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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

समस्या भाजपा की पेट दर्द कांग्रेस का

 


ब्राह्मण समाज, राजनीति और इतिहास — बयानबाज़ी से परे सच की तलाश**

कांग्रेस 10000 चित पावन ब्राह्मणों की हत्या का जवाब दे!

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का यह बयान कि “ब्राह्मणों की बैठक करने वाले भाजपा विधायक इस्तीफा देकर कांग्रेस में आ जाएँ”—केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उस पुरानी प्रवृत्ति को उजागर करता है जिसमें समुदायों को वैचारिक संवाद के बजाय राजनीतिक मोहरे के रूप में देखा जाता रहा है।इस बयान पर कौटिल्य वार्ता के प्रधान एवं जिला सहकारी बैंक, बस्ती के अध्यक्ष राजेंद्र नाथ तिवारी की प्रतिक्रिया इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि वह भावनात्मक प्रतिवाद नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और नैतिक प्रश्न उठाती है।

इतिहास का अनकहा अध्याय

राजेंद्र नाथ तिवारी का कहना है कि कांग्रेस को ब्राह्मण समाज के प्रति संवेदनशीलता दिखाने से पहले अपने इतिहास के उन पन्नों पर दृष्टि डालनी चाहिए, जहाँ स्वतंत्रता के बाद कुछ समुदायों के साथ गंभीर अन्याय हुए। विशेष रूप से महात्मा गांधी की हत्या के बाद चितपावन (पवन) ब्राह्मण समाज पर हुए हमलों, उनके विस्थापन और हत्याओं का प्रश्न आज भी समुचित ऐतिहासिक और न्यायिक मूल्यांकन की प्रतीक्षा में है।

यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि कपूर आयोग का गठन उस समय हुआ, जब नाथूराम गोडसे को फाँसी दी जा चुकी थी। आयोग की रिपोर्ट में न तो पीड़ित समुदायों के अनुभवों को पर्याप्त स्थान मिला और न ही उन घटनाओं की सामाजिक पृष्ठभूमि पर व्यापक विमर्श हुआ। यह स्थिति केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी आत्ममंथन का विषय है।

राजनीति बनाम संस्कृति,राजेंद्र  नाथ तिवारी की आपत्ति केवल राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक भी है। उनका तर्क है कि ब्राह्मण पहचान को केवल नाम, जाति या प्रतीकात्मक घोषणाओं तक सीमित करना उस परंपरा का अपमान है, जो ज्ञान, आचार और उत्तरदायित्व पर आधारित रही है। यदि राजनीति सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग करे, तो उसे उनकी मौलिक समझ और सम्मान भी दिखाना चाहिए।

ब्राह्मण समाज : वोट बैंक नहीं, वैचारिक धरोहर,,यह भी सच है कि ब्राह्मण समाज ने भारतीय लोकतंत्र में केवल सत्ता नहीं, बल्कि संविधान, न्यायपालिका, शिक्षा और प्रशासन को दिशा दी है। ऐसे में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा उसे केवल “इस्तीफे” या “पाला बदलने” के संदर्भ में देखना, समाज की बौद्धिक भूमिका को सीमित करना है।

यह विवाद किसी एक दल या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न उस राजनीति पर है जो इतिहास से संवाद करने के बजाय उसे चुनिंदा ढंग से याद करती है। यदि कांग्रेस वास्तव में ब्राह्मण समाज से संवाद चाहती है, तो उसे पहले इतिहास, न्याय और आत्मालोचना के धरातल पर आना होगा। और यदि अन्य दल स्वयं को विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो उन्हें भी यह सुनिश्चित करना होगा कि सामाजिक सम्मान केवल चुनावी मौसम की भाषा न बने।

लोकतंत्र में समुदायों को साधने की नहीं,

समझने और सम्मान देने की आवश्यकता है।



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