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शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

वंदे मातरम पर ना!और मदर इंडिया पर हां

वन्देमातरम एकषष्टिः श्रृंखला 61


वंदे मातरम पर ना!और मदर इंडिया पर हां 


वन्दे मातरम् या ‘मदर इंडिया’?औपनिवेशिक चिंतन और अंग्रेज़ी शिक्षा ने हमारे मानस में “मदर इंडिया” जैसी अभिव्यक्तियाँ बो दीं, जबकि भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा “वन्दे मातरम्” और “भारत माता” के रूप में जागी। प्रश्न यह नहीं कि कौन‑सा शब्द अधिक आधुनिक है, प्रश्न यह है कि कौन‑सा प्रतीक भारत की संस्कृति और स्वतंत्रता–चेतना के साथ न्याय करता है।वन्दे मातरम् : राष्ट्र जागरण का प्रथम मंत्र बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘आनन्दमठ’ के माध्यम से राष्ट्र को “माता” के रूप में देखने का विचार रचा और “वन्दे मातरम्” के स्तोत्र ने इस भाव को स्वर दिया। 1905 के स्वदेशी आंदोलन से लेकर कांग्रेस अधिवेशनों तक यह गीत केवल कविता नहीं, बल्कि क्रांति का घोष और दासत्व के विरुद्ध मन के विद्रोह का मंत्र बन गया।


गीत की पंक्तियाँ – “सुजलां सुफलां मलयज शीतलां सस्यश्यामलां मातरम्” – भारतभूमि को हरित, पोषिणी और शीतल वात्सल्य से ओत‑प्रोत माँ के रूप में चित्रित करती हैं, जो अपने पुत्रों को अन्न, जल और जीवन देती है। आगे के पदों में यही मातृभूमि दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त शक्ति बनकर अन्याय और दासता का संहार करने वाली, शत्रु–दलनिनी माँ के रूप में उभरती है। इस प्रकार “वन्दे मातरम्” भूमि–भक्ति को ईश्वर–भक्ति की ऊँचाई पर उठाकर राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक आयाम देता है।‘भारत माता’ की संकल्पना और ‘मदर इंडिया’ का फर्क vभारतीय चिन्तन में माता–भूमि का विचार नया नहीं; “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” जैसी उक्ति के माध्यम से भूमि को माँ के बराबर सम्मान देने की परम्परा प्राचीन है।  उन्नीसवीं–बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी पुनर्जागरण ने इसी भाव को दृश्य रूप देकर “भारत माता” की मूर्ति खड़ी की—केसरिया या भगवा वेश में, हाथ में ध्वज, कभी सिंह के साथ, कभी भारत–मानचित्र के साथ खड़ी देवी।

अबनिन्द्रनाथ ठाकुर जैसे कलाकारों ने भारत माता को चार भुजाओं वाली तपस्विनी माँ के रूप में चित्रित किया, जो अन्न, वस्त्र, ज्ञान और मुक्ति – ये चार वरदान अपने बच्चों को देती है। इस चित्र ने भारत को केवल भौगोलिक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवित, पूज्य, त्याग और सेवा की प्रेरणा देने वाली मातृदेवी के रूप में प्रतिष्ठित किया। 

इसके विपरीत “मदर इंडिया” एक अंग्रेज़ी अभिव्यक्ति है, जो अधिकतर औपनिवेशिक विमर्श, यात्रा वृत्तांतों या बाद में फ़िल्मी प्रतीकों में देखने को मिलती है; यहाँ राष्ट्र की अनुभूति भारतीय आध्यात्मिकता से अधिक सामाजिक‑यथार्थ या विदेशी दृष्टि से आकार लेती है। इसलिए राष्ट्रवादी दृष्टि से “मदर इंडिया” केवल भाषिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसी भावना के क्षरण और पश्चिमी विमर्श के हस्तक्षेप का संकेत भी है।‘माता’ कौन? भूमि, देवी या केवल रूपक?समकालीन बहस का एक अहम पक्ष यह है कि “वन्दे मातरम्” की “माता” को देवता–पूजा माना जाए या मातृभूमि की रूपक–वंदना। मुस्लिम लीग और बाद में कुछ अल्पसंख्यक नेताओं ने देवी‑स्वरूप राष्ट्र–कल्पना पर आपत्ति की, इसे इस्लामी एकेश्वरवाद के विपरीत “शिर्क” की श्रेणी में रखकर गीत के पूर्ण पाठ का विरोध किया।

राष्ट्रवादी पक्ष का तर्क यह है कि बंकिम की “माता” एक साथ दो स्तरों पर काम करती है—एक ओर वह दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के गुणों से युक्त शक्ति–स्वरूप देवी है, दूसरी ओर वही देवत्व इस धरती, इस संस्कृति और इस सभ्यता के माध्यम से व्यक्त हो रहा है। श्री अरविन्द ने स्पष्ट किया कि राष्ट्र वह “सूक्ष्म शरीर” है जिसमें. वन्देमातरम 🙏भाषा, संस्कृति, साहित्य और इतिहास सब मिलकर एक चेतन सत्ता बनाते हैं; “माँ” उसी चेतना का मानवीकृत प्रतीक है, कोई मर्ति–पूजा करने का अलग धार्मिक विधान नहीं।इस दृष्टि से “वन्दे मातरम्” में प्रणाम किसी पत्थर या मूर्ति को नहीं, बल्कि उस मातृभूमि–चैतन्य को है, जो हर भारतीय की श्रद्धा, स्मृति और कर्तव्य–बोध का स्रोत है; यह राजनीतिक राष्ट्रीयता से आगे जाकर सांस्कृतिक एकात्मता का सूत्र बनता है।आधुनिक भारत में वन्दे मातरम् : विवाद या परीक्षा?स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने “वन्दे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर “जन गण मन” के समान सम्मान स्वीकार किया, यद्यपि व्यावहारिक सहमति के लिए प्रायः प्रथम दो पदों तक सीमित रूप में गान की परम्परा बनी।

 इसके बावजूद समय‑समय पर इस गीत पर आपत्तियाँ, बहिष्कार और राजनीतिक तुष्टिकरण की घटनाएँ सामने आती रहीं, जिससे यह प्रश्न उठता रहा कि क्या भारत की नई पीढ़ी अपनी मातृभूमि की वंदना से भी संकोच करेगी।दूसरी ओर, राष्ट्रवादी धाराएँ “वन्दे मातरम्” को भारतीयता के लिटमस टेस्ट की तरह प्रस्तुत करती हैं—जो इस मातृभूमि को माँ कहने में हिचकता है, वह इस राष्ट्र की मूल आत्मा को स्वीकार करने से इंकार करता है। यह दृष्टि मानती है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राष्ट्र–प्रतीकों से दूरी नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण राज्यव्यवस्था के भीतर साझा सांस्कृतिक स्मृति का संरक्षण है; “भारत माता की जय” और “वन्दे मातरम्” इसी साझा स्मृति के सर्वोच्च उद्घोष हैं।

‘वन्दे मातरम्’ – भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा यदि राष्ट्र को केवल भू‑भाग मानें तो “मदर इंडिया” जैसी अभिव्यक्तियाँ पर्याप्त लग सकती हैं; पर भारत को यदि सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक परम्परा के अखंड प्रवाह के रूप में देखें, तो “वन्दे मातरम्” और “भारत माता” ही उसके प्रामाणिक प्रतीक बनते हैं। वन्दे मातरम् इस धरती को देवी मानकर उसकी पूजा कराने नहीं, बल्कि उसके लिए त्याग, संघर्ष और चरित्र–निर्माण की मांग करने वाला गीत है—यही इसे सामान्य “मदर इंडिया” से अलग एक राष्ट्रमंत्र बनाता है। इसलिए व्यापक राष्ट्रवादी विवेचना यही कहती है कि भारतीय लेखनी में “वन्दे मातरम्” और “भारत माता” को प्राथमिक स्थान देकर, “मदर इंडिया” जैसे अनुवादों को केवल सहायक या संदर्भ–शब्द के रूप में सीमित रखना चाहिए।जब भारतीय स्वयं अपनी मातृभूमि को उसके स्वनाम से पुकारते हैं—भारत, भारतवर्ष, भारत माता—तभी राष्ट्रवाद उधार की भाषा से निकलकर स्वदेशी चेतना में रूपांतरित होता है.

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