"जिसे मिटाने निकले थे, वही शताब्दी मना रहा है", सुभाष शुक्ल - कौटिल्य का भारत

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शुक्रवार, 19 जून 2026

"जिसे मिटाने निकले थे, वही शताब्दी मना रहा है", सुभाष शुक्ल

 संघ की शताब्दी और कांग्रेस की बेचैनी : आत्ममंथन से भागने वालों के लिए इतिहास का संदेश







राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शताब्दी मना रहा है। सौ वर्ष;यह केवल समय की गणना नहीं, बल्कि तप, त्याग, अनुशासन और संगठन की परीक्षा है। किसी संगठन का एक-दो दशक चल जाना बड़ी बात नहीं होती, लेकिन एक शताब्दी तक निरंतर बढ़ते रहना, विचार और कार्यकर्ता दोनों को जीवित रखना, बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखना साधारण उपलब्धि नहीं है।यही कारण है कि जैसे-जैसे संघ की शताब्दी निकट आ रही है, उसके विरोधियों की बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। विशेष रूप से कांग्रेस और उसके वैचारिक सहयोगियों के वक्तव्यों में यह बेचैनी साफ दिखाई देती है। प्रश्न यह है कि आखिर उन्हें संघ से इतनी चिंता क्यों है?कारण स्पष्ट है। संघ की शताब्दी केवल संघ की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन राजनीतिक दलों की विफलताओं का भी मौन दस्तावेज है, जो स्वयं को लोकतंत्र का सबसे बड़ा संरक्षक बताते रहे हैं।कांग्रेस को सबसे पहले अपने इतिहास के आईने में झाँकना चाहिए। जिस कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था, वही कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे सत्ता की राजनीति, व्यक्तिपूजा और परिवारवाद की गिरफ्त में चली गई। परिणाम यह हुआ कि संगठन कमजोर होता गया और परिवार मजबूत होता गया।विडंबना देखिए—जो दल स्वयं अनेक बार टूट चुका हो, जिसके भीतर समय-समय पर बड़े नेताओं का पलायन हुआ हो, जो राज्यों में अपने ही नेताओं को संभाल न पाया हो, वह आज उस संगठन पर प्रश्न उठा रहा है जिसने सौ वर्षों तक अपनी संगठनात्मक एकता बनाए रखी।

संघ की आलोचना करना आसान है, लेकिन कांग्रेस को यह बताना कठिन है कि उसकी अपनी वैचारिक दिशा क्या है। कभी समाजवाद, कभी उदारवाद, कभी तुष्टिकरण, कभी जातीय समीकरण, कभी क्षेत्रीय समझौते—आखिर कांग्रेस का स्थायी विचार क्या है? यदि कोई दल हर चुनाव में अपना वैचारिक चोला बदलता रहे, तो उसे दूसरों की वैचारिक प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठाने से पहले स्वयं पर विचार करना चाहिए।संघ के स्वयंसेवक शाखा में जाते हैं, प्रशिक्षण लेते हैं, समाजकार्य करते हैं और संगठन की पद्धति से आगे बढ़ते हैं। कांग्रेस का संगठन आज किस पद्धति से चलता है? क्या वहाँ नेतृत्व योग्यता से तय होता है या वंश से? क्या वहाँ कार्यकर्ता शीर्ष तक पहुँच सकता है या शीर्ष पहले से आरक्षित होता है?यही वह प्रश्न है जिससे कांग्रेस बचती रही है।कांग्रेस के नेताओं को संघ से नहीं, संघ की स्थिरता से समस्या है। उन्हें इस बात से असुविधा है कि जिस संगठन को दशकों तक सांप्रदायिक, प्रतिक्रियावादी और न जाने क्या-क्या कहा गया, वह आज भी खड़ा है, जबकि उसके आलोचकों के अनेक राजनीतिक प्रयोग इतिहास के कबाड़खाने में पहुँच चुके हैं।

कौटिल्य कहते हैं कि किसी प्रतिद्वंद्वी की शक्ति को समझे बिना उसका उपहास करना मूर्खता है। दुर्भाग्य से कांग्रेस ने दशकों तक यही किया। उसने संघ को समझने का प्रयास नहीं किया, केवल उसकी आलोचना को अपनी राजनीति का साधन बनाया। परिणाम यह हुआ कि संघ समाज में फैलता गया और कांग्रेस अपने पारंपरिक जनाधार को बचाने के लिए संघर्ष करती रही।

यहाँ एक कठोर सत्य स्वीकार करना होगा। किसी भी संगठन की सबसे बड़ी परीक्षा संकट के समय होती है। संघ ने प्रतिबंध देखे, आलोचनाएँ देखीं, राजनीतिक विरोध देखा, लेकिन संगठन बना रहा। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो उसका संगठन ही बिखरने लगा। इससे दोनों की संगठनात्मक संस्कृति का अंतर स्पष्ट होता है।







कांग्रेस को संघ से असहमति रखने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है। किंतु असहमति और द्वेष में अंतर होता है। जब कोई दल अपनी हर विफलता का कारण संघ को बताने लगे, तब यह उसकी वैचारिक कमजोरी का प्रमाण बन जाता है।

आज कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा प्रश्न संघ नहीं, स्वयं कांग्रेस है।उसे यह पूछना चाहिए:उसके कार्यकर्ता क्यों घट रहे हैं?उसका जनाधार क्यों सिकुड़ रहा है?उसके नेता लगातार दल क्यों छोड़ रहे हैं?

उसकी विचारधारा जनता को आकर्षित क्यों नहीं कर पा रही?वह युवाओं में विश्वास क्यों नहीं जगा पा रही? इन प्रश्नों के उत्तर संघ के कार्यालयों में नहीं, कांग्रेस के आत्ममंथन में मिलेंगे। इतिहास का नियम बड़ा कठोर होता है। वह बहाने नहीं सुनता, परिणाम देखता है। जो संगठन आत्मसुधार करता है, वह आगे बढ़ता है। जो केवल विरोधियों को दोष देता है, वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है।

संघ की शताब्दी कांग्रेस के लिए ईर्ष्या का नहीं, शिक्षा का विषय होनी चाहिए। यदि कोई संगठन सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है, तो उसमें कुछ न कुछ ऐसा अवश्य है जिसे समझने की आवश्यकता है। उसे केवल गाली देकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

आज आवश्यकता संघ को कोसने की नहीं, स्वयं को सुधारने की है। राष्ट्र जीवन में सम्मान उन संगठनों को मिलता है जो अपने भीतर झाँकने का साहस रखते हैं। जो केवल दूसरों की कमियाँ गिनते हैं, वे अंततः इतिहास की हाशिए की टिप्पणी बनकर रह जाते हैं।

संघ अपनी शताब्दी मना रहा है। कांग्रेस चाहे तो इसे विरोध का अवसर बनाए, लेकिन अधिक बुद्धिमानी इसी में होगी कि वह इसे आत्मचिंतन का अवसर बनाए। क्योंकि इतिहास की अदालत में आरोप नहीं, उपलब्धियाँ गिनी जाती हैं; और वहाँ निर्णय नारे नहीं, परिणाम करते हैं।

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