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शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

भारत माता क़े श्री चरणों में भक्ति का प्रसून वन्देमातरम (14)

वन्दे मातरम् — चतुर्दश श्रृंखला


राष्ट्र चेतना का महागीत 

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी — महाभारत,मातृभूमि केवल भूखंड नहीं; वह प्राणों की अधिष्ठात्री, संस्कृति की धात्री, चरित्र की जननि और स्वतंत्रता का श्रेय-आश्रय है। उसी मातृभूमि की महिमा को महाकाव्यात्मक स्वर देने वाली अमर रचना है — “वन्दे मातरम्”।यह केवल कविता नहीं, यह राष्ट्र-प्राणों का ज्वलन्त मंत्र है, जिसने दास्य-बन्धन में जकड़े भारतवासियों को स्वाधीनता का संकल्प कराया। यह गीत जब जनसमूह की धड़कन में गुंजित हुआ—तो लगा कि स्वयं भारती सिंहनाद कर उठी है। उद्भव का यशोगाथा,उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में— जब ब्रह्मावर्त का तेज अंधकार-वेष्टित प्रतीत हो रहा था—बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना की।1875 में बंगदर्शन पत्र में प्रकाशित— और 1882 में उनके उपन्यास आनन्दमठ में समाविष्ट।यह वही काल था जब भारत—आर्थिक रूप से शोषित,सांस्कृतिक रूप से लज्जित,राजनीतिक रूप से पराधीन,आत्मिक रूप से क्षीण

बंकिम ने भारत को देवी-मूर्ति की तरह प्रतिष्ठित किया—धरित्री = भारतमाता
वह माता जिसकी नदियाँ जीवनधारा, शस्य-श्यामला भूमि अमृत-उत्पादिनी, वनौषधियाँ आरोग्य-प्रदाता।“वन्दे मातरम्”—तत्कालीन समाज के लिए चेतना-बीज सिद्ध हुआ।

 धुन का दैवी रूप,प्रथम धुन जदुनाथ भट्टाचार्य ने तैयार की —मृदुल, भक्तिभावमयी, किंतु प्रेरक।स्वतंत्रता संग्राम में यह कई रूपों में गाई गई—कहीं संघर्षगर्जना,कहीं विजयमंत्र,कहीं माँ के चरणों की स्वाध्याय-स्वरवंदना।विद्यार्थी-आन्दोलन, सैनिक-दल, क्रांतिकारी सभा—हर जगह इसका उच्चारण अग्नि की ज्वाला बन चुका था।

 राष्ट्रीय चेतना में भूमिका,“वन्दे मातरम्” —दमन के विरुद्ध उद्घोष था।यह वह शंखनाद जिसने—बंग-भंग आन्दोलन को दिशा दी,तिलक, अरविन्द, लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल जैसे अग्नि-पुरुषों को ऊर्जा दी,क्रांतिकारियों के कंठ में इसे गुलामी-विदलन मंत्र बना दिया,भगत सिंह-चन्द्रशेखर आज़ाद की धड़कनों में इसे मुक्ति-लय बना दिया,यह गीत जन-भावना का वह उफान बना जिसने,गोरे शासन की नींव हिल गई।

24 जनवरी 1950 —भारतीय संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत का गौरव प्रदान किया।
यह निर्णय केवल संवैधानिक नहीं— आध्यात्मिक प्रतिष्ठा का अभिनन्दन था।

साहित्यिक और दार्शनिक प्रतिमान,इस काव्य में भारतवर्ष,न केवल माता है—वह दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती का त्रिविध संगम है।सुभ्र ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनीं,फुल्ल-कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्यहाँ प्रकृति स्वयं स्त्री-शक्ति का प्रतिरूप—संस्कृति की चिर-माता के रूप में उद्दीप्त।यह गीत तीन आयामों में भारतमाता को व्यक्त करता है—

 भौतिक— शस्य-श्यामला, मधुर-फलेन, सांस्कृतिक— कला, साहित्य, संगीत की जननि
 आध्यात्मिक— शक्तिरूपा, दुर्गा-भवानी,अतः “वन्दे मातरम्” वस्तुतः—राष्ट्राराधना का वेद-मंत्र है। वैदिक-पौराणिक आलोक,हमारे वेद कहते हैं—माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः — अथर्ववेद

भारतीय चिन्तन में—भूमि केवल धातु-कणों का संघात नहीं—ऋग्वैदिक देवी है।देवी महात्म्य में—

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता

बंकिम का काव्य—इन्हीं प्राचीन तत्त्वों का आधुनिक राष्ट्र-सूत्र है।विवाद और समाधान,गीत के बाद के पदों में दुर्गा-रूप का वर्णन—कुछ समुदायों की धार्मिक संवेदना में प्रश्न बना।किन्तु—भारत एक बहुरंगी संस्कृति;गीत का मूल पहला व दूसरा पद सर्वसमावेशी—इन्हीं का राष्ट्रीय उपयोग स्वीकार किया गया।यह निर्णय—सम्मान का संतुलन और राष्ट्रभाव की अखण्डता दोनों का रक्षक।७

वन्दे मातरम्—भावसिन्धु,यह गीत जब हृदय से फूटता है—तो यह पुकार बन जाता है:

“हम माँ की संतान हैं—और संतान का प्रथम धर्म मातृ-सेवा।”यह गीत भारतवासियों का आत्मसम्मान है।इसी भावना को काव्य में समर्पित एक मौलिक वन्दना—

मातृभूमि-स्तोत्र (मौलिक रचना)

**जयति जयति भारतमाता!
चन्द्रकर-प्रभामय पावन गाता।

नीलगिरि-कण्ठे मेघ-निनादा,
गंगायमुनायोः पयः-सुप्रसादा।

शस्य-श्यामला तव अंक-अर्पिता,
सुवर्ण-शस्यस्य सुगन्धिता।

दुर्गे! त्वं सिंहवाहिनी शक्तिरूपा—
नाशय दस्यु-अधर्म-अतिनिरूपा।

लक्ष्मि! त्वं सौभाग्य-प्रदा,
कण-कण में तेज-सुधा।

वाग्देवि! वेदस्वर-धारिणि,
संस्कृति-संरक्षिका भाजन-विचारिणि।

तव चरण-कमलों में जीवन-न्यौछावर—
तव जय-जयकार: वन्दे मातरम्।*

  राष्ट्रभाव का अजस्र स्त्रोत,वन्दे मातरम्—भारत की आत्मा का स्वर है।युग बदलें, शासन बदलें—पर मातृभूमि का गौरव शाश्वत।यह गीत हमें स्मरण कराता है—“भारत केवल राष्ट्र नहीं —सनातन सभ्यता का प्रकाश है।”और हम—उस प्रकाश के दीपवाहक।

अंतिम प्रणाम,वन्दे मातरम् केवल कहा नहीं जाता—यह जिया जाता है।यह राष्ट्रभक्तों की चिर-शपथ है—कि हम माँ के चरणों की रक्षा में—अंतिम श्वास तक अडिग रहेंगे।

क्रमशः--पंच दश श्रृंखला

राजेंद्र नाथ तिवारी


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