112 पुलिस से बदसलूकी का आरोप और युवक की पिटाई का मामला: क्या कानून से ऊपर है ?
बस्ती। कप्तानगंज थाना क्षेत्र की दुबौला चौकी अंतर्गत भरवालिया गांव में हुई एक घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार मामला कथित रूप से 112 नंबर पुलिस सेवा के कर्मियों के साथ हुई अभद्रता या बदसलूकी से जुड़ा बताया जा रहा है। इसके बाद युवक के साथ कथित मारपीट की चर्चा क्षेत्र में हो रही है, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून के पालन को लेकर बहस छिड़ गई हसवाल यह नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति ने पुलिस कर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार किया तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। कानून स्पष्ट रूप से पुलिस के कार्य में बाधा पहुंचाने, सरकारी कर्मचारी से दुर्व्यवहार करने अथवा शांति व्यवस्था भंग करने पर कार्रवाई का अधिकार देता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी भी परिस्थिति में कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति देता है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है, दंड देने का नहीं। दंड निर्धारित करने का अधिकार न्यायालय के पास है। यदि किसी युवक ने वास्तव में अभद्रता की थी तो उसके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की जा सकती थी, उसे विधिक प्रक्रिया के तहत गिरफ्तार किया जा सकता था और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता था। लेकिन यदि आरोपों के बीच मारपीट या प्रताड़ना जैसी घटनाएं हुई हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
मानवाधिकार और विधि विशेषज्ञों का भी मानना है कि पुलिस की वैधता उसकी शक्ति में नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक मर्यादा में निहित होती है। पुलिस और जनता के बीच विश्वास तभी कायम रह सकता है जब दोनों पक्ष कानून के दायरे में रहें। यदि कोई नागरिक कानून तोड़ता है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि कार्रवाई की प्रक्रिया ही कानून के विरुद्ध चली जाए तो न्याय का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
भरवालिया गांव की घटना में प्रशासन को चाहिए कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए। यदि युवक द्वारा अभद्रता हुई है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो। वहीं यदि पुलिस कर्मियों द्वारा अधिकारों का अतिक्रमण किया गया है तो उसकी भी जवाबदेही तय हो। कानून का राज तभी स्थापित माना जाएगा जब दोषी चाहे कोई भी हो, उसके लिए एक ही पैमाना लागू हो।
कौटिल्य उवाच
"पुलिस का सम्मान कानून से आता है, भय से नहीं। और नागरिक की स्वतंत्रता अनुशासन से सुरक्षित रहती है, अराजकता से नहीं। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब कानून का पालन कराने वाला भी कानून के दायरे में रहे।"

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