आर टी आई कार्यकर्ताओं पर अविश्वास नहीं, सम्मान चाहिए
बस्ती उत्तरप्रदेश वी के त्रिपाठी, सम्वाददाता, 272001
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता होती है, और जनता की सबसे बड़ी शक्ति सूचना। सूचना का अधिकार (आरटीआई) उसी शक्ति का संवैधानिक रूप है। ऐसे में यदि आरटीआई कार्यकर्ताओं को संदेह, उपेक्षा या घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगे, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का अपमान है।निस्संदेह, कुछ लोगों ने
आर टी आई आजीविका या दबाव बनाने का साधन बनाया होगा। ऐसे लोगों पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। किंतु क्या कुछ अपवादों के आधार पर पूरे आर टी आई आंदोलन को कठघरे में खड़ा कर देना न्यायसंगत है? क्या कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के कारण पूरी नौकरशाही भ्रष्ट हो जाती है? क्या कुछ बिके हुए पत्रकारों के कारण पूरी पत्रकारिता अपराधी हो जाती है? यदि नहीं, तो फिर कुछ लोगों के कारण सभी आर टी आई कार्यकर्ताओं को संदेह की दृष्टि से क्यों देखा जाए?सच्चाई यह है कि आर टी आई कार्यकर्ता व्यवस्था के विरोधी नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने वाले प्रहरी हैं। वे उस अंधेरे में दीपक जलाते हैं जहाँ भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और प्रशासनिक अपारदर्शिता अपने पैर पसार चुकी होती है। यदि शासन-प्रशासन पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह होता, तो किसी नागरिक को आर टी आई लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
आज भ्रष्टाचार एक व्यक्ति, एक विभाग या एक सरकार की समस्या नहीं है। यह एक ऐसी दीमक है जो व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रही है। इसे पूरी तरह समाप्त करना कठिन हो सकता है, किंतु इसे नियंत्रित करना और सीमित करना संभव है। आर टी आई उसी संघर्ष का सबसे प्रभावी लोकतांत्रिक अस्त्र है।सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। उसके प्रत्येक शब्द का सामाजिक और नैतिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए जब कार्यकर्ताओं के संबंध में कोई व्यापक टिप्पणी की जाती है, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि देश में हजारों ऐसे कार्यकर्ता भी हैं जो निस्वार्थ भाव से जनहित के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे न धन चाहते हैं, न पद; वे केवल व्यवस्था में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व चाहते हैं।किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके सबसे कमजोर उदाहरणों से नहीं, बल्कि उसके सर्वोत्तम योगदानों से किया जाना चाहिए। यदि कुछ लोगों ने आर टी आई. को कलंकित किया है, तो हजारों लोगों ने उसी. आर टी आई के माध्यम से भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर जनता का धन बचाया है।
कौटिल्य उवाच
"जब सत्ता प्रश्नों से डरने लगे और प्रश्न पूछने वाले संदेह के घेरे में खड़े कर दिए जाएँ, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या प्रश्नकर्ता में नहीं, व्यवस्था में है। RTI कार्यकर्ता लोकतंत्र के अपराधी नहीं, उसकी सजग अंतरात्मा हैं। कुछ स्वार्थी तत्वों के कारण पूरे आंदोलन को दोषी ठहराना उसी प्रकार है जैसे कुछ सूखे वृक्षों को देखकर पूरे वन को मृत घोषित कर देना।"लोकतंत्र में तलवार से अधिक शक्तिशाली कलम होती है, और कलम से अधिक शक्तिशाली सूचना। इसलिए RTI कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित नहीं, बल्कि प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि पारदर्शिता ही सुशासन की पहली शर्त है।

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