राम से ही राष्ट्र और राष्ट्र से से ही राम 🙏 - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

शनिवार, 22 नवंबर 2025

राम से ही राष्ट्र और राष्ट्र से से ही राम 🙏

 श्री राममंदिर ध्वजारोहण पर विशेष,


राम से ही राष्ट्र और राष्ट्र ही राम


“राम से ही राष्ट्र है, राष्ट्र ही राम है”—यह अपने भीतर सांस्कृतिक स्मृति, राजनैतिक आदर्श, धर्म-सत्ता और लोक-चेतना—सब कुछ समेटे हुए चलता है। इसे केवल एक नारा मानकर पढ़ना उसका अन्याय होगा। यह भारतीय राष्ट्रभाव का वह तंतु है जिसमें जनक से लेकर जनकपुर, अयोध्या से लेकर कश्मीर, वशिष्ठ से लेकर वाल्मीकि तक—समस्त सांस्कृतिक भूगोल एकसूत्र में बँध जाता है।

राम से ही राष्ट्र है, राष्ट्र ही राम है

(एक सांस्कृतिक-राजनीतिक विमर्श)

भारतीय सभ्यता को यदि एक वाक्य में समेटना हो तो वह शायद यही होगा—“राम ही राष्ट्र की देह में धड़कता हुआ हृदय हैं।” यह कथन केवल भावुकता नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, नीति, राजनीति और लोक-चेतना के संतुलन का शाश्वत सत्य है। भारत में राष्ट्र की अवधारणा पश्चिम की तरह भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि धर्म-जीवन, नीति-संयम और लोकधर्म के पालन से बनी है। इसी कारण राम हमारे यहाँ केवल एक देवता नहीं—वे राजनीति के धर्म, चरित्र के आदर्श, सांस्कृतिक अनुशासन, नागरिकता के संस्कार और राष्ट्र-आत्मा की स्थायी प्रतिमा हैं।वाल्मीकि ने लिखा—“रामो विग्रहवान् धर्मः”(अर्थात—राम धर्म के साक्षात् मूर्त रूप हैं)और यदि धर्म से ही राष्ट्र खड़ा होता है, तो यह स्वाभाविक है कि राम से ही राष्ट्र है। और जब राष्ट्र उसी आदर्श के आधार पर जीवित रहता है, तो राष्ट्र स्वयं राममय हो उठता है—राष्ट्र ही राम है।
 राष्ट्र की भारतीय अवधारणा और राम का केंद्रीय स्थान,भारत में राष्ट्र कोई राजनीतिक प्रयोग नहीं—यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना का परिणत रूप है। पश्चिम में राष्ट्र-राज्य सत्ता और करार से बनते हैं; भारत में राष्ट्र श्रद्धा और संस्कार से।भारत का राष्ट्रत्व तीन आधारों पर निर्मित है: भूमि (जननी),संस्कृति, (जीवनधारा) आदर्श पुरुष (मार्गदर्शक),राम इन तीनों के संगम पर खड़े दिखाई देते हैं। उन्हें अवतार की आवश्यकता भी शायद इसी कारण हुई—क्योंकि राष्ट्र का स्वरूप यदि ठोस रूप में किसी एक व्यक्तित्व में ढलना हो तो वह राम ही हो सकते थे।वाल्मीकि कहते हैं—

 “लोकानामुत्तमान्लोके रामः सत्यपराक्रमः।”
(लोकों में सबसे श्रेष्ठ, सत्य और पराक्रम से युक्त राम।)


राम मनुष्य भी हैं, देव भी; राजा भी हैं, वनवासी भी; पुत्र भी हैं, न्यायाधीश भी। यही राष्ट्र का सम्यक् रूप है—सत्ता और संवेदना का संगम। राम – राष्ट्र के नैतिक चैतन्य की रीढ़,राष्ट्र किसी बाहरी संरचना से नहीं—नैतिक अनुशासन से चलता है।
राम का चरित्र इस अनुशासन को जन्म देता है।सत्य,मर्यादा,कर्तव्य,समर्पण,त्याग,न्याय,ये केवल व्यक्तिगत गुण नहीं; ये वही आधार हैं जिनपर कोई भी राष्ट्र स्थिर रह सकता है।राम का राजतंत्र इसलिए आदर्श माना गया क्योंकि उसमें शासन धर्म पर आधारित था—“रामराज्यम् यथा प्राप्य”(जहाँ प्रजा दुखी न हो, शासक पक्षपात न करे, न्याय विलंबित न हो।)
आज वैश्विक राजनीति में जहाँ राष्ट्र ‘हित’ और ‘संपत्ति’ पर चलते हैं, वहाँ राम राष्ट्र को ‘धर्म’ और ‘न्याय’ की उँचाई पर ले जाते हैं।भारत का राष्ट्र तभी तक राष्ट्र है जब तक उसकी राजनीति राम के आदर्शों से संचालित है।यही कारण है कि कहा गय
“राम से ही राष्ट्र है।”

रामायण: भारत का सांस्कृतिक संविधान,रामायण केवल कथा नहीं—भारतीय मन का संविधान है।जिस प्रकार संविधान लिखित कानून है, उसी प्रकार रामायण अलिखित नागरिक संस्कारों का ग्रंथ है। राजर्षि जनक हों, वशिष्ठ-मुनीश्वर हों, वाल्मीकि हों या निषादराज—सभी राम के सहचर हैं। इसका संदेश स्पष्ट है—राष्ट्र की रचना सामूहिक चेतना से होती है, और राम उस चेतना के केंद्र में हैं।रामायण में आप देखेंगे—भूमि की रक्षा (राष्ट्र की रक्षा) नारी की प्रतिष्ठा (समाज की गरिमा)
वन–नगरी का संतुलन,समाज की बहुस्तरीय संरचना,न्याय की सर्वसुलभता
नागरिक कर्तव्य ये सभी आधुनिक ‘नेशन स्टेट’ की अनिवार्य शर्तें हैं।
इस दृष्टि से रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि राष्ट्र-ग्रंथ है।इसलिए कहा जा सकता है—रामायण राष्ट्र की ध्वनि है और राम उसका स्वर।

 राम – भारतीय भूगोल के जीवन-नाड़ी,आप भारत का कोई भाग उठाइए—
उत्तर में हिमालय, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जनकपुर, पश्चिम में द्रोणगिरि—सब पर राम की अनुगूँज है।अयोध्या – जन्मभूमि,चित्रकूट – न्यायभूमि,जनकपुर – सीता और धर्म संवाद,दंडकारण्य – संघर्ष,रामेश्वरम् – विजय और व्रत,लंका – अधर्म का शमन,अयोध्या – पुनरागमन और शासन,यह यात्रा केवल राम की नहीं; यह यात्रा भारतीय राष्ट्र-चेतना के विस्तार की यात्रा है।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था—“भारत की राजनीति की रीढ़ राम और कृष्ण हैं।”अर्थ स्पष्ट है—राम का भूगोल केवल यात्रा मार्ग नहीं; वह राष्ट्र की आत्मा का मार्ग है।
राम और भारतीय राजनीति, यहाँ “राजनीति” शब्द सुनते ही लोग पार्टी-प्रणाली सोचते हैं, जबकि भारतीय संदर्भ में राजनीति का अर्थ था—न्याय, व्यवस्था, अनुशासन और राज्य-कर्तव्य।राम इस राजनीति की पराकाष्ठा हैं।
उनसे पहले राजनीति व्यक्तिगत थी; उनसे बाद वह नैतिक राजनीति बन गई।
राम ने सत्ता को ‘अधिकार’ नहीं माना; उसे कर्तव्य माना। इसलिए वे वन चले गए, और वही त्याग उन्हें राष्ट्र का आदर्श बनाता है।किसी राष्ट्र का नेता वह होता है जो सत्ता मिलने पर नहीं, बल्कि सत्ता खोने पर भी मर्यादा न छोड़े। राम राजनीति को शुद्ध करते हैं; राष्ट्र राजनीति से ही बनता है। अतः—राम = राजनीति का आदर्श,राजनीति = राष्ट्र का आधार, इसलिए राम = राष्ट, “राष्ट्र ही राम है” – यह दूसरा आधा क्यों महत्वपूर्ण है?यदि केवल “राम से राष्ट्र है” कह दें, तो यह भाव अधूरा रहता है। जब राष्ट्र राम के आदर्शों को जी ले, तब कहा जाता है—“राष्ट्र ही राम है।”इसका आशय यह नहीं कि राष्ट्र देवता बन जाए।
अर्थ यह है कि राष्ट्र:,सत्यनिष्ठ,कर्तव्यपरायण,मर्यादापूर्ण,न्यायप्रिय,समरस,संवेदनशील हो जाए।
जब नागरिकों का सामूहिक चरित्र राम जैसा बनता है, तब राष्ट्र स्वयं राम का रूप हो जाता है। तुलसीदास इसका संकेत देते हैं— “जेहि विद्या परलोक सुखदाई।”
(जिस नीति से लोक और परलोक दोनों सुखी हों—वही राम नीति है।)

यह अनायास नहीं कि भारत की लोककथाएँ, गाथाएँ, नृत्य, पर्व, मंदिर, गीत—सब राम को राष्ट्र की देह में हृदय की तरह धड़काते हैं। राम और आधुनिक भारत
आज की राजनीति, मीडिया, समाज—सब किसी न किसी संकट से गुजर रहे हैं।
ऐसे समय में राम का स्मरण केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं; यह राष्ट्र के पुनर्जागरण का मार्ग है। राम आधुनिक भारत को क्या देते हैं?  सत्य का साहस
 झूठ और भ्रम की राजनीति को काटता है। कर्तव्य का अनुशासन
 नागरिकता को सिर्फ अधिकारों से नहीं, जिम्मेदारियों से जोड़ता है।
 नारी-सम्मान की अडिग प्रतिष्ठा, सीता का स्थान भारतीय संविधानिक चेतना का स्रोत है।  राष्ट्रीय एकता का भाव,उत्तर–दक्षिण–पूर्व–पश्चिम को जोड़ने वाला चरित्र।न्याय का धर्म— जो लव–कुश की न्यायगाथा के रूप में भी प्रकट होता है।
अतः आधुनिक भारत में राम किसी धार्मिक प्रतीक नहीं; वे राष्ट्रीय अनुशासन और आत्मसम्मान की रीढ़ हैं।
राम – विश्व मानवता के लिए आदर्श नेता,यदि नेतृत्व के वैश्विक मानदंड बनाए जाएँ—तो राम जैसा संयम, त्याग, मर्यादा, सत्य और करुणा रखने वाला नेता इतिहास में मुश्किल से मिलेगा।चाणक्य कहते हैं—
“नृपस्य मूलं धर्मः।”(राजा का मूल धर्म है)
राम वही धर्मराज्य स्थापित करते हैं जिसका स्वप्न चाणक्य भी देखते हैं। यही वजह है कि राम का आदर्श भारतीय राष्ट्र निर्माण की धुरी बन जाता है।
 राम में राष्ट्र की साँस, राष्ट्र में राम का प्रकाश,राम कोई बीते युग की स्मृति नहीं;
वे भारत के अस्तित्व का कारण हैं। राम ही वह प्रकाश हैं जिसमें राष्ट्र अपना स्वरूप पहचानता है।राम के बिना भारत भूगोल है;राम के साथ भारत राष्ट्र है।
इसलिए यह सूत्र-वाक्य केवल वाक्य नहीं—यह भारत की सांस्कृतिक घोषणा है:

“राम से ही राष्ट्र है, राष्ट्र ही राम है।”क्योंकि—धर्म से राजनीति चलती है,
नीति से समाज चलता है,और समाज से राष्ट्र।राम धर्म हैं, नीति हैं, मर्यादा हैं, न्याय हैं—यही राष्ट्र का शाश्वत आधार है।
राम क़े बिना भारत और भारत क़े बिना राम अकल्पनीय है
राजेंद्र नाथ तिवारी


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad