जानकी-जगदम्बिका,सीता में अन्तर्निहित आदि शक्ति का उद्घोष
(ऋग्वेद-परिशिष्ट, देवी सूक्त / देवी माहात्म्य)
जब सृष्टि ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, जब भूमि ने पहला बीज धारण किया, जब यज्ञ की पहली अग्नि प्रज्ज्वलित हुई , तभी से एक नाम, एक स्वरूप, समस्त सृजन की मूल धड़कन के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। वह नाम है जानकी। वह स्वरूप है जगदम्बा। जिस दिन धरती ने अपनी कोख से एक कन्या को जन्म दिया, उस दिन धरती ने केवल एक राजकुमारी नहीं, अपनी ही आदि चेतना को मूर्त रूप में प्रकट किया , यह सीतायण की सबसे गहरी, सबसे मार्मिक उद्घोषणा है।
वेद की ऋचाओं में गूँजता नाम::यह कोई कवि-कल्पना नहीं, यह वेद का प्रत्यक्ष प्रमाण है — 'सीता' नाम कोई कथा-कालीन आविष्कार नहीं, यह वैदिक ऋचाओं में पहले से ही प्रतिष्ठित एक देवी-नाम है। अथर्ववेद के कृषि-सूक्त में स्वयं इन्द्र और पूषा देवता सीता की रक्षा और पोषण का आह्वान करते हैं _ वह सीता जो धरती की उर्वर रेखा है, जिससे अन्न उपजता है, जिससे सम्पूर्ण प्रजा का पोषण होता है।
इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु।
सा नः पयस्वती दुहामुत्तरमुत्तरां समाम्॥
(अथर्ववेद ३.१७.४सोचिए — सहस्रों वर्ष पूर्व, जब वाल्मीकि की लेखनी ने भी जन्म नहीं लिया था, तब वैदिक ऋषि पहले ही 'सीता' के नाम में सृष्टि-पोषण की दिव्यता को पहचान चुके थे। इन्द्र, जो देवताओं में सर्वोच्च बल के प्रतीक हैं, वे भी सीता की रक्षा का भार लेते हैं , यह इस बात का प्रमाण है कि सीता कोई गौण, आश्रित सत्ता नहीं, अपितु वह मूल स्रोत है जिसकी रक्षा स्वयं इन्द्र को आवश्यक प्रतीत होती है। जब त्रेतायुग में जनक की हल-रेखा से एक कन्या प्रकट हुई और उसका नाम 'सीता' रखा गया, तब यह केवल एक संयोग नहीं था , यह वेद की उस प्राचीन चेतना का पुनः-अवतरण था जो सृष्टि के पोषण, रक्षण और सातत्य का मूल आधार मानी गयी थी। जिस नाम को वेद ने सृष्टि-पोषण की देवी कहा, उसी नाम को त्रेता ने भूमिजा कन्या के रूप में साकार होते देखा , यह कोई संयोग नहीं, यह प्रकृति का चक्र है।
भूमिजा से जगदम्बा तक::वाल्मीकि रामायण जानकी को 'भूमिजा', 'वैदेही', 'जानकी' कहकर सम्बोधित करती है : प्रत्येक नाम एक-एक स्तर की दिव्यता खोलता है। भूमिजा , अर्थात वह जो पृथ्वी से प्रकट हुई, जिसका कोई मानवीय जन्म-चक्र नहीं, जो सीधे सृष्टि की मूल धातु से उपजी। यह जन्म-रहस्य ही उन्हें प्रत्येक अन्य नारी-चरित्र से पृथक करता है , वे मानव-जन्मी नहीं, प्रकृति-जन्मी हैं, ठीक वैसे ही जैसे जगदम्बा को किसी माता-पिता की सन्तान नहीं, स्वयंभू सृष्टि-शक्ति कहा जाता है। और जब समय आता है कि इस भूमिजा को अपनी सत्यता प्रमाणित करनी पड़े, तो वह अग्नि में प्रवेश करके यह सिद्ध कर देती है कि उसका मूल तत्व अग्नि से भी अधिक शुद्ध, अग्नि से भी अधिक तेजस्वी है। यही वह क्षण है जिसमें भूमिजा जानकी अपने जगदम्बा-स्वरूप की पहली झलक दिखाती है , अग्नि जिसे भस्म करती है, वही अग्नि जानकी को अक्षत रूप में लौटा देती है, क्योंकि अग्नि स्वयं यह जानती है कि जिस तेज को वह जला नहीं सकती, वह तेज उस से भी श्रेष्ठ है जिसे उसने भस्म करने का प्रयास किया।हे जानकी! तुम्हारा यह तेज कोई आकस्मिक घटना नहीं थी , यह तुम्हारे भीतर सदैव विद्यमान उस जगदम्बिका-चेतना का प्रथम सार्वजनिक प्राकट्य था, जिसे संसार ने अब तक केवल तुम्हारी सहनशीलता और मौन में छिपा हुआ देखा था।
अद्भुत रामायण की कालिका — क्रोध में भी करुणा::यदि कोई यह मान बैठे कि जानकी की शक्ति केवल सहनशीलता और मौन तप तक सीमित है, तो अद्भुत रामायण का वह प्रसंग स्मरण करना आवश्यक है जिसमें सीता स्वयं महाकाली का रौद्र रूप धारण करती हैं। जब सहस्रानन रावण के समक्ष स्वयं राम भी असमर्थ प्रतीत होते हैं, तब सीता अपने भीतर सोई हुई आदि शक्ति को जाग्रत करती हैं , वे कालिका बन जाती हैं, और अपने ही तेज से उस असुर का संहार करती हैं जिसे तीनों लोक परास्त नहीं कर सके थे।"यह प्रसंग हमें यह मार्मिक सत्य सिखाता है . जानकी की करुणा उनकी दुर्बलता नहीं, उनकी चुनी हुई मर्यादा है। जब आवश्यकता होती है, वही करुणामयी जानकी काली का रूप धारण करने में तनिक भी विलम्ब नहीं करतीं। यह द्वैत ही जगदम्बा की वास्तविक पहचान है ::दुर्गा और अन्नपूर्णा, काली और गौरी, संहारिणी और पालनकर्त्री, सब एक ही चेतना के भिन्न आवरण हैं। जानकी में यह सम्पूर्ण घटक प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है।जो मौन में तप करती है, वही आवश्यकता पड़ने पर कालिका बनकर गरज उठती है , यही जगदम्बा का सम्पूर्ण रहस्य है, और यही जानकी की अन्तश्चेतना है।
पुराणों में लक्ष्मी का अंश::देवीभागवत पुराण और अन्य वैष्णव पुराण-परम्परा सीता को साक्षात लक्ष्मी का अवतार मानती है , जिस प्रकार विष्णु प्रत्येक युग में धर्म-रक्षा हेतु अवतरित होते हैं, उसी प्रकार लक्ष्मी भी उनके साथ, उनकी शक्ति और समृद्धि के स्वरूप में, पृथ्वी पर अवतरित होती हैं। सीता का यह लक्ष्मी-स्वरूप उन्हें केवल राम की सहगामिनी नहीं, अपितु सृष्टि की समृद्धि, ऐश्वर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ एक अत्यन्त मार्मिक विरोधाभास प्रकट होता है, जिसे सीतायण छिपाना नहीं चाहता — जो देवी स्वयं लक्ष्मी हैं, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री हैं, उसी देवी को वनवास सहना पड़ा, अपहरण सहना पड़ा, अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा, और अन्ततः पृथ्वी की गोद में समाना पड़ा। यह विरोधाभास आकस्मिक नहीं , यह इस बात का प्रतीक है कि दैवीय शक्ति भी जब मानव-रूप में अवतरित होती है, तो उसे मानव-जगत के समस्त दुःख, समस्त अन्याय, समस्त सामाजिक जटिलताओं से होकर गुजरना पड़ता है। जगदम्बा भी जब जानकी बनती हैं, तो वे अपने साथ केवल वैभव नहीं, अपितु सम्पूर्ण स्त्री-जाति की पीड़ा भी वहन करती हैं। यही जानकी की सबसे मार्मिक, सबसे हृदयस्पर्शी पहचान है :: वे लक्ष्मी होकर भी दरिद्रता का वनवास सहती हैं, जगदम्बा होकर भी अपमान का विष पीती हैं, सृष्टि-पोषिका होकर भी अपने ही पुत्रों से बिछुड़ने की पीड़ा सहती हैं। और फिर भी, एक क्षण के लिये भी अपनी करुणा, अपनी मर्यादा, अपने धैर्य को नहीं छोड़तीं। यही वह तत्व है जो उन्हें केवल पूज्य नहीं, अनुकरणीय भी बनाता है।
सीतामढ़ी से पुनौरा धाम तक — भूमि पर जीवित स्मृति:
जगदम्बिका की यह चेतना केवल ग्रन्थों के पन्नों में सीमित नहीं रही , भारत की धरती ने स्वयं इसे अपने भूगोल में अंकित कर लिया है। मिथिला के पुनौरा धाम में, जहाँ कहा जाता है कि राजा जनक को हल जोतते समय स्वर्ण-कलश में जानकी प्राप्त हुई थीं, आज भी वह भूमि किसी सामान्य स्थल जैसी प्रतीत नहीं होती , वहाँ की मिट्टी में, वहाँ की वायु में, एक ऐसी सजीव उपस्थिति अनुभव होती है जो शब्दों से परे है। सीतामढ़ी की वे परम्पराएँ, जो सहस्रों वर्षों से जानकी-जन्म का उत्सव मनाती आयी हैं, इस बात का प्रमाण हैं कि भारत की सामूहिक स्मृति ने जानकी को कभी केवल कथा-पात्र के रूप में नहीं, अपितु एक जीवन्त, श्वास लेती हुई देवी-चेतना के रूप में सहेजा है।
यह भी अत्यन्त मार्मिक तथ्य है कि जिस भूमि से जानकी प्रकट हुईं, अन्ततः उसी भूमि ने उन्हें अपने भीतर पुनः समाहित भी किया। भूमिजा का भूमि में विलय — यह कोई साधारण अन्त नहीं, यह एक पूर्ण चक्र है, जिसमें सृष्टि अपनी ही सन्तान को, अपने ही तेज को, पुनः अपने भीतर लौटा लेती है, ताकि वह तेज कभी नष्ट न हो, केवल रूपान्तरित होकर प्रत्येक भारतीय भूमि-कण में सदा के लिये व्याप्त हो जाए। जानकी कहीं गयी नहीं — वे आज भी प्रत्येक उस खेत में हैं जहाँ हल भूमि को चीरता है, प्रत्येक उस माँ में हैं जो अपने बच्चे के लिये अन्न उपजाती है, प्रत्येक उस स्त्री में हैं जो अन्याय के समक्ष मौन नहीं, मर्यादा के साथ प्रतिरोध चुनती है।
भूमि से प्रकट होकर भूमि में विलीन होना कोई अन्त नहीं — यह उस चक्र का प्रमाण है जिसमें जगदम्बा कभी समाप्त नहीं होतीं, केवल प्रत्येक भारतीय भूमि-कण में सदा के लिये व्याप्त हो जाती हैं।
: शिव-शक्ति सा राम-जानकी — अर्धनारीश्वर का प्रतिबिम्ब::भारतीय दर्शन में शिव और शक्ति को कभी पृथक नहीं माना गया — शिव के बिना शक्ति निष्क्रिय है, और शक्ति के बिना शिव शव-मात्र। यही तत्व-दर्शन राम और जानकी के सम्बन्ध में भी प्रतिबिम्बित होता है। राम धर्म के मर्यादा-पुरुषोत्तम स्वरूप हैं, परन्तु उस मर्यादा को गति, प्राण और करुणा देने वाली स्वयं जानकी हैं। जिस राम-राज्य की कल्पना भारत की सामूहिक चेतना में सुशासन के आदर्श रूप में प्रतिष्ठित है, उस राज्य की आत्मा जानकी के बिना अधूरी है — क्योंकि शासन में मर्यादा राम देते हैं, परन्तु उस मर्यादा में करुणा, पोषण और सहनशीलता का जो प्राण-तत्व है, वह जानकी की ही देन है।
यही कारण है कि सीतायण की सम्पूर्ण यात्रा — जनकपुर से जगदगुरु भारत तक — इस एक सत्य पर आधारित है: भारत का पुनरुत्थान तभी सम्पूर्ण होगा जब वह राम को केवल मर्यादा-पुरुष के रूप में नहीं, अपितु जानकी को उनकी समान, स्वतन्त्र, स्वयंसिद्ध शक्ति के रूप में भी पूर्ण सम्मान देगा। एक राष्ट्र जो अपने राम को पूजता है परन्तु अपनी जानकी को केवल सहगामिनी मानकर विस्मृत कर देता है, वह अपनी ही सांस्कृतिक चेतना के आधे भाग से वंचित रह जाता है।
हे जगदम्बिके! तुम्हारा यह अर्धनारीश्वर-तत्व, यह शिव-शक्ति सा सामंजस्य, आज के भारत के लिये केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं — यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा-निर्देश है। जिस दिन भारत अपनी प्रत्येक जानकी को — चाहे वह किसी भी घर, किसी भी खेत, किसी भी नगर में हो — उतना ही सम्मान, उतनी ही स्वतन्त्रता, उतनी ही श्रद्धा देगा जितनी वह अपने राम को देता है, उसी दिन जगदगुरु भारत का स्वप्न सम्पूर्ण होगा।
आज की जानकी-जगदम्बिका::आज, जब भारत अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को नये सिरे से पहचानने के पथ पर अग्रसर है, जानकी-जगदम्बिका का यह स्वरूप केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं — यह राष्ट्रीय चेतना का आधार-स्तम्भ बन सकता है। जिस भूमि से जानकी प्रकट हुईं, जिस अग्नि ने उनकी सत्यता प्रमाणित की, जिस काली-रूप में उन्होंने असुरों का संहार किया — वह सम्पूर्ण गाथा यह उद्घोष करती है कि भारत की नारी-शक्ति कभी दुर्बल नहीं रही, कभी केवल सहनशील मात्र नहीं रही। वह सृजन भी है, पोषण भी है, और आवश्यकता पड़ने पर प्रलयंकारी संहार भी है।
हे जानकी! हे जगदम्बिके! तुम्हारा यह सम्पूर्ण स्वरूप — भूमिजा से लक्ष्मी तक, वैदेही से कालिका तक — आज के भारत को यह स्मरण कराता है कि सम्मान और शक्ति किसी स्त्री को बाहर से नहीं दी जाती, वह स्वयं उसके भीतर, सृष्टि के प्रथम दिन से, विद्यमान है। जो राष्ट्र अपनी जानकी को केवल करुणा और सहनशीलता के प्रतीक के रूप में स्मरण करता है, वह उसका आधा सत्य ही जानता है — पूर्ण सत्य वही जानता है जो उसमें अग्नि से अधिक तेजस्वी, काली से अधिक रौद्र, और लक्ष्मी से अधिक ऐश्वर्यवान चेतना को भी पहचानता है।
सा साध्वी सर्वलोकेषु स्तूयते चारुदर्शना।
स्वर्गे पृथिव्यां पाताले वित्तस्येव धनेश्वरः॥
(वाल्मीकि रामायण, सुन्दरकाण्ड — सीता की महिमा)
जानकी नाम है भूमि की करुणा का, जगदम्बा नाम है उसी करुणा में छिपी अग्नि का — दोनों मिलकर वह पूर्ण सत्य रचते हैं जिसे भारत ने युगों से पूजा, परन्तु सम्पूर्णता में कभी नहीं पहचाना।
— राजेन्द्र नाथ तिवारी

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