“वन्दे मातरम्: 1947 के बाद की संवैधानिक स्थिति”
राजेंद्र नाथ तिवारी
पंचादश श्रृंखला(15)
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में “वन्दे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, एक आध्यात्मिक राष्ट्रधर्म था। यह नारा, यह मंत्र, यह मातृभूमि की पावन आराधना — जिसने विदेशी शासन के विरुद्ध करोड़ों भारतीयों में स्वतंत्रता की ज्वाला जलाई। परन्तु 1947 के बाद लोकतांत्रिक भारत के संवैधानिक ढांचे में इसका स्थान क्या बना? क्या यह राष्ट्रगीत घोषित हुआ? क्या इसे संविधान में स्थान मिला? इन प्रश्नों का उत्तर भारत की राजनीतिक यात्राओं, संवैधानिक बहसों और राष्ट्रवादी भावनाओं के बीच छिपा है।
स्वतंत्र भारत की उसी संवैधानिक यात्रा का गंभीर और प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करता है — जिसमें वन्दे मातरम् के राष्ट्रधर्म को सम्मान देते हुए लोकतान्त्रिक विवेक की कसौटी भी शामिल रही।
स्वतंत्रता पश्चात : नई व्यवस्था और पुराने प्रतीक,15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। देश एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर अग्रसर था। ऐसे में यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण था कि राष्ट्रीय प्रतीक कौन होंगे?राष्ट्रीय ध्वज,राष्ट्रीय भाषा,राष्ट्रीय गान / राष्ट्रगीत,इन सब पर नवगठित संविधान सभा में महत्त्वपूर्ण विमर्श हुए।संविधान निर्माताओं के सामने चुनौती यह थी कि राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा को आधुनिक लोकतंत्र की मान्यताओं में संतुलित रूप से स्थापित किया जाए।वन्दे मातरम् पहले से ही देश की आत्मा बन चुका था। अतः इस गीत को उचित संवैधानिक दर्जा देने पर विस्तृत बहस शुरू हुई।
संविधान सभा में वन्दे मातरम् पर ऐतिहासिक बहस,संविधान सभा की 12 जुलाई 1948 की बैठक में यह महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया।यह प्रस्ताव आया कि वन्दे मातरम् को जन-गण-मन के साथ समान दर्जा दिया जाए।परन्तु विरोध क्यों?कुछ सदस्यों ने तर्क दिया कि—गीत में “दुर्गा”, “लक्ष्मी” आदि देवी-स्वरूपों का वर्णन है।भारत विविध धार्मिक मान्यताओं वाला देश है।संवैधानिक प्रतीक एक समावेशी भाव से चुने जाने चाहिए।भले ही यह विरोध अल्पमत में था, लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में अल्पसंख्यक भावनाएँ भी महत्वपूर्ण हैं।समर्थन का स्वरदेश के बड़े राष्ट्रनायकों और अधिकांश सदस्यों का मत था कि—वन्दे मातरम् भारत की रक्तधारा में प्रवाहित है।यह स्वतंत्रता संग्राम का आध्यात्मिक राष्ट्रधर्म है।इसे संवैधानिक मान्यता देना आवश्यक है।
नेहरू – पटेल – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की निर्णायक भूमिका,
14 अगस्त 1947 की आधी रात को स्वतंत्रता की घोषणा के उपरान्त, राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रीय गान को लेकर अंतिम निर्णय हुआ।डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का ऐतिहासिक निर्णय 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने घोषणा की —“जन-गण-मन” राष्ट्रीय गान होगा और“वन्दे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का वही सम्मान प्राप्त होगा जो राष्ट्रगान को है।यह शब्द हिन्दी में दर्ज न होने के बावजूद यह संकल्प संविधान सभा की कार्यवाही में अभिलेखित है।इस प्रकार वन्दे मातरम् को अधिस्वीकारित संवैधानिक दर्जा मिला।✧
संविधान में वन्देमातरम् का उल्लेख क्यों नहीं?:बहुतों का प्रश्न होता है —संविधान की धाराओं में “वन्दे मातरम्” लिखित क्यों नहीं?
कारण स्पष्ट था—संविधान में कला, संस्कृति और साहित्य के विस्तृत उल्लेख की परंपरा नहीं अपनाई गई।अनेक राष्ट्रीय प्रतीक संविधान के अनुलग्नों के बाहर भी मान्यता प्राप्त हैं।वन्दे मातरम् का दर्जा संसदीय परंपरा और संविधान सभा के संकल्प पर आधारित है।अतः इसकी संवैधानिक स्थिति पूर्णतः वैध और सम्मानित है. न्यायपालिका के निर्णय और व्याख्याएं:कोर्ट ने विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया है कि:वन्दे मातरम् का सम्मान नागरिक धर्म है।किसी नागरिक को बलपूर्वक इसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता — यह मौलिक अधिकार के दायरे में आता है।सम्मान — अनिवार्य गान — इच्छानुसार इससे राष्ट्रगीत की गरिमा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता — दोनों सुरक्षित रहती हैं।यही तत्कालीन षड्यंत्र का शिकार होगया वन्देमातरम, नेहरू, जिन्ना सहित मुस्लिम लीग ने बलपूर्वक एक तरह से कनपटी पर रिवाल्वर रख कर बंदेमातरम क़े साथ अघोषित अन्याय किया गया.
सरकार एवं संस्थागत मान्यता:भारत सरकार ने विभिन्न आदेश और विज्ञप्तियाँ जारी कर इसे शिक्षा संस्थानों, सरकारी कार्यक्रमों एवं राष्ट्रीय महत्त्व के अवसरों पर स्थान दिया है।स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, सरकारी समारोह, स्कूलों में प्रार्थनासभी में वन्दे मातरम् को सम्मानजनक उपस्थिति प्राप्त है।यह गीत आज भी राष्ट्र की सामूहिक चेतना को झंकृत करता है। विवाद और समाधान : लोकतांत्रिक विमर्श में कुछ राजनीतिक और धार्मिक मतभेदों ने समय-समय पर विवाद उत्पन्न किए।परन्तु राष्ट्रधर्म की दृष्टि से यह विवाद नगण्य सिद्ध हुए।भारत की लोकतांत्रिक परंपरा ने यह समाधान दिया—गीत का आध्यात्मिक अर्थ सार्वजनीन है।इसकी पहली दो पंक्तियाँ सभी समुदायों द्वारा सहज स्वीकृत हैं।यह भारत माता — भूमि देवी — का वंदन मात्र है।अतः यह विवाद विद्वेष पूर्ण विमर्श की एक प्रक्रिया मात्र रहा।
संवैधानिक नैतिकता और वन्देमातरम्:भारत एक बहुलतावादी राष्ट्र है —और वन्देमातरम् भारतीय बहुलता का प्रतीक है।यह गीत—केवल हिन्दू भावना नहींभारतीय राष्ट्रभाव की उर्जामय अभिव्यक्ति है।इसकी संवैधानिक स्थिति यह संदेश देती है कि—भारत की संस्कृति में विविधता और राष्ट्र'निष्ठा:साथ-साथ चल सकती हैं।
परन्तु मुस्लिम लीग का पूर्वाग्रह कभी भी वन्देमातरम क़े अलग होने क़े बजाय निरंतर धार्मिक प्रतिशोध की भावना कम न होसकी.

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