के स्थान पर व्यक्तिगत या समूहगत हित अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक समस्या नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। संसद केवल विधि-निर्माण का मंच नहीं, बल्कि विचार-विमर्श की सर्वोच्च संस्था है। यदि यहाँ विचारों का स्तर गिरता है, तो नीतियों की गुणवत्ता भी अनिवार्यतः प्रभावित होती है, चाहे बहुमत कितना ही प्रबल क्यों न हो।
भारत का इतिहास साक्षी है कि महान राष्ट्रों का निर्माण केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले नेतृत्व के बल पर हुआ है। प्राचीन सभाओं से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था तक, हर युग में वही समाज प्रगति कर सका है जिसने अपने निर्णयकर्ताओं की योग्यता और नैतिकता को सर्वोपरि स्थान दिया।
वर्तमान समय की माँग है कि “संख्या बनाम गुणवत्ता” के इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अल्पकालिक लाभ के लिए यदि गुणवत्ता से समझौता किया गया, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। साथ ही, मतदाताओं की भी यह जिम्मेदारी है कि वे अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय केवल जातीय, धार्मिक या तात्कालिक प्रलोभनों से प्रभावित न हों, बल्कि उम्मीदवार की योग्यता, चरित्र और दृष्टि को प्राथमिकता दें।
लोकसभा को भीड़ का मंच नहीं, बल्कि विचारों का केंद्र बनना होगा। वहाँ प्रत्येक वक्तव्य केवल शोर न हो, बल्कि राष्ट्र के निर्माण में सार्थक योगदान देने वाला हो। यह तभी संभव है जब संख्या के स्थान पर गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जाए।
अंततः, लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कितने प्रतिनिधि चुने गए, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वे कितने योग्य, उत्तरदायी और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्ध हैं।अब समय आ गया है कि स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए—लोकसभा में संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व ही भारत के भविष्य को सुरक्षित और सशक्त बना सकता है।
लोकतंत्र में संख्या का महत्व असंदिग्ध है। बहुमत से ही सरकार का गठन होता है और उसी के आधार पर नीतिगत निर्णयों को वैधता प्राप्त होती है। परंतु क्या मात्र संख्या ही पर्याप्त है? क्या संसद की गरिमा केवल इस आधार पर निर्धारित की जा सकती है कि किस दल के पास कितनी सीटें हैं, या इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन सीटों पर आसीन प्रतिनिधियों की योग्यता, दृष्टि और राष्ट्रबोध का स्तर क्या है?
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक चिंताजनक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है—संख्या बढ़ाने की अंधी दौड़। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी रणनीतियों तक, अनेक बार प्राथमिकता “विजय की संभावना” को दी जाती है, न कि “नेतृत्व की गुणवत्ता” को। परिणामस्वरूप, लोकसभा में ऐसे प्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि हो रही है जिनके लिए राष्ट्रहित के स्थान पर व्यक्तिगत या समूहगत हित अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक समस्या नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। संसद केवल विधि-निर्माण का मंच नहीं, बल्कि विचार-विमर्श की सर्वोच्च संस्था है। यदि यहाँ विचारों का स्तर गिरता है, तो नीतियों की गुणवत्ता भी अनिवार्यतः प्रभावित होती है, चाहे बहुमत कितना ही प्रबल क्यों न हो।
भारत का इतिहास साक्षी है कि महान राष्ट्रों का निर्माण केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले नेतृत्व के बल पर हुआ है। प्राचीन सभाओं से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था तक, हर युग में वही समाज प्रगति कर सका है जिसने अपने निर्णयकर्ताओं की योग्यता और नैतिकता को सर्वोपरि स्थान दिया।
वर्तमान समय की माँग है कि “संख्या बनाम गुणवत्ता” के इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि अल्पकालिक लाभ के लिए यदि गुणवत्ता से समझौता किया गया, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। साथ ही, मतदाताओं की भी यह जिम्मेदारी है कि वे अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय केवल जातीय, धार्मिक या तात्कालिक प्रलोभनों से प्रभावित न हों, बल्कि उम्मीदवार की योग्यता, चरित्र और दृष्टि को प्राथमिकता दें।
लोकसभा को भीड़ का मंच नहीं, बल्कि विचारों का केंद्र बनना होगा। वहाँ प्रत्येक वक्तव्य केवल शोर न हो, बल्कि राष्ट्र के निर्माण में सार्थक योगदान देने वाला हो। यह तभी संभव है जब संख्या के स्थान पर गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जाए।
अंततः, लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कितने प्रतिनिधि चुने गए, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि वे कितने योग्य, उत्तरदायी और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्ध हैं।अब समय आ गया है कि स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए—लोकसभा में संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व ही भारत के भविष्य को सुरक्षित और सशक्त बना सकता है।

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