कौटिल्य दृष्टि : टेंडर का तंत्र और लोकतंत्र की लूट
वी के त्रिपाठी, सम्वाददाता
किसी राष्ट्र का पतन तब नहीं होता जब उसकी सीमाएँ कमजोर हो जाती हैं, बल्कि तब होता है जब उसके संस्थानों के भीतर बैठे लोग व्यवस्था को अपनी निजी जागीर समझने लगते हैं। यदि एक साधारण वेतनभोगी कर्मचारी के बारे में यह चर्चा होने लगे कि उसके बच्चों की शिक्षा विदेशों में हो रही है, परिवार के लोग ठेकेदारी से समृद्ध हो रहे हैं और विभागीय निर्णयों पर उसका प्रभाव निर्विवाद माना जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढाँचे की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा था कि जैसे जल में रहने वाली मछली कब पानी पी जाती है, यह देख पाना कठिन है, वैसे ही राजकोष से चोरी करने वाले अधिकारी को पकड़ना भी कठिन होता है। दो हजार वर्ष पूर्व कही गई यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है।
समस्या किसी एक "टेंडर बाबू" की नहीं है। समस्या उस व्यवस्था की है जहाँ फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे ठेके, भुगतान, कमीशन और प्रभाव का समानांतर केंद्र बन जाता है। लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी आक्रमणकारी नहीं, बल्कि वही कर्मचारी और अधिकारी हैं जो जनता के धन को निजी संपत्ति में बदलने का माध्यम बन जाते हैं।सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे मामलों में अक्सर विभागीय मौन दिखाई देता है। वर्षों तक शिकायतें होती रहती हैं, चर्चा चलती रहती है, किंतु जांच नहीं होती। ऐसा लगता है मानो पूरा तंत्र किसी अदृश्य समझौते के तहत काम कर रहा हो। यही मौन भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी ढाल बन जाता है।
कौटिल्य कहते हैं कि राज्य का धन राजा का नहीं, जनता का होता है। इसलिए राजकोष को क्षति पहुँचाने वाला व्यक्ति केवल आर्थिक अपराधी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपराधी भी है। यदि किसी कर्मचारी की संपत्ति, जीवनशैली और आय के स्रोतों में स्पष्ट असमानता दिखाई देती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होना प्रशासनिक आवश्यकता ही नहीं, लोकतांत्रिक अनिवार्यता भी है।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। आवश्यकता सत्य के पक्ष में खड़े होने की है। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच उन्हें समाप्त कर देगी और संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित होगी। किंतु यदि आरोप सही हैं, तो यह सिद्ध होगा कि जनता के टैक्स से चलने वाली व्यवस्था को कुछ लोगों ने निजी कमाई का साधन बना लिया है।
भारत अमृतकाल की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में देश को चमकदार भाषणों से अधिक ईमानदार प्रशासन की आवश्यकता है। सड़क, पुल, विद्यालय और अस्पताल तभी मजबूत बनेंगे जब टेंडर प्रक्रिया पर बैठी अदृश्य भ्रष्ट शक्तियों का प्रभाव समाप्त होगा।
कौटिल्य का स्पष्ट मत है—
"जब राजकर्मचारी स्वयं धन कमाने का माध्यम बन जाए, तब राज्य की सबसे पहली जिम्मेदारी उसका सम्मान बचाना नहीं, बल्कि उसकी जांच करना होती है।"लोकतंत्र में पद बड़ा नहीं होता, उत्तरदायित्व बड़ा होता है। और जहाँ उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है, वहीं से भ्रष्टाचार का साम्राज्य प्रारंभ होता है।
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