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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

कांग्रेस का भविष्य पुराण :गाँधी परिवार की प्रेत छाया से मुक्ति, अन्यथा कांग्रेस की भूमिका समाप्त!!

 राजनीतिक विलुप्तता की और बढ़ती कांग्रेस!

" राजेंद्र नाथ तिवारी के साथ टीम कौटिल्य "



1965 मे पटना में पत्रकार वार्ता करते समय तत्कालीन जनसंघ के राष्ट्रीय महामंत्री पंडित दीनदयाल उपाध्याय से पत्रकारों ने पूछा था की क्या आप कांग्रेस विहीन भारत की कल्पना कर रहे हैं तो उन्होंने कहा था ऐसा नहीं है जिस दिन भारत से कांग्रेस देश से समाप्त हो जाएगी vh दिन लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत होगा,वह शुभ दिन राहुल के नेतृत्व में धीरे-धीरे विपक्ष विहीन अवसान की ओर बढ़ रहा है.

 


कांग्रेस आज खुद को राजनीतिक दबाव और संकट के गहरे अंधकार में पाई जा रही है, जहां उसके अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लग चुका है। बिहार चुनाव 2025 में मिली करारी हार ने पार्टी की कमज़ोरी को बेबाकी से उजागर कर दिया है, जहां कांग्रेस 61 में से सिर्फ 6 सीटें जीत पाई, जबकि NDA ने 202 सीटें लेकर उसका निर्दोष विनाश किया। यह हार पार्टी के लिए सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि पूरी राष्ट्रीय साख का पतन है। वोट बैंक टूट चुका है, खासकर मुस्लिम-यादव और OBC/EBC वर्ग में, और पार्टी की नेतृत्वहीनता सार्वजनिक रूप से दिख रही है। 

राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व के खिलाफ खुलेआम कमी और संघर्ष ने पार्टी को अंदर से खोखला कर दिया है।कांग्रेस की राजनीति अब 'आक्रामकता' के नाम पर एक मुखौटा बन चुकी है, जो कथित विरोध का मंच  पर कर्मकांड करती दिखती है लेकिन असल में रणनीतिक विफलता की गाथा कहती है। राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व ने रामलीला मैदान से संसद तक फर्जी मतदाता, वोट चोरी और चुनाव आयोग की नाकामी के मुद्दे को लेकर जोरदार विरोध करने की घोषणा की है, लेकिन यह विरोध असली राजनीतिक जमीन से कट चुका है और सिमटता जा रहा है।

 कांग्रेस के नेताओं की कटु भाषा और आक्रामक रुख ने गठबंधन सहयोगियों जैसे RJD और SP के साथ संबंधों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे महागठबंधन में दरार का खतरा मंडरा रहा है।भविष्य के लिए पार्टी के पास अगर बदलाव की स्पष्ट नीति और नया नेतृत्व न उठा, तो कांग्रेस का भारत में विपक्ष के रूप में अस्तित्व ही खतरे में है। 2026-29 के बीच पार्टी को अगर तेज़ी से स्वायत्त, युवा नेतृत्व, डिजिटल और समावेशी रणनीति नहीं दी गई तो वह मैदान से पूरी तरह बाहर हो सकती है। हाल के सुधार और युवा जिला अध्यक्षों की नियुक्ति महज दिखावा हैं, जो जमीनी असंतोष को छुपा नहीं पा रहे। गांधी परिवार की सत्ता और दशकों पुरानी पैतृक राजनीति पार्टी की नकारात्मक छवि को और मजबूत कर रही है, जिसकी कीमत पार्टी को 2029 के लोकसभा चुनाव में भारी पड़ेगी।

कुल मिला कर कांग्रेस अब आक्रामकता की राजनीति में खुद को खो चुकी है, जहां वह अपने सामाजिक और जातीय गठबंधन टूटने, नेतृत्व पर विवाद, और गठबंधन सहयोगियों के साथ झगड़े के चलते शक्तिहीन होती जा रही है। इसका "संघर्षात्मक अस्तित्व" बहुत जल्द "राजनीतिक विलुप्तता" में बदल सकता है, यदि तत्काल और व्यापक राजनीतिक पुनर्गठन नहीं हुआ। विपक्ष की परिभाषा में कांग्रेस तेजी से "कमजोर कड़ी" बनती जा रही है, जो ना तो अपने वोटरों को राजनैतिक आत्मविश्वास दे पा रही है, ना ही राष्ट्रीय मंच पर प्रभावी आवाज़ बना पा रही है.

संविधान विरोध भी नकारात्मक कर्मकांड, जो सलाहकार लाखों की फीस से राय देता हो 

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