विभर्म दूर होना ही चाहिए, पवित्र संस्था पर अपवित्र दाग?
“बस्ती पूछ रहा है — रेड क्रॉस में असली गुनहगार कौन?”
बस्ती उत्तर प्रदेश
जनपद की इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी — मानवता की सेवा का प्रतीक।पर सवाल यह है कि यहाँ सेवा बची है… या सियासत?अस्पताल के लाइसेंस रद्द होते हैं,मरीजों की उम्मीदें टूटती हैं,आरोपों के पहाड़ खड़े होते हैं—और सत्ता-सिस्टम की चुप्पी?जगह बदलकर तालियाँ बजाने लगती है।जिसकी क्लिनिक सीएमओ ने खुद बंद की, वह अध्यक्ष कैसे बना?कल तक“नियम-उल्लंघन”,“फर्जी दस्तावेज़”और “रोगियों की सुरक्षा” का हवाला देकर दरवाज़ा बंद कर दिया गया।आज वही व्यक्ति रेड क्रॉस की कुर्सी पर सुशोभित?कोई तो शक्ति है,जो रातों-रात “अपराधी” को “आदरणीय” बना देती है!
ज़िम्मेदार कौन: अध्यक्ष? सीएमओ? जिलाधिकारी? या फिर सब मिलीभगत में?यदि अध्यक्ष निर्दोष हैं —तो सीएमओ और डीएम झुककर सार्वजनिक रूप से माफी क्यों नहीं माँगते?यदि आरोप सही हैं —तो उन्हें सर्वोच्च पद पर क्यों बनाए रखा गया है? या फिर…दोनों मिलकर खेल रहे हैं?और जनता को बना दिया गया है मूर्ख?फर्जी सदस्य बढ़ाओ, सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाओ — यही फॉर्मूला?चुनाव से ठीक पहले रातों-रात सदस्य बनाए गए,सैकड़ों लोगों को आजीवन सदस्यता |क्यों? किसके आदेश पर?क्या यह रेड क्रॉस हैया किसी गैंग का भर्ती-केंद्र?
लोग कहते हैं—“यहाँ सेवा नहीं,स्वार्थ और सत्ता का ट्रांसफ्यूज़न चल रहा है।”विश्वास की नसें काट दी गईं।जनता बेहाल—और अधिकारी मालामाल।बस्ती का एक-ही सवाल:“दोषी कौन?”लेकिन सत्ता-तंत्र जवाब देने के बजाय—कुर्सी की सुरक्षा में चौकीदार बन बैठा है।
जब तक जवाब नहीं मिलता —तब तक यह सवाल हर रिपोर्ट, हर खबर, हर मंच पर गूँजता रहेगा:“अख़िर दोष किसका है?”और लाल क्रॉस के पीछे काली सियासत कौन चला रहा है?”
“रेड क्रॉस का रेड अलर्ट: भ्रष्टाचार का इमरजेंसी वार्ड खुला है.
सीएमओ को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए डॉक्टर प्रमोद सही या प्रबंध समिति सहित या शिकायतकर्ता सहित तीनों में एक ही सही हो सकता है आखिर कब तक?
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