पद अस्थायी है, प्रतिष्ठा भी अस्थायी है, सत्ता भी अस्थायी है। किंतु इतिहास का न्याय स्थायी होता है। - कौटिल्य का भारत

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शुक्रवार, 19 जून 2026

पद अस्थायी है, प्रतिष्ठा भी अस्थायी है, सत्ता भी अस्थायी है। किंतु इतिहास का न्याय स्थायी होता है।

राम के नाम पर बना मंदिर और मनुष्य का भ्रम!





अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर केवल एक स्थापत्य उपलब्धि नहीं है। यह करोड़ों लोगों की श्रद्धा, संघर्ष, त्याग और संकल्प का मूर्त रूप है। इस मंदिर की प्रत्येक शिला में उन असंख्य लोगों की आस्था निहित है जिन्होंने वर्षों तक रामलला के दर्शन का स्वप्न देखा। इसलिए जब राममंदिर ट्रस्ट, दान राशि, भूमि क्रय या प्रशासनिक कार्यप्रणाली से जुड़े प्रश्न उठते हैं, तब वे केवल वित्तीय या प्रशासनिक विषय नहीं रह जाते; वे राष्ट्र की आस्था और नैतिक चेतना से जुड़ा प्रश्न बन जाते हैं। भारतीय संस्कृति का मूल सिद्धांत रहा है कि मनुष्य संसार को धोखा दे सकता है, व्यवस्था को भ्रमित कर सकता है, कानून की कमजोरियों का लाभ उठा सकता है, किंतु धर्म की दृष्टि से कभी बच नहीं सकता। हमारे ऋषियों ने बार-बार कहा कि ईश्वर की सत्ता केवल मंदिरों में स्थापित मूर्तियों तक सीमित नहीं है। वह प्रत्येक कर्म, प्रत्येक विचार और प्रत्येक निर्णय की साक्षी है। यही कारण है कि जब किसी धार्मिक संस्था पर अनियमितता के आरोप लगते हैं तो सामान्य नागरिक के मन में सबसे पहला प्रश्न उठता है,क्या जिन लोगों को भगवान के घर की व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया है, उन्हें उस भगवान की अदृश्य उपस्थिति का भी स्मरण है?

श्रीराम भारतीय मानस में केवल देवता नहीं हैं। वे मर्यादा हैं, अनुशासन हैं, त्याग हैं और उत्तरदायित्व हैं। राम ने सत्ता को कभी अधिकार नहीं माना, बल्कि सेवा माना। उन्होंने राज्य की रक्षा के लिए वनवास स्वीकार किया, व्यक्तिगत सुख का त्याग किया और अपने जीवन को लोककल्याण के लिए समर्पित कर दिया। यही कारण है कि भारतीय समाज में "रामराज्य" केवल राजनीतिक व्यवस्था का नाम नहीं, बल्कि नैतिक शासन का आदर्श माना जाता है। आज यदि किसी ट्रस्ट, पदाधिकारी या कर्मचारी पर प्रश्न उठते हैं, तो उससे भी बड़ी चिंता यह है कि कहीं हमारी संस्थाओं से नैतिक भय समाप्त तो नहीं हो रहा? कानून का भय तो हर अपराधी को होता है, किंतु धर्म का भय केवल सज्जनों को होता है। कानून तब सक्रिय होता है जब अपराध हो जाता है, परंतु धर्म मनुष्य को अपराध करने से पहले रोकता है। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक समय में अनेक लोग यह मानने लगे हैं कि यदि कागज़ सही हैं, यदि व्यवस्था प्रभावित है, यदि प्रश्न पूछने वालों को चुप कराया जा सकता है, तो सब कुछ ठीक है। लेकिन भारतीय दर्शन इससे सहमत नहीं है। यहाँ कहा गया है,"धर्मो रक्षति रक्षितः"अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

रामायण हमें बताती है कि रावण का विनाश उसकी शक्ति की कमी से नहीं हुआ था। उसके पास ज्ञान था, संपत्ति थी, सामर्थ्य था, सत्ता थी; किंतु उसके भीतर धर्म का भय समाप्त हो गया था। जब मनुष्य स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगता है, तब उसका पतन आरंभ हो जाता है।राममंदिर से जुड़े किसी भी विवाद का अंतिम निर्णय न्यायालय और जांच एजेंसियाँ करेंगी। किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करना न्यायिक प्रक्रिया का विषय है। किंतु एक व्यापक नैतिक प्रश्न समाज अवश्य पूछ सकता है—क्या राम के नाम पर कार्य करने वाले लोगों का आचरण भी राम की मर्यादा के अनुरूप है? क्योंकि मंदिर की भव्यता केवल सोने के कलशों से नहीं बढ़ती। उसकी वास्तविक गरिमा उन लोगों के चरित्र से बढ़ती है जो उसकी व्यवस्था संभालते हैं। यदि व्यवस्था में पारदर्शिता है, तो मंदिर की प्रतिष्ठा बढ़ती है। यदि जवाबदेही है, तो श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत होता है। यदि सत्यनिष्ठा है, तो भगवान का नाम और अधिक गौरवशाली बनता है।

आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। आवश्यकता सत्य के पक्ष में खड़े होने की है। यदि सब कुछ सही है, तो जांच से भय कैसा? और यदि कहीं त्रुटि है, तो उसे स्वीकार कर सुधार करने में संकोच कैसा?याद रखना चाहिए कि श्रीराम की सत्ता केवल गर्भगृह तक सीमित नहीं है। वह प्रत्येक श्रद्धालु की आँखों में है, प्रत्येक दानदाता की भावना में है और प्रत्येक उस व्यक्ति के अंतःकरण में है जिसे मंदिर की सेवा का अवसर मिला है।पद अस्थायी है, प्रतिष्ठा भी अस्थायी है, सत्ता भी अस्थायी है। किंतु इतिहास का न्याय स्थायी होता है। और इतिहास हमेशा उन लोगों को सम्मान देता है जिन्होंने धर्म को साधन नहीं, साध्य माना; जिन्होंने भगवान के नाम का उपयोग नहीं किया, बल्कि स्वयं को भगवान के आदर्शों के अनुरूप ढाला।

अयोध्या का मंदिर केवल पत्थरों का मंदिर नहीं है। वह विश्वास का मंदिर है। यदि उस विश्वास को चोट पहुँचती है तो केवल किसी संस्था की नहीं, पूरे समाज की क्षति होती है। इसलिए जो भी व्यक्ति राम के नाम से जुड़ा है, उसे यह स्मरण रखना चाहिए कि कानून की अदालत से बचना संभव हो सकता है, परंतु इतिहास की अदालत और अंतःकरण की अदालत से बचना असंभव है।और जहाँ तक श्रीराम की बात है—वे दिखाई दें या न दें, भारतीय जनमानस सदियों से मानता आया है कि उनकी दृष्टि सब पर है, और उसी दृष्टि के सामने अंततः हर कर्म का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना पड़ता है।

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