पाणिग्रहण,मिथिला का दिव्य विवाह-महोत्सव
धनुष यज्ञ की गूँज अभी शांत भी न हुई थी, परशुराम का तेज अभी शमित होकर लौटा ही था कि मिथिलापुरी एक नए उल्लास में डूबने लगी। जनकपुर के प्रांगण में अब वीरता के स्वर नहीं, मंगल-गीतों के स्वर गूँज रहे थे। यह क्षण केवल चार विवाहों का साक्षी नहीं बनने जा रहा था — यह क्षण था धर्म और शक्ति के, ज्ञान और सेवा के, त्याग और समर्पण के चार पवित्र संगमों का, जिनमें सबसे तेजस्वी संगम था — जानकी और राघव का।
द्वाराचार , वर-यात्रा का दिव्य स्वागत::अयोध्या से दशरथ जी अपने चारों पुत्रों, गुरु वशिष्ठ, कुल-पुरोहितों और विशाल बरात के साथ मिथिला पधारे। नगर के प्रत्येक द्वार को स्वर्ण-कलशों, आम्र-पल्लवों और पुष्प-वंदनवारों से सजाया गया था। जनक जी स्वयं अपने मंत्रियों सहित द्वार पर खड़े होकर समधी दशरथ का स्वागत करने आए — यह दृश्य केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं था, यह दो आदर्श राज्यों — कोसल की शक्ति और मिथिला के ज्ञान — के मिलन का प्रतीक था।
तं दृष्ट्वा नरशार्दूलं राजा दशरथं तदा। प्रत्युद्ययौ प्रहृष्टात्मा पुत्रवत्सलतां गतः॥
वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड
अर्थात् — नरश्रेष्ठ राजा दशरथ को देखकर जनक जी अत्यंत प्रसन्न-हृदय होकर, पुत्र के समान स्नेह से भरकर उनके स्वागत हेतु आगे बढ़े। यह पंक्ति स्वयं यह सिखाती है कि सच्चा संबंध पद और वैभव से नहीं, हृदय की उदारता से बनता है।
पाणिग्रहण संस्कार — मंत्र, अग्नि और साक्षी::मंडप के मध्य प्रज्वलित यज्ञाग्नि साक्षी बनी। जनक जी ने अपनी अपार संपदा के बीच खड़े होकर भी सबसे बड़ा दान — अपनी पुत्री का हाथ पूर्ण विनम्रता से राम के हाथों में सौंपा। यही 'कन्यादान' की सच्ची भावना है — दान देने वाला स्वयं को धन्य मानता है, यह अहसास कराना कि त्याग में ही सच्चा ऐश्वर्य छिपा है।
इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव। प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना॥
वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग ७३
जनक जी के इस वचन का सार है , "यह सीता मेरी पुत्री है, यह अब तुम्हारी सहधर्मचारिणी होगी। इसे स्वीकार करो, तुम्हारा कल्याण हो, अपने हाथ से इसका हाथ ग्रहण करो।" ध्यान देने योग्य शब्द है 'सहधर्मचारिणी' पत्नी को दासी या अनुगामिनी नहीं, बल्कि धर्म-पथ की सह-यात्री कहा गया। यही भारतीय विवाह-दर्शन की मूल आत्मा है, जिसे आज के समाज को पुनः समझने की आवश्यकता है। इसके पश्चात संपन्न हुई सप्तपदी — अग्नि के सात फेरों में बंधे सात वचन, जो केवल कर्मकांड नहीं, जीवन-दर्शन के सात स्तंभ हैं: प्रथम पद — अन्न और पोषण के साझे दायित्व का वचनm द्वितीय पद —,शारीरिक व मानसिक बल में परस्पर सहयोग का वचनतृतीय पद — धर्म-अर्थ-काम के संतुलित जीवन का वचन,चतुर्थ पद , पारिवारिक सुख-समृद्धि में समान भागीदारी का वचन पंचम पद , संतति की उत्तम शिक्षा-दीक्षा का वचन, षष्ठ पद — ऋतु-अनुकूल संयम व स्वास्थ्य का वचन, सप्तम पद — आजीवन मित्रता, समानता और साथ का वचन
उपादेयता — आज के जीवन में सप्तपदी का अर्थ,जिस प्रकार सप्तपदी में पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ बराबरी से चलने की प्रतिज्ञा लेते हैं, उसी प्रकार आज के दांपत्य जीवन में भी उत्तरदायित्वों का बंटवारा ,चाहे वह अर्थोपार्जन हो, गृहकार्य हो या संतान-पालन — समता के भाव से होना चाहिए। उदाहरणस्वरूप, जैसे राम ने वन-गमन में सीता को पीछे नहीं छोड़ा और सीता ने भी राजमहल का सुख त्यागकर वन का कष्ट सहर्ष स्वीकारा, वैसे ही आधुनिक दंपत्ति को भी सुख-दुःख दोनों में समान भागीदार बनना सिखाती है यह सप्तपदी।
यह प्रसंग हमें स्मरण कराता है कि विवाह कोई स्वामी-सेवक संबंध नहीं, अपितु दो समान आत्माओं का सहयात्रा-संकल्प है।
जानकी के हृदय के भाव;;सप्तपदी के प्रत्येक चरण में जानकी की आँखों में भाव बदलते गए। एक ओर पितृगृह से विदा का विषाद उमड़ रहा था, दूसरी ओर उस तेजस्वी पुरुष के साथ नए जीवन का उत्साह। सीता का यह द्वंद्व केवल एक कन्या का द्वंद्व नहीं था — यह प्रत्येक उस नारी का प्रतिनिधि भाव था, जो अपने मूल स्थान को छोड़कर नए कर्तव्य-पथ पर पग रखती है। किंतु सीता के मुख पर भय नहीं, दृढ़ संकल्प था — मानो पृथ्वी से जन्मी वह कन्या भलीभांति जानती थी कि उसका जीवन किसी साधारण पथ पर नहीं, धर्म-रक्षा के महान अध्याय की ओर बढ़ रहा है।"जो पृथ्वी की गोद से उठी थी, वह अब पृथ्वी के धर्म की रक्षा हेतु चल पड़ी थी — यही जानकी के मौन संकल्प की भाषा थी।"
चार भ्राताओं का चतुर्विध विवाह::इसी शुभ मुहूर्त में तीन अन्य विवाह भी संपन्न हुए, जिससे यह पर्व 'चतुर्विवाह' के नाम से इतिहास में अमर हो गया:राम-सीता — कोसल के तेज और मिथिला के ज्ञान का मिलन, धर्म का आदर्श युग्म लक्ष्मण-उर्मिला — सेवा और त्याग की प्रतिमूर्ति, जिसका बलिदान इतिहास में सदा अल्पचर्चित रहा किंतु अतुलनीय था, भरत-मांडवी — कर्तव्यनिष्ठा और वैराग्य के समन्वय का प्रतीक युग्म शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति — मौन सेवा और अटूट भ्रातृ-भक्ति का प्रतीक युग्म,यह चतुर्विवाह भारतीय संस्कृति की उस विलक्षण दृष्टि का प्रमाण है, जहाँ भाईचारे का बंधन केवल रक्त-संबंध तक सीमित न रहकर वैवाहिक जीवन में भी एकसाथ प्रवाहित हुआ। चार बहनें चार भाइयों की धर्मपत्नी बनीं और इस प्रकार दो राजवंश सदा के लिए एक आत्मा में गुँथ गए।
जनक का उपदेश-वचन;;विवाह के पश्चात जनक जी ने अपनी चारों पुत्रियों तथा दामादों को जो उपदेश दिया, वह आज भी शासन और गृहस्थ जीवन दोनों के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा कि राजपाट और गृहस्थी — दोनों का आधार एक ही है: कर्तव्य में अटूट निष्ठा। जनक स्वयं 'विदेह' कहलाते थे — देह के बंधन से परे, राजसिंहासन पर बैठकर भी योगी की भांति निर्लिप्त। यही उनका सबसे बड़ा उपदेश था — वैभव के मध्य रहकर भी वैराग्य की दृष्टि रखना।
उदाहरण — जनक का 'राजर्षि' आदर्श आज के नेतृत्व के लिए जनक जी सिंहासन पर बैठकर भी हल जोतते थे और प्रजा के दुःख-सुख में स्वयं सम्मिलित रहते थे — यह आज के हर उत्तरदायी नागरिक, प्रशासक और नेता के लिए अनुकरणीय उदाहरण है कि पद ऊँचा होने पर भी भूमि से जुड़ाव नहीं टूटना चाहिए। जिस प्रकार जनक ने अपनी पुत्री को स्वतंत्र चिंतन और साहस का संस्कार दिया, उसी प्रकार आज के अभिभावकों को भी अपनी संतानों को, विशेषतः पुत्रियों को, निर्भीक और आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा इस प्रसंग से लेनी चाहिए।
विदाई — करुणा और गौरव का संगम;;विवाह के तीसरे दिन विदाई की वेला आई। जनकपुर की गलियाँ, जो कल तक मंगल-गीतों से गूँज रही थीं, अब सिसकियों से भर गईं। सुनयना रानी ने सीता को हृदय से लगाकर जो आशीर्वचन दिए, वे किसी भी माँ की चिर-सनातन वाणी हैं — कि ससुराल में धैर्य ही सबसे बड़ा आभूषण है, और सेवा-भाव ही सबसे बड़ा श्रृंगार।
शुश्रूषस्व गुरून् नित्यं सन्तापय च देवताः। शुभे भव्यं व्रतं चर्या पत्युरिच्छानुवर्तिनी॥
(भाव — पारंपरिक विदाई-उपदेश, वाल्मीकि रामायण-परंपरा से प्रेरित)
यहाँ ध्यातव्य है कि यह वचन आज्ञाकारिता का नहीं, पारस्परिक सामंजस्य और परिवार के प्रति दायित्व-बोध का संदेश है — जो नए गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने वाले प्रत्येक दंपत्ति, स्त्री हो या पुरुष, दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
७अयोध्या की ओर — नए अध्याय का प्रस्थान:रथों की एक विशाल पंक्ति मिथिला की सीमा पार कर कोसल की ओर बढ़ चली। मार्ग में ग्रामवासी पुष्प बरसाकर नव-विवाहित दंपत्तियों का स्वागत करते रहे। यहीं मार्ग में एक और घटना घटी, जिसने आगे के अध्यायों की भूमिका रच दी किंतु उसकी विस्तृत चर्चा हम अगले अध्याय में करेंगे, जहाँ अयोध्या के प्रवेश-द्वार पर प्रजा के हर्षोल्लास और राजमहल की भव्यता का वर्णन प्रतीक्षा कर रहा है।
इति सीतायणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।
(अगले अध्याय में — अयोध्या आगमन एवं नगर का उल्लास)
राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001

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