वन्दे मातरम् : राष्ट्रधर्म का भारतीय दर्शन,एक गीत नहीं, राष्ट्रचेतना का महामंत्र
भारत की राष्ट्रीय चेतना को यदि किसी एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो निस्संदेह वह है"वन्दे मातरम्।" यह केवल दो शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित उस सांस्कृतिक धारा का घोष है जिसने भारत को केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि एक जीवंत राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह उद्घोष उस भावना का प्रतीक है जिसमें मातृभूमि देवत्व को प्राप्त करती है और नागरिक उसका पुत्र बनकर उसके प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है। भारतीय परंपरा में राष्ट्र का विचार राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, लोकमंगल और आध्यात्मिक एकात्मता से निर्मित होता है। यही कारण है कि भारत ने कभी राष्ट्र को विजय, विस्तार या उपनिवेशवाद का माध्यम नहीं बनाया। यहाँ राष्ट्रधर्म का उद्देश्य विश्व-विजय नहीं, बल्कि "सर्वे भवन्तु सुखिनः", "वसुधैव कुटुम्बकम्" और "लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु" जैसे सार्वभौमिक आदर्शों की स्थापना रहा है।
इसी व्यापक दृष्टि का सबसे सशक्त सांस्कृतिक प्रतीक है—वन्दे मातरम्।भारतीय राष्ट्रवाद का दार्शनिक आधार
यूरोप में राष्ट्रवाद आधुनिक राजनीतिक इतिहास की उपज है, परंतु भारत में राष्ट्र की अवधारणा वैदिक काल से विद्यमान रही है। अथर्ववेद का उद्घोष—"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः"—यह स्पष्ट करता है कि भारतीय मन ने पृथ्वी को माता और स्वयं को उसका पुत्र माना। यह संबंध अधिकार का नहीं, उत्तरदायित्व का है। भारतीय राष्ट्रवाद किसी जाति, भाषा या संप्रदाय पर आधारित नहीं है। यह साझा सांस्कृतिक चेतना पर आधारित है। हिमालय से कन्याकुमारी तक, द्वारका से कामाख्या तक तीर्थयात्राओं की परंपरा ने भारत को राजनीतिक सीमाओं से पहले सांस्कृतिक रूप से एक किया। आदि शंकराचार्य द्वारा चार मठों की स्थापना, रामायण और महाभारत की अखिल भारतीय स्वीकृति तथा संत परंपरा ने इस राष्ट्रभाव को और दृढ़ बनाया।
राष्ट्रधर्म क्या है?
भारतीय चिंतन में धर्म का अर्थ किसी मत या पंथ से नहीं, बल्कि वह आचरण है जो जीवन और समाज को धारण करे।इस दृष्टि से राष्ट्रधर्म का अर्थ है,राष्ट्र की एकता की रक्षा।समाज में न्याय और समरसता की स्थापना।सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी।संस्कृति और विरासत का संरक्षण। प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व।
आने वाली पीढ़ियों के लिए श्रेष्ठ भारत का निर्माण। जो नागरिक इन मूल्यों का पालन करता है, वही वास्तविक अर्थों में राष्ट्रधर्मी है।
वन्दे मातरम् : शक्ति, समृद्धि और ज्ञान का समन्वय::बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया। दुर्गा राष्ट्र की रक्षा और आत्मबल का प्रतीक हैं।लक्ष्मी समृद्धि, आर्थिक स्वावलंबन और श्रम की प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं।सरस्वती ज्ञान, विवेक और सांस्कृतिक चेतना की अधिष्ठात्री हैं।
इस प्रकार "वन्दे मातरम्" भारत के समग्र विकास का दर्शन प्रस्तुत करता है,जहाँ सुरक्षा, समृद्धि और संस्कृति तीनों का संतुलित समन्वय हो।
स्वतंत्रता संग्राम में वन्दे मातरम् की भूमिका:जब अंग्रेजी शासन ने भारतीय आत्मविश्वास को कुचलने का प्रयास किया, तब "वन्दे मातरम्" जन-जन की आवाज बन गया। सभा हो या सत्याग्रह, क्रांतिकारियों का जुलूस हो या जेल—हर स्थान पर यही उद्घोष सुनाई देता था। अनेक वीर इसी उद्घोष के साथ फाँसी पर झूल गए। अंग्रेजी शासन इस गीत से इसलिए भयभीत था क्योंकि उसे ज्ञात था कि यदि किसी राष्ट्र की आत्मा जाग गई, तो उसे पराधीन नहीं रखा जा सकता।
राष्ट्रधर्म और नागरिक कर्तव्य::आज स्वतंत्र भारत में राष्ट्रधर्म का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं है।
कर चोरी न करना भी राष्ट्रधर्म है।भ्रष्टाचार का विरोध करना भी राष्ट्रधर्म है।नारी सम्मान करना भी राष्ट्रधर्म है।
जल, जंगल और भूमि की रक्षा करना भी राष्ट्रधर्म है।मतदान करना, संविधान का सम्मान करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, समाज में सद्भाव बनाए रखनाये सभी राष्ट्रधर्म के आधुनिक स्वरूप हैं।
भारतीयता और विश्वमानवता::भारत का राष्ट्रवाद कभी आक्रामक नहीं रहा। इसने कभी यह नहीं कहा कि केवल हमारा मार्ग ही सत्य है। उपनिषदों ने कहा,"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।"गीता ने कर्मयोग का संदेश दिया। बुद्ध ने करुणा सिखाई। महावीर ने अहिंसा का मार्ग दिखाया। गुरु नानक ने मानव-एकता का संदेश दिया।स्वामी विवेकानन्द ने विश्व को भारत की आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया।
इन सबका सार "वन्दे मातरम्" की भावना में समाहित है,अपनी मातृभूमि का सम्मान करते हुए सम्पूर्ण मानवता का कल्याण।आज की चुनौतियाँ और राष्ट्रधर्मआज भारत के सामने बाहरी शत्रुओं से अधिक बड़ी चुनौती आंतरिक विघटन, सांस्कृतिक विस्मृति, सामाजिक विभाजन, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन की है।
यदि नागरिक केवल अधिकारों की बात करेगा और कर्तव्यों को भूल जाएगा, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
यदि राजनीति राष्ट्रनीति से ऊपर हो जाएगी, तो राष्ट्रीय चरित्र कमजोर होगा। यदि शिक्षा केवल रोजगार देगी, संस्कार नहीं, तो राष्ट्र की आत्मा दुर्बल होगी। इसलिए "वन्दे मातरम्" आज पहले से अधिक प्रासंगिक है।
राष्ट्रधर्म का पुनर्जागरण::भारत केवल आर्थिक महाशक्ति बनकर विश्व का नेतृत्व नहीं कर सकता।
उसे नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व भी देना होगा।जब प्रत्येक नागरिक यह अनुभव करेगा कि राष्ट्र उसकी माता है और उसका प्रत्येक कर्म राष्ट्र की सेवा है, तभी भारत पुनः "जगत्गुरु" बनने की दिशा में अग्रसर होगा। आज आवश्यकता है कि "वन्दे मातरम्" को केवल एक गीत के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रधर्म के महामंत्र के रूप में पुनः स्थापित किया जाए।वन्दे मातरम् केवल उच्चारण नहीं—यह संकल्प है।वन्दे मातरम् केवल स्मृति नहीं,यह राष्ट्रीय चेतना का शाश्वत प्रकाश है।वन्दे मातरम् केवल गीत नहीं—यह भारत के राष्ट्रधर्म का अमर दर्शन है।
वन्दे मातरम्।
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