अटल की भाजपा से मोदी की भाजपा तक : भारतीय राजनीति के शक्ति-संतुलन का नया युग
भारतीय राजनीति में कुछ घटनाएँ केवल सरकारें नहीं बदलतीं, बल्कि राजनीति का पूरा चरित्र बदल देती हैं। पिछले तीन दशकों में भारतीय जनता पार्टी की यात्रा भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना है। यह यात्रा केवल एक राजनीतिक दल के विस्तार की कहानी नहीं है, बल्कि उस परिवर्तन का इतिहास है जिसने भारत की सत्ता, समाज और राजनीतिक विमर्श की दिशा को प्रभावित किया है।1990 के दशक की भाजपा और 2026 की भाजपा में केवल समय का अंतर नहीं है, बल्कि शक्ति, प्रभाव, रणनीति और आत्मविश्वास का भी अंतर है। एक समय था जब भाजपा को अपने अस्तित्व और स्वीकार्यता के लिए संघर्ष करना पड़ता था। आज स्थिति यह है कि देश की राजनीति भाजपा के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। विपक्ष की रणनीति भाजपा को रोकने से शुरू होती है और भाजपा की रणनीति भारत के राजनीतिक भूगोल को नए सिरे से परिभाषित करने से। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने भारतीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई। उस दौर में भाजपा वैचारिक रूप से मजबूत थी, लेकिन संख्या बल के मामले में सीमित थी। कांग्रेस का प्रभुत्व अभी भी कायम था और क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में प्रभावी थे। इसलिए भाजपा ने गठबंधन की राजनीति को अपनाया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) केवल राजनीतिक गठबंधन नहीं था, बल्कि भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने का माध्यम भी था।
ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, शिवसेना और अकाली दल जैसे अनेक दलों ने भाजपा के साथ मिलकर अपनी राजनीति को मजबूत किया। भाजपा ने भी उन्हें सम्मान दिया और राष्ट्रीय राजनीति में स्थान दिलाया। उस समय भाजपा का लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना था, इसलिए उसने सहयोगियों को बराबरी का महत्व दिया।लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और शक्ति का केंद्र भी बदल जाता है।
2014 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने केवल चुनाव नहीं जीता, बल्कि भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी। पहली बार भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। यह केवल चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि उस धारणा का अंत था कि दिल्ली की सत्ता बिना गठबंधन की बैसाखी के नहीं चल सकती।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भाजपा को एक चुनावी दल से आगे बढ़ाकर एक विशाल राजनीतिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत किया, नए सामाजिक समूहों को जोड़ा, युवाओं और महिलाओं तक पहुँच बनाई तथा राष्ट्रवाद और विकास को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।
यही कारण है कि जिन राज्यों में कभी भाजपा की उपस्थिति प्रतीकात्मक थी, वहाँ आज वह निर्णायक शक्ति बन चुकी है। पश्चिम बंगाल में कभी भाजपा का एक सांसद भी बड़ी उपलब्धि माना जाता था, आज वही भाजपा सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ओडिशा में वर्षों तक नवीन पटनायक का राजनीतिक वर्चस्व अटूट माना जाता था, लेकिन भाजपा ने वहाँ भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उत्तर-पूर्व भारत, जिसे कभी कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग कहा जाता था, आज भाजपा के सबसे मजबूत क्षेत्रों में गिना जाता है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन और वैचारिक स्पष्टता है। अनेक दल व्यक्तियों के इर्द-गिर्द खड़े हुए और व्यक्तियों के साथ ही कमजोर हो गए, लेकिन भाजपा ने कार्यकर्ता आधारित संरचना विकसित की। यही कारण है कि भाजपा केवल चुनाव के समय सक्रिय नहीं होती, बल्कि वर्ष भर संगठनात्मक रूप से कार्य करती रहती है।
आज ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और नीतीश कुमार जैसे नेताओं की राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर एक बड़ा निष्कर्ष निकलता है। जिन नेताओं ने कभी भाजपा को अपने राजनीतिक हितों के लिए उपयोगी सहयोगी समझा था, उन्हें शायद यह अनुमान नहीं था कि एक दिन वही भाजपा उनके राज्यों में सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी।यहाँ भाजपा की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देता है। भाजपा ने कभी स्वयं को केवल सहयोगी दल बनाकर सीमित नहीं रखा। उसने हर राज्य में अपना स्वतंत्र संगठन खड़ा किया, नए नेतृत्व को विकसित किया और दीर्घकालिक रणनीति पर काम किया। यही कारण है कि जहाँ अन्य दल चुनावी समीकरणों पर निर्भर रहे, वहीं भाजपा संगठनात्मक विस्तार पर ध्यान देती रही।
मोदी-शाह की भाजपा की राजनीति का मूल सिद्धांत स्पष्ट है—सहयोगियों का सम्मान करो, लेकिन संगठन को कभी कमजोर मत होने दो। यही कारण है कि आज भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले अधिकांश दल जानते हैं कि भाजपा किसी राज्य में स्थायी रूप से जूनियर पार्टनर बनकर नहीं रहना चाहती।
विपक्ष अक्सर भाजपा की चुनावी सफलताओं को केवल प्रचार या संसाधनों से जोड़कर देखने का प्रयास करता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक गहरी है। भाजपा की सफलता का आधार करोड़ों कार्यकर्ताओं का समर्पण, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिला संगठनात्मक प्रशिक्षण, मजबूत नेतृत्व और जनता के बीच निरंतर संवाद है। राजनीति में केवल सत्ता प्राप्त करना बड़ी उपलब्धि नहीं होती; सत्ता को बनाए रखना और लगातार जनता का विश्वास जीतना उससे भी बड़ी चुनौती होती है। भाजपा ने पिछले एक दशक से अधिक समय में इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया है। यही कारण है कि आज भी देश की राजनीति में भाजपा सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी हुई है।
हालाँकि लोकतंत्र में कोई भी दल स्थायी रूप से अजेय नहीं होता। इतिहास गवाह है कि हर राजनीतिक शक्ति को समय-समय पर जनता की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। भाजपा के सामने भी भविष्य में नई चुनौतियाँ आएँगी। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह निर्विवाद सत्य है कि भाजपा ने भारतीय राजनीति का शक्ति-संतुलन बदल दिया है। आज का भारत उस दौर से बहुत आगे निकल चुका है जब भाजपा को राजनीतिक स्वीकार्यता के लिए संघर्ष करना पड़ता था। अब स्थिति यह है कि अनेक क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक भविष्य की गणना भाजपा के साथ संबंधों के आधार पर करते हैं।अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा को राष्ट्रीय स्वीकार्यता दी, लालकृष्ण आडवाणी ने उसे वैचारिक दृढ़ता प्रदान की, और नरेंद्र मोदी ने उसे भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया। यही भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है।
कौटिल्य उवाच
"राजनीति में शक्ति केवल चुनाव जीतने से नहीं आती, बल्कि समाज के विश्वास, संगठन की मजबूती और नेतृत्व की स्पष्टता से उत्पन्न होती है। भाजपा की सफलता का रहस्य इसी त्रिवेणी में छिपा है।""जो दल कभी सहयोगियों के सहारे सत्ता तक पहुँचा था, वह आज भारतीय राजनीति का केंद्रबिंदु बन चुका है। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक युग परिवर्तन की कहानी है।"
"अटल ने नींव रखी, आडवाणी ने स्तंभ खड़े किए और मोदी ने उस भवन को शिखर तक पहुँचाया। भारतीय राजनीति के इतिहास में भाजपा की यह यात्रा आने वाले वर्षों तक अध्ययन और चर्चा का विषय बनी रहेगी।"
राजेन्द्र नाथ तिवारी

जय हो
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