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बुधवार, 24 जून 2026

गूगल के ज्ञान और बंद पुस्तक पर कोई भरोसा नहीं!

 कौटिल्य  दृष्टि 

गूगल  का  ज्ञान और  बंद  पुस्तक का कोई  अर्थ  नहीं 


गूगल का ज्ञान और बंद पुस्तक की विद्या का कोई भरोसा नहीं"न सा विद्या या पुस्तकेषु बद्धा, न तद्धनं यत् परहस्तगतम्।"आज एक विचित्र युग है। लोग स्वयं को विद्वान समझने लगे हैं क्योंकि उनके हाथ में स्मार्टफोन है। उन्हें लगता है कि गूगल खोलते ही वे इतिहासकार बन गए, दो वीडियो देखकर अर्थशास्त्री बन गए, और कुछ पोस्ट पढ़कर राष्ट्रचिंतक बन गए। यह ज्ञान नहीं, ज्ञान का अहंकार है।

गूगल आपको उत्तर दे सकता है, बुद्धि नहीं।वह तथ्य दे सकता है, तर्क नहीं।वह सूचना दे सकता है, सत्य का बोध नहीं।जिस व्यक्ति का सम्पूर्ण ज्ञान गूगल के सर्वर पर टिका हो, वह पहले नेटवर्क का दास है, बाद में विद्वान। जिस दिन इंटरनेट बंद हो जाए, उसका आधा ज्ञान भी गायब हो जाएगा। यह वही स्थिति है जैसे कोई व्यक्ति दूसरे के खजाने को देखकर स्वयं को धनवान समझने लगे।

दूसरी ओर, पुस्तकों में कैद विद्या भी उतनी ही निष्प्राण है। अलमारी में सजी हजारों पुस्तकें किसी राष्ट्र का निर्माण नहीं करतीं। यदि पुस्तकें ही समाज बदल देतीं तो पुस्तकालयों के आसपास स्वर्ग बस गए होते। पुस्तक में बंद ज्ञान तब तक मृत है जब तक वह मनुष्य के रक्त में प्रवाहित होकर कर्म में न उतर जाए।आज समाज में डिग्रियों का अंबार है, लेकिन चरित्र का अकाल है। विश्वविद्यालय बढ़ रहे हैं, पर राष्ट्रनिर्माता घट रहे हैं। प्रमाणपत्र बढ़ रहे हैं, पर साहस कम हो रहा है। कारण स्पष्ट है—हमने ज्ञान को सूचना समझ लिया है और विद्या को नौकरी का साधन।

भारत ने कभी ऐसी विद्या को सम्मान नहीं दिया। यहाँ विद्वान वह नहीं था जो शास्त्र रट ले; विद्वान वह था जो संकट में धर्म का मार्ग चुन सके। रावण वेदों का ज्ञाता था, पर विद्वान नहीं था। कंस शक्तिशाली था, पर ज्ञानी नहीं था। दुर्योधन शिक्षित था, पर विवेकहीन था। इसलिए भारतीय परंपरा ने स्पष्ट कहा—

"सा विद्या या विमुक्तये"अर्थात जो मुक्त करे वही विद्या है। जो केवल अहंकार बढ़ाए, वह विद्या नहीं, बोझ है।

आज गूगल-पीढ़ी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह सब कुछ जानती है, लेकिन कुछ भी समझती नहीं। उसे दुनिया के हर विषय पर राय देनी है, पर स्वयं पर विचार नहीं करना। वह उद्धरण साझा करती है, पर आदर्श नहीं जीती। वह इतिहास पढ़ती है, पर इतिहास बनाने का साहस नहीं रखती।

याद रखिएपुस्तकें पढ़कर कोई चाणक्य नहीं बनता।गूगल चलाकर कोई विवेकानंद नहीं बनता।डिग्री लेकर कोई अब्दुल कलाम नहीं बनता।चाणक्य बनने के लिए तप चाहिए।विवेकानंद बनने के लिए आत्मबल चाहिए।अब्दुल कलाम बनने के लिए राष्ट्र के प्रति समर्पण चाहिए।इसलिए मैं कहता हूँ,गूगल का ज्ञान उधार का प्रकाश है,बंद पुस्तक की विद्या बंद तिजोरी का धन है।दोनों का मूल्य तभी है जब वे मनुष्य के विचार, चरित्र और कर्म में उतरें।

गूगल पर निर्भर ज्ञान वैसा ही है जैसे बैसाखी पर चलने वाला बल।और पुस्तक में बंद विद्या वैसी ही है जैसे ताले में बंद खजाना।राष्ट्र उन लोगों से नहीं बनते जो जानकारी इकट्ठा करते हैं; राष्ट्र उन लोगों से बनते हैं जो जानकारी को संकल्प, संकल्प को कर्म और कर्म को इतिहास में बदल देते हैं। यही सच्ची विद्या है, यही सच्चा ज्ञान है। 

राजेन्द्र  नाथ  तिवारी 

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