प्रयागराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में तदर्थ और कार्यवाहक प्रधानाचार्यों के वेतन विवाद को स्पष्ट करता है। यह कानूनी पूर्व-शर्तों पर आधारित है और भविष्य के भुगतान को रोकता है। कानूनी आधारकोर्ट ने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 18 पर जोर दिया, जिसमें रिक्ति अधियाचन (वेकेंसी नोटिफिकेशन) और पद के दो माह तक खाली रहने जैसी पूर्व-शर्तें अनिवार्य हैं। इनके बिना तदर्थ पदोन्नति पर प्रधानाचार्य का पूर्ण वेतन देय नहीं। नए 2023 अधिनियम में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं। आदेश के मुख्य बिंदुपहले दिए गए वेतन की वसूली न की जाए।आदेश की तिथि (जनवरी 2026) के बाद कोई भुगतान न हो।जिला विद्यालय निरीक्षक को ऐसे मामलों की जांच कर चार सप्ताह में कार्रवाई करने का निर्देश। व्यावहारिक प्रभावयह फैसला समिता समेत 19 याचियों के मामलों में आया, जो बुलंदशहर आदि क्षेत्रों से थे। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने पुराने निर्णयों (1980-85) को 2001 संशोधन के बाद अप्रासंगिक ठहराया। स्कूल प्रबंधनों को चयन बोर्ड को रिक्ति सूचित करनी होगी।
यह समर्थ व्याख्यायआदेश कानून की सख्ती सुनिश्चित करता है, क्योंकि केवल जिम्मेदारी निभाने से वेतन का अधिकार नहीं बनता—पूर्व-शर्तें पूरी होनी चाहिएं। इससे अनियमित तदर्थ नियुक्तियां रुकेंगी, बजट अनुशासन बनेगा, लेकिन पूर्व-भुगतान सुरक्षित रहेगा, जो निष्पक्ष संतुलन दर्शाता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें