मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरशिप का पतन
डिग्रीधारी शिक्षक, पर राष्ट्र के लिए अनुपयुक्त?
— कौटिल्य वार्ता | राष्ट्रवादी संपादकीय
भारत आज जिस संकट से जूझ रहा है, वह केवल सीमाओं पर नहीं है।यह संकट श्वेत कोट के भीतर, क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड पर और मेडिकल कॉलेजों की फैकल्टी लिस्ट में छिपा बैठा है।प्रश्न सीधा है, पर उत्तर असुविधाजनक—क्या आज भारत के मेडिकल कॉलेजों में ऐसे डॉक्टर प्रोफेसर बनाए जा रहे हैं जो न अनुभव में परिपक्व हैं, न शिक्षण के योग्य, और न ही राष्ट्र के स्वास्थ्य-भविष्य के लिए सुरक्षित? यह शिक्षा का नहीं, राष्ट्र सुरक्षा का विषय है ,जो राष्ट्र अपने सैनिकों को अनुभवहीन कमांडर नहीं देता,वह राष्ट्र अपने डॉक्टरों को अनुभवहीन शिक्षक कैसे सौंप सकता है?
मेडिकल प्रोफेसर केवल सिलेबस नहीं पढ़ाता—वह यह तय करता है कि: एक छात्र कब ऑपरेशन करे,कब हाथ रोक ले,और कब मरीज को बचाने से पहले अहंकार को मारे।यदि यह विवेक अनुभव से नहीं आया, तो डिग्री केवल कागज़ है—और वह कागज़ भविष्य में डेथ सर्टिफिकेट बन सकता है।
फैकल्टी की कमी या नीति की विफलता?सरकारी तर्क दिया जाता है—“मेडिकल कॉलेज बढ़ गए हैं, फैकल्टी नहीं मिल रही।”राष्ट्रवादी दृष्टि पूछती है: फैकल्टी क्यों नहीं मिल रही?क्योंकि—मेडिकल कॉलेज सेवा केंद्र नहीं, ठेकेदारी मॉडल पर खुले हैं।प्रोफेसरशिप को सम्मान नहीं, फाइल प्रक्रिया बना दिया गया,अनुभवी डॉक्टर को पढ़ाने के लिए न सुरक्षा दी गई,न स्वतंत्रता,न गरिमा फिर समाधान खोजा गया—योग्यता घटा दो। यही वह क्षण है जहाँ शिक्षा नहीं, समझौता जन्म लेता है।अनुभव का अवमूल्यन: सबसे खतरनाक प्रयोग:आज स्थिति यह है कि—वर्षों की क्लिनिकल प्रैक्टिस गौण हो गई ।कठिन केस, ग्रामीण सेवा, इमरजेंसी अनुभव—सब पीछेआगे आ गई है: डिग्री,कागज, नियमों की ढील यह वही मानसिकता है जिसने कभी कहा था—“डिग्री है, काम सीख लेंगे।”लेकिन चिकित्सा में काम सीखने की कीमत मरीज देता है।
क्या सच में अपात्र लोग प्रोफेसर बन रहे हैं? राष्ट्रवादी उत्तर न अतिरंजित होगा, न बचाववादी। हाँ, कुछ मेडिकल कॉलेजों में।ऐसे लोग शिक्षण पदों पर हैं—जिनका क्लिनिकल अनुभव सीमित है, जिनका मरीजों से सीधा सामना न्यूनतम रहा हैजो शिक्षक बने, पर कभी चिकित्सक नहीं बने। यह पूरे देश की तस्वीर नहीं।
भारत में आज भी असंख्य समर्पित, योग्य, राष्ट्रनिष्ठ मेडिकल शिक्षक हैं। पर समस्या व्यक्ति की नहीं, प्रणाली की दिशा की है।बसे बड़ा नुकसान किसे? अमीर भारत को नहीं। अमीर—AIIMS जाएगा,कॉरपोरेट अस्पताल जाएगा,विदेश चला जाएगा,लेकिन—जिला अस्पताल,सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रग्रामीण मेडिकल कॉलेज,वहाँ जाएगा वही छात्र जिसे कमजोर प्रशिक्षण मिला। यह केवल शिक्षा की असफलता नहीं—यह गरीब भारत के खिलाफ संस्थागत अन्याय है। नियामक संस्थाएँ: कागज़ की चौकीदारी निरीक्षण होता है—बिल्डिंग है या नहीं मशीन लगी है या नहीं,नाम दर्ज है या नहींपर नहीं पूछा जाता—क्या पढ़ाने वाला डॉक्टर कभी उस बीमारी से जूझा है?क्या उसने अपने हाथों से मरीज खोया है, ताकि वह छात्र को सिखा सके कि हार कैसे टाली जाए?
राष्ट्रवादी दृष्टि कहती है—निरीक्षण केवल इमारत का नहीं, अनुभव और चरित्र का होना चाहिए। समाधान: अगर राष्ट्र सच में गंभीर है क्लिनिकल अनुभव को सर्वोच्च पात्रता बनाया जाए।डिग्री नहीं, मरीजों के बीच बिताए वर्षों का मूल्यांकन हो। प्रोफेसरशिप को फिर से सेवा बनाया जाए।यह पद नहीं, उत्तरदायित्व है। हर मेडिकल कॉलेज की फैकल्टी प्रोफाइल सार्वजनिक हो। अनुभव, सेवा क्षेत्र, विशेषज्ञता—सब जनता देखे। राष्ट्रवादी मेडिकल शिक्षा नीति जिसका लक्ष्य हो—“डॉक्टर तैयार करना, केवल डिग्रीधारी नहीं।”
यह चेतावनी है, आरोप नहीं,यह लेख डॉक्टरों के विरुद्ध नहीं।यह लापरवाही की संस्कृति के विरुद्ध है। यदि मेडिकल शिक्षा में समझौता चलता रहा,तो भारत बीमार शरीरों से नहीं,बीमार निर्णयों से जूझेगा। कौटिल्य स्पष्ट कहते हैं—राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी जनता का स्वास्थ्य है।और उस स्वास्थ्य की नींव मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर के हाथ में होती है।उस हाथ को अनुभवहीन मत बनाइए।
अन्यथा मुन्ना भाई को पैदा होने से कौन रोक सकता है?

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