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शनिवार, 31 जनवरी 2026

कपिलवस्तु महोत्सव बना सत्ता का तमाशा: वीआईपी पास रद्दी, फोन-सिफ़ारिश से खुला गेट, गोविंदा के नाम पर अराजकता


वीआईपी पास भी बेकार, फोन-सिफ़ारिश से तय हुआ प्रवेश

गोविंदा के नाम पर मची भगदड़, प्रशासन बना मूकदर्शक**


कपिलवस्तु।

कपिलवस्तु महोत्सव—जिसे संस्कृति, पर्यटन और जनभागीदारी का उत्सव बताया गया—वह आयोजन के पहले ही दिन महा अव्यवस्था, सत्ता-सिफ़ारिश और प्रशासनिक अराजकता का शर्मनाक उदाहरण बनकर रह गया। प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों के मुताबिक, कार्यक्रम रात 9 बजे शुरू होने से पहले ही वीआईपी और वीवीआईपी गेट पर अफरा-तफरी का आलम था।सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि वैध वीआईपी पास धारकों को भी अंदर नहीं जाने दिया गया, जबकि बिना पास वाले “ख़ास लोगों” के लिए गेट स्वतः खुलते चले गए।

पास नहीं, पहचान देखी गई,प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सुरक्षा और प्रशासनिक कर्मी पास नहीं, पहचान और सिफ़ारिश देखकर लोगों को अंदर भेज रहे थे।दिनभर गेट पर प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं के फोन घनघनाते रहे, और उन्हीं फोन कॉल्स के निर्देश पर प्रवेश तय होता रहा।

“फोन आया है… अंदर भेजो”— यही वाक्य गेट पर तैनात कर्मियों की कार्यशैली बन गया था।नेताओं के करीबी बने ‘गेट पास’सूत्र बताते हैं कि कार्यक्रम के भीतर मौजूद कई नेताओं और प्रभावशाली लोगों के करीबी खुद बाहर आकर अपने परिचितों को भीतर ले जाते देखे गए।यह सब उस समय हो रहा था, जब वैध वीआईपी पासधारी घंटों धक्के खा रहे थे और बार-बार अपमानित होकर लौटाए जा रहे थे।

गोविंदा के आगमन ने खोली व्यवस्था की पोलस्थि,ति तब और भयावह हो गई जब अभिनेता गोविंदा के आगमन की सूचना फैली।अचानक भीड़ बेकाबू हो गई, धक्का-मुक्की शुरू हो गई और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई।यह साफ हो गया कि भीड़ नियंत्रण, आपात योजना और प्रवेश प्रबंधन केवल कागज़ों में था।महोत्सव नहीं, ‘महा अव्यवस्था’जिस आयोजन को जनता के लिए बताया गया, वह हकीकत में सत्ता की सिफ़ारिशों का मंच,प्रशासनिक लापरवाही का नमूनाऔर आम नागरिकों के अपमान का उत्सव बन गया।सवाल यह है कि—जब वीआईपी पास भी बेकार हैं, तो पास जारी ही क्यों किए गए?क्या महोत्सव जनता के लिए था या चुनिंदा लोगों के लिए?अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारी और आयोजक कौन हैं?प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में,इतनी गंभीर अव्यवस्था के बावजूद प्रशासन की ओर से

न कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण,न माफ़ी,न जिम्मेदारी तय करने की पहल,यह चुप्पी खुद बहुत कुछ कहती है।

कपिलवस्तु महोत्सव ने एक बार फिर साबित कर दिया किजब आयोजन अहंकार, सिफ़ारिश और दिखावे से चलता है,तो संस्कृति नहीं—अराजकता पैदा होती है।यह केवल अव्यवस्था नहीं,जनता के विश्वास के साथ खुला खिलवाड़ है।


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