अखिलेश यादव के 'पीडीए' की अवधारणा आज उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र बना दी गई है, लेकिन यथार्थ में इसका आधार काफी कमजोर व भ्रमपूर्ण है—यह पिछड़े, दलित और मुस्लिम वर्गों को केवल सत्ता की आस में एकसाथ लाने का प्रयास मात्र प्रतीत होता है, जिसके सामाजिक और नीतिगत निष्कर्ष बेहद सीमित रहे हैं.लोहिया, मुलायम और समाजवाद की राह,डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में समाजवाद का असली उद्देश्य पिछड़ों की हिस्सेदारी, मेरिट और वैचारिक निष्ठा का संतुलन था—इस आधार ने कर्पूरी ठाकुर, और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को जन्म दिया. मुलायम सिंह यादव ने समावेशी नेतृत्व का उदाहरण स्थापित किया था, जहां हर समाज को साथ लेने की मूल भावना प्रमुख रही.'पीडीए' का भ्रमजाल और परिवारवादआज क्षेत्रीय राजनीति में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का शोर एक भ्रमजाल सा बन गया है, जो समाजवाद के मूल आदर्शों को कमजोर करता है.
खुद समाजवादी पार्टी पर भी परिवारवाद के आरोप गंभीर रहे हैं—अखिलेश यादव के परिवार के अनेक सदस्य राजनीति और सत्ता में हैं, जिससे पार्टी की नीतिगत प्रतिबद्धता संदेह के घेरे में आती है. यह ट्रेंड भाजपा समेत लगभग सभी प्रमुख दलों में देखा जा सकता है, जहां संगठन और सत्ता पटल पर परिवार की संख्या लगातार बढ़ी है.नीतीश कुमार बनाम कुनबावाद बिहार में नीतीश कुमार जैसा राष्ट्रीय कद का कुर्मी नेता सुशासन का प्रतीक रहा है, उनके खिलाफ पीडीए के आधार वर्ग को उन सामूहिक कुनबों के हाथ सौंपने की राजनीति हुई जिनकी पहचान 'जंगलराज' रही है. सामाजिक चेतना वाले लोग पूछते हैं—क्या बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछड़े वर्गों के लिए नीतीश कुमार से बेहतर प्रतिनिधित्व संभव है? क्या किसी एक कुनबे के हित में पिछड़ों का नाम लेकर राजनीति करना उनके साथ धोखा नहीं है?मोदी, सरदार पटेल और सनातनी एकता जब बिहार में चुनावी परिणाम सर्वसमाज और सनातनी एकता के पक्ष में आ रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश के कुर्मी समाज और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए स्थिर, ईमानदार व विकासोन्मुख नेतृत्व के साथ खड़ा होना स्वाभाविक विकल्प दिखाई देता है.
लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की राह पर चलना व सनातन समाज की एकजुटता को मजबूत करना ही भविष्य के लिए टिकाऊ समाधान हो सकता है.अखिलेश यादव का 'पीडीए' नारा एक सामाजिक मृगतृष्णा बनता जा रहा है, जिसका धरातल कमजोर व नीतिगत दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं है। परिवारवाद और अवसरवादी राजनीति ने समाजवाद के मूल आदर्शों को भटका दिया है, जबकि बिहार के अनुभव यह संकेत देते हैं कि 'सर्वसमाज' व सनातनी एकता ही स्थायी सुधार का मार्ग बता रही है.अखिलेश भाजपा क़े चक्रब्यूह क़े कही पार पाने की स्थिति में दीखते ही नहीं.

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