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शनिवार, 4 जुलाई 2026

“जब शक्ति ने धर्म-नगरी में प्रवेश किया”

 सीतायण,अध्याय 5: अयोध्या आगमन

“जब शक्ति ने धर्म-नगरी में प्रवेश किया”





सरयू की ओर,मिथिला के जिन आँगनों में सीता ने अपनी बाल्यावस्था के गीत गाए थे, वे अब पीछे छूट चुके थे। पंचशत योजन की यात्रा में रथों की घरघराहट के साथ-साथ एक और ध्वनि निरंतर बजती रही , प्रजा की जयकार, जो वर-वधुओं को नहीं, मानो किसी उतरते हुए वरदान को देख रही थी। मार्ग में जो वृक्ष सूखे पड़े थे, वे भी हरित हो उठे ऐसा जनश्रुति कहती है। यह केवल कवि-कल्पना नहीं, इस सत्य का संकेत है कि जिस स्त्री का रथ उस मार्ग से गुजर रहा था, वह प्रकृति की अधिष्ठात्री थी, न कि प्रकृति की दासी।

सरयू के तट पर जब रथ रुके, तो सीता ने पहली बार उस नदी को देखा जो अब उनके जीवन की साक्षी बनने वाली थी। गंगा-तनया सरयू की लहरों ने जैसे उन्हें प्रणाम किया हो — जल की धारा क्षण भर के लिए स्थिर हुई, फिर वेग से बह चली। साथ चल रहे ऋषि-मुनियों में से एक वृद्ध तपस्वी ने यह दृश्य देखकर धीमे स्वर में कहा “यह नदी नहीं झुकती, न वायु के लिए, न सूर्य के लिए। आज यह झुकी है, तो कारण अन्यत्र है।”


धर्म-नगरी का द्वार,अयोध्या के प्रवेश-द्वार पर जो दृश्य था, उसका वर्णन इतिहास ने बड़े यत्न से किया है — स्वर्ण-तोरण, केले के वृक्षों की पंक्तियाँ, घट सजाए खड़ी स्त्रियाँ, और आकाश में उड़ते पताकाओं का सागर। किंतु इतिहास प्रायः यह भूल जाता है कि उस भीड़ में कितने नेत्र वर राम को देख रहे थे और कितने वधू सीता को। सत्य यह है कि जितनी जिज्ञासा राम के पराक्रम पर थी, उससे कम न थी वह जिज्ञासा जो मिथिला की उस राजकुमारी के विषय में थी जिसने स्वयंवर में शिव-धनुष को उठते देखा था।

बालक कंधों पर चढ़कर झाँक रहे थे, वृद्ध स्त्रियाँ आँचल में अक्षत-पुष्प लिए द्वार पर खड़ी थीं। जब सीता का रथ द्वार से भीतर बढ़ा, तो जन-समूह में एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया — वह सन्नाटा जो श्रद्धा से उपजता है, भय से नहीं। फिर जयघोष उठा, इतना प्रबल कि सरयू के उस पार तक सुनाई दिया, ऐसा वर्णन मिलता है।


आदि-शक्ति की झलक,समाज ने युगों-युगों तक स्त्री को एक निश्चित परिभाषा में बाँधा है। मनुस्मृति का वह श्लोक आज भी पाठशालाओं में उद्धृत किया जाता है

“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”अर्थात् , पिता बचपन में रक्षा करता है, पति यौवन में, पुत्र वृद्धावस्था में; स्त्री कभी स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं होती। यही वह दृष्टि थी जिससे अयोध्या की भीड़ ने उस दिन सीता को देखा ,दशरथ-पुत्र राम की भार्या, जो अब ससुराल के संरक्षण में प्रवेश कर रही थी। किंतु यह दृष्टि अधूरी थी, क्योंकि जिस स्त्री की वे अगवानी कर रहे थे, वह संरक्षण की भूखी नहीं, संरक्षण की स्रोत थी।

नगर के भीतर एक वृद्धा तपस्विनी, जो वर्षों से सूर्य-मंदिर की सेविका थी, भीड़ में सबसे आगे खड़ी थी। जब सीता का रथ उसके निकट से गुजरा, तो उसने पलक झपकते देखा , रथ पर बैठी राजकुमारी के मुख पर क्षण भर के लिए एक तेज उभरा, जैसे दीपक की लौ में अचानक हवा का झोंका लगे और वह प्रचंड हो उठे। तपस्विनी की आँखें चौंधिया गईं। उसने हाथ जोड़कर सिर झुका लिया और बुदबुदाई , वह श्लोक जो देवी के आदि-रूप का वर्णन करता है

“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”

अर्थात् , जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन्हें बारंबार नमन है। यह श्लोक किसी उत्सव के लिए नहीं रचा गया था, फिर भी उस क्षण उस वृद्धा के कंठ से यही निकला क्योंकि जो दृश्य उसने देखा, वह मात्र एक राजकुमारी के आगमन का नहीं, प्रकृति के अपने अधिष्ठान में लौटने का दृश्य था।

यही सीतायण का मूल स्वर है ,सीता को उस दिन अयोध्या की भीड़ ने वधू के रूप में देखा, पर वे यह नहीं जान सकीं कि जिसे वे ‘घर की बहू’ कहकर स्वीकार रही थीं, वह स्वयं उस घर, उस वंश और उस राज्य की आधार-शक्ति बनने जा रही थी। पुराणों में राम को विष्णु का अवतार कहा गया है, और आदिकवि वाल्मीकि ने बालकाण्ड में नारद के मुख से राम के गुणों का वर्णन करते हुए लिखा ,

“विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत् प्रियदर्शनः।”

अर्थात् — पराक्रम में विष्णु के समान और दर्शन में चंद्रमा के समान प्रियदर्शी। यदि राम विष्णु के तुल्य हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सीता किसके तुल्य हैं। उत्तर सरल है, पर समाज ने उसे सदा दबाए रखा ,विष्णु के साथ सदैव लक्ष्मी हैं, और लक्ष्मी कभी विष्णु की छाया नहीं, विष्णु की शक्ति हैं, जिनके बिना सृष्टि का पालन असंभव है। सीता इसी शक्ति का सगुण रूप थीं, जो अयोध्या में मात्र निवास करने नहीं, अयोध्या को धारण करने आई थीं।


“पुरुष को यश देने वाला इतिहास लिखा जाता रहा, पर जिस शक्ति ने उस यश को धारण किया, उसका नाम पदचिह्नों में दब गया सीतायण उन्हीं पदचिह्नों को पढ़ने का प्रयास है।”



राजमहल में प्रवेश,राजमहल के मुख्य द्वार पर कौशल्या स्वयं आरती का थाल लिए खड़ी थीं। जब सीता ने झुककर उनके चरण स्पर्श किए, तो कौशल्या ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। कहते हैं, उस आलिंगन में कौशल्या को क्षण भर के लिए वही अनुभूति हुई जो वर्षों पहले उन्हें विष्णु-यज्ञ की अग्नि के समक्ष हुई थी ,शांति, तेज और सुरक्षा का एक साथ अनुभव। कैकेयी और सुमित्रा ने भी सीता का स्वागत उसी उल्लास से किया, यद्यपि आगे के अध्यायों में यही महल भिन्न-भिन्न परीक्षाओं का साक्षी बनेगा।उस रात्रि अयोध्या के दीप देर तक जलते रहे। नगरवासी यह मानकर सोए कि उन्होंने अपने भावी सम्राट की भार्या का स्वागत किया है। किसी को यह आभास नहीं था कि जिस स्त्री का स्वागत उन्होंने पुष्प-वर्षा से किया, इतिहास एक दिन उसी के त्याग और परीक्षाओं पर मौन साध लेगा , जबकि अयोध्या के हर कोने में राम के नाम के मंदिर बनेंगे, सीता के नाम पर बस स्मृतियाँ शेष रहेंगी।

उपादेय विचार जिस समाज ने स्त्री-शक्ति को केवल संरक्षण की आवश्यकता वाली मानकर परिभाषित किया, उसी समाज के प्रत्येक शुभ कार्य के मूल में स्त्री की शक्ति ही अधिष्ठात्री रही है। सीतायण यही स्मरण कराने का प्रयास है , गृह-प्रवेश केवल स्त्री का सम्मान नहीं, स्वयं शक्ति का उस स्थान को धन्य करना है, जहाँ वह पग रखती है।



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