जब कानून ने दरवाज़ा खटखटाया: क्या अब भ्रष्टाचार के साम्राज्य का अंत निकट है?
दिल्ली, सम्वाददाता
सेवानिवृत्ति का दिन सामान्यतः सम्मान, विदाई और उपलब्धियों के स्मरण का दिन होता है। किंतु जब उसी दिन किसी वरिष्ठ अधिकारी को कथित करोड़ों रुपये के बैंक घोटाले के मामले में गिरफ्तार किया जाता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं रहती—यह पूरे तंत्र के लिए चेतावनी बन जाती है।
वर्षों से देश की जनता यह प्रश्न पूछती रही है कि क्या कानून केवल आम नागरिक के लिए है? क्या ऊँचे पदों पर बैठे लोग जवाबदेही से परे हैं? यदि जांच एजेंसियाँ बिना पद और प्रतिष्ठा की परवाह किए कार्रवाई कर रही हैं, तो यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है। लेकिन कार्रवाई का वास्तविक मूल्य तभी है, जब जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध हो तथा अंतिम निर्णय न्यायालय के समक्ष साक्ष्यों के आधार पर हो।
भ्रष्टाचार केवल सरकारी खजाने की चोरी नहीं है; यह उस किसान की आशा की चोरी है, जो बेहतर सिंचाई चाहता है; उस छात्र के भविष्य की चोरी है, जो अच्छे विद्यालय का सपना देखता है; उस गरीब मरीज के अधिकार की चोरी है, जो सरकारी अस्पताल में उपचार की प्रतीक्षा करता है।
भारत को विश्वगुरु बनने का मार्ग केवल ऊँची आर्थिक विकास दर से नहीं मिलेगा। इसके लिए ईमानदार प्रशासन, पारदर्शी शासन और ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति यह जानता हो कि सार्वजनिक धन राष्ट्र की अमानत है, निजी संपत्ति नहीं।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी आरोपी को न्यायालय के निर्णय से पहले दोषी न माना जाए। कानून का शासन इसी सिद्धांत पर चलता है कि न्याय साक्ष्यों के आधार पर होता है, भावनाओं के आधार पर नहीं।
अब देश को प्रतीकात्मक कार्रवाइयों से आगे बढ़ना होगा। यदि किसी ने जनता के धन के साथ विश्वासघात किया है, तो उसकी अवैध संपत्ति की पहचान हो, क्षति की भरपाई सुनिश्चित हो और दोष सिद्ध होने पर ऐसा दंड मिले जो भविष्य के लिए नज़ीर बने। वहीं यदि आरोप सिद्ध न हों, तो निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी पूरी तरह बहाल की जाए।
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