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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

वन्देमातरम का बटवारा ही देशका बटवारा

वन्देमातरम षष्टिः श्रृंखला

जहाँ प्रश्न, तर्क, ऐतिहासिक संदर्भ और वैचारिक निष्कर्ष एक साथ चलते हैं।


वन्देमातरम् की आत्मा और कांग्रेस का वैचारिक विच्छेद,जब राष्ट्रगीत नहीं, राष्ट्र की आत्मा हाशिये पर डाल दी गई,भारत केवल भूगोल नहीं है।भारत केवल संविधान की धाराएँ नहीं हैं। भारत एक सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी धड़कन सदियों से कुछ प्रतीकों, मंत्रों और विचारों में बसती आई है। उन्हीं में एक है—वन्देमातरम्। आज प्रश्न यह नहीं है कि वन्देमातरम् संवैधानिक रूप से क्या है,प्रश्न यह है कि वन्देमातरम् राष्ट्रीय चेतना में क्या है—और उससे कांग्रेस का रिश्ता आखिर सम्मान से संकोच तक कैसे पहुँच गया? वन्देमातरम् : एक राजनीतिक गीत नहीं, सभ्यतागत उद्घोष,बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्देमातरम् किसी राजनीतिक दल की उपज नहीं था। यह उस कालखंड की अभिव्यक्ति था, जब भारत स्वयं को राष्ट्र के रूप में पहचानने की प्रक्रिया में था। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उठती पहली संगठित चेतना, स्वदेशी आंदोलन की वैचारिक ऊर्जा,

क्रांतिकारियों की निर्भीक पुकार—इन सबका साझा स्वर था वन्देमातरम्।यह वही गीत था—जिसे गाते हुए छात्रों को जेल हुई,जिसे बोलते हुए युवाओं को फाँसी मिली,जिसे सुनते ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने दमन को तेज़ किया-स्पष्ट है—वन्देमातरम् सत्ता विरोधी नहीं, गुलामी विरोधी था। कांग्रेस और वन्देमातरम् : आरंभिक एकात्मता,यह इतिहास का स्थापित तथ्य है कि -कांग्रेस के शुरुआती अधिवेशनों में वन्देमातरम् अनिवार्य उद्घोष था।1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर,1920 के असहयोग आंदोलन तक—

वन्देमातरम् कांग्रेस की आत्मा के केंद्र में था।यह वही कांग्रेस थी जो कहती थी—“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”और उस स्वराज का पहला उच्चारणन्देमातरम् था। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि आज उसी कांग्रेस कोइस शब्द से असहजता होने लगी? 1947 के बाद : सत्ता में प्रवेश, आत्मा से प्रस्थान,आजादी के बाद कांग्रेस एक आंदोलन नहीं,

सत्ता का केंद्र बन गई।और यहीं से एक ऐतिहासिक बदलाव शुरू हुआ—

आंदोलन में भाव प्रधान होता है,सत्ता में समझौते प्रधान हो जाते हैं

देश विभाजन के साथ ही,कांग्रेस नेतृत्व ने यह मान लिया कि कुछ प्रतीक “संवेदनशील” हैं। और दुर्भाग्यवश उन्हीं में सबसे पहले आया—वन्देमातरम्।

आधा स्वीकार : राष्ट्र की आत्मा से आधा न्याय संविधान सभा में यह निर्णय लिया गया कि—जन गण मन राष्ट्रगान होगा,वन्देमातरम् को “राष्ट्रीय गीत” का दर्जा मिलेगा पर व्यवहार में वन्देमातरम् को दूसरी पंक्ति में खड़ा कर दिया गया।

न यह स्पष्ट किया गया कि यह राष्ट्रीय जीवन में कहाँ गाया जाए,न यह सुनिश्चित किया गया कि नई पीढ़ी इसे उसी सम्मान से जाने।यह कोई तकनीकी निर्णय नहीं था—यह वैचारिक झिझक थी। धर्मनिरपेक्षता की गलत व्याख्या

कांग्रेस ने वन्देमातरम् से दूरी का एक तर्क दिया—धर्मनिरपेक्षता। पर यह तर्क स्वयं में कमजोर है। वन्देमातरम् किसी पूजा-पद्धति का आह्वान नहीं करता।यह मातृभूमि को माँ कहता है—और माँ किसी धर्म की बपौती नहीं होती।यदि“भारत माता” कहना सांप्रदायिक है, तो फिर “मदर इंडिया” कैसे सेकुलर हो गया? यहीं कांग्रेस की वैचारिक असंगति उजागर होती है।

वोट बैंक बनाम राष्ट्रबोध समस्या वन्देमातरम् में नहीं,राजनीतिक प्राथमिकताओं में है।कांग्रेस धीरे-धीरे राष्ट्रबोध से अधिक,वर्ग-संतुलन की राजनीति करने लगी।जहाँ स्पष्ट सांस्कृतिक पक्ष लेना था, वहाँ चुप्पी को नीति बना लिया गया।और यह चुप्पी केवल मौन नहीं थी—यह आत्म-त्याग थी। आज की स्थिति : संकोच, सफ़ाई और मौन आज दृश्य यह है—वन्देमातरम् पर अदालतें सफ़ाई देती हैं नेता बयान देने से बचते हैं स्कूलों में इसे वैकल्पिक बनाया जाता है कांग्रेस इसे “अनावश्यक विवाद” कहकर टाल देती है

यह सब बताता है कि कांग्रेस आज भी अपने ही इतिहास से असहज है।प्रश्न कांग्रेस से, पर उत्तर राष्ट्र को चाहिए यह सम्पादकीयकिसी गीत को थोपने की माँग नहीं करता। यह केवल यह पूछता है—क्या राष्ट्र की आत्मा से डरकर कोई दल दीर्घकाल तक राष्ट्र का नेतृत्व कर सकता है?क्या जो दल अपने ही संघर्ष प्रतीकों से दूरी बना ले,वह नई पीढ़ी को दिशा दे पाएगा? वन्देमातरम् रहेगा, प्रश्न बना रहेगा वन्देमातरम् कांग्रेस की बपौती नहीं,और न ही किसी दल की संपत्ति। यह भारत की आत्मा है—और आत्मा कोकभी हाशिये पर नहीं रखा जा सकता।कांग्रेस चाहे इसे गाए या नहीं,पर इतिहास यह प्रश्न पूछता रहेगा—जिसने भारत को जगाया,उसे सत्ता में आते ही क्यों भुला दिया गया?cऔर यही प्रश्न आज के भारत की वैचारिक राजनीति की सबसे बड़ी कसौटी है।



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