कौटिल्य दृष्टि
विज्ञान की ऊँची उड़ान, पर विवेक के बिना अधूरा मनुष्य
बस्ती ,272001
मानव सभ्यता अपने इतिहास के सबसे शक्तिशाली दौर में प्रवेश कर चुकी है। विज्ञान ने प्रकृति के रहस्यों को खोल दिया है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने सोचने की प्रक्रिया को चुनौती दी है, अंतरिक्ष अब केवल कल्पना नहीं, प्रयोगशाला बन चुका है। मनुष्य समुद्र की गहराइयों से लेकर मंगल ग्रह तक पहुँचने की तैयारी कर रहा है। यह उपलब्धियाँ निस्संदेह अद्भुत हैं। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य वास्तव में उतना ही महान हुआ है, जितना शक्तिशाली हुआ है? आज विज्ञान, व्यापार, धन, बुद्धि और तकनीक विश्व व्यवस्था के केंद्र में हैं। इनके सहारे राष्ट्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर युद्ध भी बढ़ रहे हैं, हथियारों की होड़ तेज हो रही है, आतंकवाद नए रूप ले रहा है, परिवार बिखर रहे हैं, मानसिक तनाव बढ़ रहा है और मनुष्य का विश्वास मनुष्य पर ही कम होता जा रहा है। स्पष्ट है कि केवल विज्ञान मानवता को सुरक्षित नहीं बना सकता। विज्ञान ने हमें बताया कि परमाणु को कैसे विभाजित किया जाए, लेकिन यह नहीं बताया कि उसका उपयोग ऊर्जा के लिए होगा या विनाश के लिए। उसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना दी, लेकिन यह निर्णय आज भी मनुष्य को ही करना है कि उसका प्रयोग शिक्षा, चिकित्सा और मानव कल्याण के लिए होगा या निगरानी, नियंत्रण और शोषण के लिए।समस्या विज्ञान में नहीं है; समस्या उस मनुष्य में है, जिसके हाथों में विज्ञान की शक्ति है। जब बुद्धि से संस्कार अलग हो जाते हैं, जब ज्ञान से करुणा अलग हो जाती है और जब शक्ति से नैतिकता हट जाती है, तब सभ्यता का पतन आरम्भ होता है। आज का मनुष्य सुविधा से सम्पन्न है, लेकिन संतोष से नहीं। उसके पास साधन हैं, पर उद्देश्य नहीं; सूचना है, पर आत्मज्ञान नहीं; गति है, पर दिशा नहीं। विज्ञान ने जीवन को तेज बना दिया है, लेकिन आवश्यक नहीं कि उसने उसे श्रेष्ठ भी बनाया हो। भारतीय संस्कृति ने कभी विज्ञान का विरोध नहीं किया। हमारे ऋषियों ने ज्ञान को सदैव धर्म, नीति और लोकमंगल से जोड़ा। यहाँ विज्ञान का उद्देश्य प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन था। यही कारण है कि भारत की ज्ञान परंपरा में प्रयोगशाला और तपशाला दोनों का समान महत्व है। आज पूरी दुनिया को इसी संतुलन की आवश्यकता है। यदि विज्ञान का हाथ संस्कृति थामे, यदि तकनीक का मार्गदर्शन नैतिकता करे और यदि बुद्धि के साथ विवेक भी चले, तभी मानवता सुरक्षित रह सकती है। अन्यथा विज्ञान की यही ऊँची उड़ान, अग्नि के उन पंखों में बदल सकती है जो मानव सभ्यता को ही जला दें। इतिहास गवाह है कि जिन सभ्यताओं ने शक्ति को ही सर्वोच्च मान लिया, वे अंततः अपने ही अहंकार का शिकार हुईं। भारत के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। वह विश्व को केवल तकनीक नहीं, बल्कि तकनीक के साथ मानवीय मूल्यों का मार्ग भी दिखा सकता है। यही भारत की वास्तविक शक्ति है और यही उसकी वैश्विक भूमिका भी।
कौटिल्य दृष्टि स्पष्ट है—"विज्ञान मानवता का सेवक बने, स्वामी नहीं। बुद्धि का विकास तभी सार्थक है, जब उसके साथ संस्कार, संवेदना और आत्मसंयम भी विकसित हों। अन्यथा अग्नि के पंखों पर बैठी सभ्यता जितनी ऊँची उड़ान भरेगी, उसका पतन भी उतना ही भयानक होगा।"
अन्यथा विज्ञानमेव जयते,की जगह ज्ञानमेव जयते ही सहारा बचेगा!

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