वेदों से आज तक : सहकारिता भारत की आत्मा का अमर घोष
"एकाकी व्यक्ति जीवित रह सकता है, किंतु महान राष्ट्र केवल सहकारिता के आधार पर ही खड़े होते हैं।"जब मानव सभ्यता का शैशवकाल था, जब संसार के अधिकांश भूभाग जंगलों, कबीलों और संघर्षों में उलझे हुए थे, तब भारत की ऋषि चेतना मानव जीवन के उस महान सत्य को खोज चुकी थी, जिसे आज आधुनिक विश्व "कोऑपरेशन", "सामूहिक विकास" और "इन्क्लूसिव ग्रोथ" जैसे नामों से पुकारता है। भारत ने हजारों वर्ष पूर्व ही उद्घोष कर दिया था,"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।"अर्थात् साथ चलो, साथ सोचो और अपने मनों को एक करो।यही सहकारिता है।सहकारिता कोई कानून नहीं है। यह कोई सरकारी विभाग नहीं है। यह कोई चुनावी घोषणा नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्राणतत्व है। यह वह शक्ति है जिसने हिमालय से समुद्र तक फैले विविधताओं से भरे इस राष्ट्र को हजारों वर्षों तक एक सूत्र में बाँधकर रखा।आज जब विश्व व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद और स्वार्थ की अंधी दौड़ में उलझा हुआ है, तब भारत पुनः दुनिया को वही प्राचीन संदेश दे रहा है जिसने उसे विश्वगुरु बनाया था— "वसुधैव कुटुम्बकम्"।
सहकारिता : भारत की सभ्यता का मूल संस्कार,भारत की संस्कृति संघर्ष की नहीं, समन्वय की संस्कृति है। यहाँ विजय का अर्थ किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ना है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन में व्यक्ति से अधिक समाज, समाज से अधिक राष्ट्र और राष्ट्र से अधिक समस्त मानवता को महत्व दिया गया।पश्चिम का दर्शन कहता है—प्रतिस्पर्धा करो।भारत का दर्शन कहता है—सहयोग करो।पश्चिम कहता है—सबसे आगे निकलो।भारत कहता है—सबको साथ लेकर आगे बढ़ो।यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में सहकारिता केवल आर्थिक अवधारणा नहीं रही, बल्कि धर्म, समाज, राजनीति, कृषि, व्यापार, शिक्षा और अध्यात्म—सभी क्षेत्रों का आधार बनी।
वेदों का यज्ञ और सहकारिता का प्रथम विश्वविद्यालय यदि कोई पूछे कि सहकारिता का प्रथम विद्यालय कहाँ था, तो उत्तर होगा—वेदों का यज्ञ।यज्ञ केवल अग्नि में आहुति डालने का कर्मकांड नहीं था। वह समाज की सामूहिक चेतना का आयोजन था। उसमें राजा भी होता था, ऋषि भी, कृषक भी और सामान्य जन भी। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था और यज्ञ का पुण्य सबको प्राप्त होता था।यह संसार का पहला "सहकारी मॉडल" था।यही कारण है कि ऋग्वेद में अग्नि को केवल देवता नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली शक्ति माना गया।प्राचीन भारत : सहकारिता की विश्वविजयी व्यवस्था,जब यूरोप आदिम अवस्था में था, तब भारत में श्रेणियाँ थीं।जब पश्चिम व्यापार सीख रहा था, तब भारत में संगठित व्यापारी संघ कार्य कर रहे थे।जब विश्व को बैंकिंग का ज्ञान नहीं था, तब भारतीय श्रेणियाँ ऋण, निवेश और सामाजिक सुरक्षा का कार्य कर रही थीं।प्राचीन भारत की श्रेणियाँ आधुनिक सहकारी समितियों की जननी थीं। वे केवल व्यापार नहीं करती थीं; वे समाज का संरक्षण करती थीं, रोजगार देती थीं, संकट में सहायता करती थीं और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करती थीं।यह भारत की आर्थिक प्रतिभा का ऐसा अध्याय है, जिसे इतिहासकारों ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया।ग्राम भारत : सहकारिता का जीवंत गणराज्यभारत की आत्मा सदियों तक गाँवों में बसी रही। और भारतीय गाँव केवल बस्तियाँ नहीं थे; वे आत्मनिर्भर सहकारी गणराज्य थे।कुएँ सामूहिक थे।तालाब सामूहिक थे।अन्न भंडार सामूहिक थे।सिंचाई सामूहिक थी।रक्षा सामूहिक थी।निर्णय सामूहिक थे।यही कारण है कि विदेशी आक्रमणों, साम्राज्यों के उत्थान-पतन और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद भारत की सामाजिक संरचना कभी पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई।
भारत को जीवित रखने वाली शक्ति तलवार नहीं, सहकारिता थी। स्वतंत्रता संग्राम और सहकारिता की चेतनामहात्मा गांधी का ग्राम स्वराज, लोकमान्य तिलक का जनसंगठन, दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद और विनोबा भावे का भूदान आंदोलन—इन सभी का मूल भाव सहकारिता ही था।इन महापुरुषों ने समझ लिया था कि केवल सरकारें राष्ट्र का निर्माण नहीं करतीं। राष्ट्र का निर्माण समाज करता है, और समाज का निर्माण सहयोग से होता है।
अमूल : आधुनिक भारत का सहकारी चमत्कार,यदि कोई पूछे कि सहकारिता क्या कर सकती है, तो उसे अमूल की कहानी पढ़नी चाहिए।कुछ किसानों ने मिलकर एक व्यवस्था बनाई।उनके पास न विशाल पूँजी थी, न राजनीतिक शक्ति, न बहुराष्ट्रीय संसाधन।लेकिन उनके पास सहकारिता थी।आज वही आंदोलन करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार है और भारत को विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राष्ट्र बनाने में निर्णायक भूमिका निभा चुका है।यह केवल आर्थिक सफलता नहीं है; यह सहकारिता की विजयगाथा है।अमृतकाल और सहकारिता का नवजागरण,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब "सहकार से समृद्धि" का मंत्र दिया और सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की, तब वस्तुतः भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा था।यह केवल मंत्रालय नहीं, बल्कि एक वैचारिक पुनर्जागरण है।यह संदेश है कि भारत का विकास केवल कॉरपोरेट पूँजी से नहीं, बल्कि जनभागीदारी और सामूहिक शक्ति से भी होगा।आज किसान उत्पादक संगठन, स्वयं सहायता समूह, डेयरी समितियाँ, महिला सहकारी संस्थाएँ और डिजिटल सहकारिता के नए मॉडल उसी यात्रा के आधुनिक पड़ाव हैं।
21वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न,क्या केवल प्रतिस्पर्धा मानवता को बचा सकती है?क्या केवल बाज़ार समाज को स्थिर रख सकता है?क्या केवल लाभ विकास का अंतिम मापदंड है?भारत का उत्तर है—नहीं।मानवता को बचाएगी सहकारिता।समाज को स्थिर रखेगा सहयोग।और विकास को सार्थक बनाएगा सामूहिक कल्याण।
भारत का भविष्य और सहकारिता का महायज्ञ,भारत जब 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब उसे केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बनना है। उसे एक ऐसी सभ्यता के रूप में पुनः स्थापित होना है जो दुनिया को जीवन का संतुलित मार्ग दिखा सके।उस मार्ग का नाम है—सहकारिता।वेदों की ऋचाओं से लेकर आधुनिक सहकारी समितियों तक, भारत का इतिहास एक ही संदेश देता है—"जहाँ सहयोग है, वहाँ समृद्धि है। जहाँ समृद्धि है, वहाँ स्थिरता है। और जहाँ स्थिरता है, वहीं सभ्यता का उत्कर्ष है।"
कौटिल्य उवाच!
"सामर्थ्यवान व्यक्ति इतिहास लिख सकता है, किंतु संगठित समाज इतिहास बदल देता है।""सहकारिता केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, राष्ट्रनिर्माण का महामंत्र है।"
"भारत यदि पुनः विश्वगुरु बनेगा, तो उसकी शक्ति केवल तकनीक या अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि उस सनातन सहकारिता में होगी जिसने उसे हजारों वर्षों तक अक्षुण्ण रखा है।"
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