वन्देमातरम नवपञ्चाशत् श्रृंखला
वंदेमातरम के साथ बौद्धिक कायरता भी खूब हुई !

करता, प्रश्न करता है।
**जन गण मन अनिवार्य, वंदे मातरम् ‘विकल्प’ —यह व्यवस्था नहीं, राष्ट्र के साथ अपराध है**
यह कोई सामान्य प्रशासनिक प्रोटोकॉल नहीं है।यह कोई मासूम संवैधानिक संयोग नहीं है।
यह एक सुनियोजित बौद्धिक षड्यंत्र है —जिसके तहत भारत की आत्मा को विकल्प बना दिया गया और राज्य को अनिवार्य।
आज भारत में जन गण मन न बजाओ तो देशद्रोही,
और वंदे मातरम् न बोलो तो “संवेदनशील मामला”।यह संतुलन नहीं है।
यह वैचारिक धांधली है। यह किसने तय किया कि आत्मा वैकल्पिक होगी?
किस संविधान में लिखा है कि—राष्ट्रगान अनिवार्य होगाऔर राष्ट्रगीत केवल विकल्प?
किस अनुच्छेद में कहा गया कि—राज्य का गीत आदेश से गाया जाएगा
और राष्ट्र की चेतना अनुमति माँगेगी?उत्तर स्पष्ट है—
कहीं नहीं लिखा।फिर यह व्यवस्था आई कहाँ से?उत्तर और भी स्पष्ट है—
नैरेटिव पॉलिटिक्स से।आदेश से राष्ट्रभक्ति? यह लोकतंत्र नहीं, मानसिक तानाशाही है,आज राष्ट्रगान—अदालत के आदेश से बजता है
पुलिस की निगरानी में सुना जाता हैऔर शक की निगाह से परखा जाता है
यह सम्मान नहीं, डर का अनुशासन है।
राष्ट्रभक्ति यदि—आदेश से हो,दंड के भय से हो
तो वह राष्ट्रभक्ति नहीं, प्रशासनिक रस्म है।
और उसी देश में— जिस गीत पर फांसी चढ़े क्रांतिकारियों ने आख़िरी साँस ली,
उसे कहा जाता है—“आप चाहें तो गा लीजिए।”
यह इतिहास का अपमान नहीं तो क्या है?
वंदे मातरम् से डर किसे है?
साफ़ बोलिए।डर गीत से नहीं है।
डर है उसके अर्थ से।वंदे मातरम्—
राष्ट्र को माता कहता है
राज्य से पहले संस्कृति को रखता है
संविधान से पहले स्मृति की बात करता है
और यही बात कुछ विचारधाराओं को चुभती है।
उन्हें ऐसा भारत चाहिए—जो काग़ज़ से शुरू हो
फ़ाइल में जिए और आदेश पर खड़ा हो
वंदे मातरम् वह भारत है जो आदेश नहीं मानता —
वह श्रद्धा से उठता है।
यह केवल गीत का प्रश्न नहीं, सभ्यता का प्रश्न है,यह बहस गीतों की नहीं है।
यह बहस है—
राष्ट्र बनाम राज्य,स्मृति बनाम आदेश
सभ्यता बनाम सुविधा,जब आप—
राज्य के गीत को अनिवार्य,और सभ्यता के गीत को वैकल्पिक बनाते हैं
तो आप साफ़ कहते हैं—“हमें भारत नहीं, उसका प्रशासन चाहिए।”
यह राष्ट्र निर्माण नहीं,राष्ट्र संकोचन है।
चयनात्मक सेकुलरिज़्म का नंगा खेल
एक तरफ—फ्रांस का ‘ला मार्सेये’
रक्त, शत्रु, हिंसा की खुली बात
फिर भी गर्व का प्रतीक
दूसरी तरफ—भारत का वंदे मातरम्
धरती की स्तुति फिर भी “विवादास्पद”
यह कौन-सा सेकुलरिज़्म है
जो रक्त को स्वीकार करता है
और माँ को संदिग्ध?
यह सेकुलरिज़्म नहीं, सांस्कृतिक हीनता है।
नई पीढ़ी के साथ सबसे बड़ा धोखा
आज के छात्र को—
राष्ट्रगान खड़े होकर सिखाया जाता है
पर यह नहीं बताया जाता कि क्यों
वंदे मातरम्—पाठ्यपुस्तकों से गायब
विमर्श से अनुपस्थित
और बहस से निषिद्ध
यानी एक पूरी पीढ़ी को
जड़ों से काट दिया गया।
यह शिक्षा नहीं,
स्मृति-विच्छेदन (Memory Amputation) है।
“विकल्प” शब्द सबसे खतरनाक हथियार है
ध्यान दीजिए— प्रतिबंध नहीं लगाया गया।
बस कहा गया—
“यह वैकल्पिक है।”विकल्प का अर्थ—आज नहीं-कल नहीं-कभी भी नहीं
इस तरह वंदे मातरम् को
चिल्लाकर नहीं,₹₹चुपचाप मारा गया।अदालतें, बुद्धिजीवी और डरपोक तटस्थता
अदालतें—राष्ट्रगान पर आदेश देती हैं
वंदे मातरम् पर चुप-बुद्धिजीवी—
राष्ट्रगान को “संवैधानिक मूल्य”
वंदे मातरम् को “भावनात्मक मुद्दा”
यह तटस्थता नहीं,बौद्धिक कायरता है।
जब इतिहास कटघरे में हो, तो चुप्पी भी अपराध होती है।
कौटिल्य चेतावनी दे चुके थे
कौटिल्य ने कहा था—“जो राज्य अपनी स्मृति से कट जाए,
वह केवल कर-वसूली की मशीन रह जाता है।”आज भारत के साथ
यही प्रयोग हो रहा है।राष्ट्र की स्मृति—
वैकल्पिकअसुविधाजनक
संदिग्ध और फिर पूछा जाता है—“राष्ट्रभाव क्यों कमज़ोर है?”
अब सवाल गीत का नहीं, साहस का है
अब यह तय करना होगा—
क्या भारत अपनी आत्मा से डरेगा?
क्या वह अपनी स्मृति को विकल्प बनाए रखेगा?
या कहेगा कि राष्ट्र केवल आदेश से नहीं चलता?
यह लड़ाई— भाजपा बनाम विरोध की नहीं है।
यह लड़ाई है— भारत बनाम उसका हीन नैरेटिव।
अंतिम, स्पष्ट और असहज निष्कर्ष
वंदे मातरम् को विकल्प बनाना
और जन गण मन को अनिवार्य करना —
यह संतुलन नहीं,
राष्ट्र के साथ किया गया सुनियोजित अन्याय है।
जिस दिन भारत ने यह अन्याय स्वीकार कर लिया,
उस दिन उसने मान लिया कि
उसकी आत्मा राज्य से कमतर है।
और जो राष्ट्र अपनी आत्मा को
विकल्प बना दे—
उसका भविष्य अनिवार्य रूप से गुलाम होता है।
वंदे मातरम् विकल्प नहीं है।
वह भारत की चेतना है।
वन्देमातरम..
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