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रविवार, 14 दिसंबर 2025

इंजीनियर अस्पताल में डॉक्टर बनकर तीन साल करता रहा प्रैक्टिस

ललितपुर, झांसी

इंजीनियर,अस्पताल में डॉक्टर बन प्रैक्टिस,चिकित्सा  व्यवस्था पर निंदनीय प्रयोग


भारत में चिकित्सा जनजीवन की रीढ़ है, लेकिन जब यह रीढ़ खोखली हो जाए—जब इंजीनियरिंग कॉलेजों या अस्पतालों में इंजीनियर डॉक्टर बनकर अवैध प्रैक्टिस करें—तो यह नियमों का उल्लंघन नहीं, मानव जीवन का खुला खिलवाड़ है। ऊपर से नीचे तक फैली यह सड़ांध अब अनदेखी नहीं सहती। व्यवस्था को आक्रामक अस्वीकार चाहिए।समस्या का मूल: योग्यता का दिखावाडॉक्टर बनना वर्षों की कठिन पढ़ाई, इंटर्नशिप और नैतिक प्रशिक्षण मांगता है। लेकिन इंजीनियरिंग संस्थानों के 'मल्टी-स्पेशियलिटी' विंग में संदिग्ध योग्यता वाले 'डॉक्टर' परामर्श देते हैं—बिना स्पष्ट मेडिकल रजिस्ट्रेशन के।

 डिग्री दीवार पर, सफेद कोट पहनकर, स्टेथोस्कोप लटकाकर वे 'डॉक्टर' बन जाते हैं। मरीज पूछे नहीं, व्यवस्था बताए नहीं—धोखा पूरा। यह चिकित्सा का अपमान है, सिस्टम का काला खेल।प्रशासनिक लापरवाही: मौन की साजिशअवैध प्रैक्टिस बिना प्रशासनिक आशीर्वाद के नहीं चलती। स्वास्थ्य विभाग, मेडिकल काउंसिल, स्थानीय अधिकारी—सबकी जिम्मेदारी है रजिस्ट्रेशन जांचना। लेकिन जमीनी हकीकत? निरीक्षण कागजों में, 'समझौते' में दबे। यह मौन सहमति अपराध में भागीदारी है। मरीज की मौत पर सिरिंज पकड़े हाथ के साथ अधिकारी का भी खून सन जाता है। 

लापरवाही मौत का लाइसेंस है।नैतिक पतन: सफेद कोट की कालिखचिकित्सा का मंत्र है—'पहले नुकसान न पहुंचाओ'। लेकिन अयोग्य हाथों में इलाज नुकसान की गारंटी देता है। गलत डायग्नोसिस, दवा, डोज—ये प्रयोग इंसानों पर। संस्थान इसे 'सेवा' बेचते हैं: गरीब मरीज, सस्ती फीस का जाल, लंबी कतारें। यह शोषण है, नैतिक हत्या। जब जीवन दांव पर हो, 'सेवा' का नकाब उतर जाता है।कानून का मज़ाक: कागजों की बाजीगरीमेडिकल काउंसिल, क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट—कानून भरे पड़े हैं। कमी इच्छाशक्ति की। इंजीनियरिंग कॉलेजों के मेडिकल विंग बिना मान्यता, बिना योग्य स्टाफ चलते हैं। डॉक्टर कौन? प्रशिक्षु कौन? तकनीशियन कौन? पारदर्शिता शून्य। यह कानून का खुला अपमान है, न्याय का तमाशा।मरीज की असुरक्षा: गरीब का जीवन सस्ता?गरीब-मध्यम वर्ग का जीवन सस्ता क्यों? वे सवाल नहीं करते, शिकायत नहीं लिखते। कस्बों-अर्ध-शहरी इलाकों में ये 'हाइब्रिड' सेटअप फलते हैं—इंजीनियरिंग दीवारों में चिकित्सा का नकाब। विकल्पहीन मरीज शिकार बनते हैं। बड़े शहरों में नामी अस्पताल, लेकिन ग्रामीण-छोटे शहरों में जोखिम का बाजार। जीवन की कीमत क्या—सस्ती फीस?मीडिया-समाज की चुप्पी: चयनात्मक संवेदनाबड़ा हादसा न हो, मीडिया खामोश। 

समाज तब जागे जब आग घर पहुंचे। यह चुप्पी समस्या को गहरा करती है। इंजीनियर अस्पतालों की अवैध प्रैक्टिस—नाम, प्रक्रिया, जिम्मेदारी—सार्वजनिक बहस का विषय बने। यह जनहित है, चरित्र-हनन नहीं।समाधान: सख्ती और पारदर्शिताआक्रोश शब्दों तक न रहे। ठोस कदम उठें:अनिवार्य प्रदर्शन: हर क्लिनिक में डॉक्टरों की डिग्री, रजिस्ट्रेशन नंबर सार्वजनिक।औचक निरीक्षण: स्वास्थ्य विभाग की तिमाही जांच, रिपोर्ट ऑनलाइन।कठोर दंड: अवैध प्रैक्टिस पर तत्काल सील, भारी जुर्माना, आपराधिक मुकदमा।मरीज हेल्पलाइन: 'डॉक्टर सत्यापन' ऐप/हेल्पलाइन।अधिकारी जवाबदेह: लापरवाह पर कार्रवाई।

अब सहन नहीं इंजीनियर अस्पताल में डॉक्टर बनना व्यवस्था का अपराध है। इसे 'गलती' कहना भविष्य की मौतों पर दस्तखत है। आक्रामक सवाल, कठोर निर्णय, निडर कार्रवाई जरूरी। चिकित्सा विश्वास पर चलती है—विश्वास टूटा, समाज बीमार। सड़ांध साफ करें, वरना अगली खबर चिता की होगी।क्या आप इसमें किसी विशिष्ट उदाहरण (जैसे बस्ती या यूपी के केस) जोड़ना चाहेंगे, या भाषा को और तीखा बनाएं?

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