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शनिवार, 20 जून 2026


 

सीता : वाल्मीकि, कम्बन और कालिदास की दृष्टि में
भारतीय नारीत्व का शाश्वत आदर्श
भारतीय साहित्य, संस्कृति और दर्शन में यदि किसी स्त्री चरित्र ने सबसे व्यापक और स्थायी प्रभाव छोड़ा है, तो वह सीता हैं। वे केवल रामायण की नायिका नहीं हैं, बल्कि भारतीय मानस में त्याग, तप, मर्यादा, करुणा, आत्मबल और आत्मसम्मान की जीवित प्रतिमा हैं। भारत की विभिन्न भाषाओं, परंपराओं और युगों के कवियों ने सीता का चित्रण किया है, किंतु तीन महाकवियों—महर्षि वाल्मीकि, महाकवि कम्बन और महाकवि कालिदास—की दृष्टि में सीता का स्वरूप विशेष महत्व रखता है।
तीनों कवियों की दृष्टि भिन्न है, काल भिन्न है, भाषा भिन्न है, किंतु तीनों के हृदय में सीता के प्रति अगाध श्रद्धा है।
वाल्मीकि की सीता : संघर्ष, स्वाभिमान और सत्य की मूर्ति
महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है। उन्होंने सीता को किसी अलौकिक देवी के रूप में नहीं, बल्कि भावनाओं से परिपूर्ण एक महान स्त्री के रूप में चित्रित किया है।
जब राम वन जाने का निर्णय लेते हैं, तब सीता केवल उनका अनुसरण नहीं करतीं, बल्कि अपने अधिकार और कर्तव्य का प्रतिपादन करती हैं। वे स्पष्ट कहती हैं कि पति का सुख-दुःख पत्नी का भी सुख-दुःख है।
वाल्मीकि रामायण में सीता का यह प्रसिद्ध कथन उल्लेखनीय है—
यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव।
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्॥
अर्थ: हे राघव! यदि आप आज वन को प्रस्थान कर रहे हैं, तो मैं आपके आगे-आगे चलकर मार्ग के कुश और कांटों को हटाती चलूँगी।
यह श्लोक सीता की दृढ़ता और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। वे दया की पात्र नहीं हैं; वे संघर्ष की सहभागी हैं।
अशोक वाटिका में रावण के समक्ष उनका आत्मविश्वास और भी अधिक प्रखर दिखाई देता है। रावण उन्हें भय, वैभव और शक्ति का प्रलोभन देता है, किंतु सीता अडिग रहती हैं।
वाल्मीकि की सीता का सबसे महान पक्ष उनका आत्मसम्मान है। उत्तरकाण्ड में जब उनके चरित्र पर पुनः प्रश्न उठते हैं, तब वे पृथ्वी माता का आह्वान करती हैं—
यदि मे हृदयं नित्यं रामे तिष्ठति नान्यथा।
तथा मां धरणी देवी विवरं दातुमर्हति॥
अर्थात यदि मेरा हृदय सदैव राम में ही स्थित रहा है, तो पृथ्वी देवी मुझे अपनी गोद में स्थान दें।
यह केवल पवित्रता की घोषणा नहीं, बल्कि आत्मगौरव की अंतिम उद्घोषणा है।
कम्बन की सीता : दिव्यता और भक्ति का आलोक
दक्षिण भारत के महान तमिल कवि कम्बन ने कम्ब रामायणम् में सीता को दैवीय तेज से मंडित किया है। उनके लिए सीता केवल जनक की पुत्री नहीं, बल्कि स्वयं महालक्ष्मी का अवतार हैं।
कम्बन के यहाँ सीता का सौंदर्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। उनका चरित्र ईश्वरीय प्रकाश से आलोकित दिखाई देता है। वे राम की शक्ति हैं, उनकी आत्मा हैं, उनकी धर्मयात्रा की सहचरी हैं।
कम्बन की काव्यदृष्टि में रावण का सीता-हरण केवल एक स्त्री का अपहरण नहीं, बल्कि धर्म पर अधर्म का आक्रमण है।
कम्बन लिखते हैं कि सीता का तेज ऐसा था कि लंका का वैभव भी उसके सामने फीका पड़ जाता था। अशोक वाटिका में बैठी हुई सीता बाह्य रूप से अकेली थीं, किंतु उनके भीतर धर्म की अपराजेय शक्ति विद्यमान थी।
कम्बन की दृष्टि में सीता भक्ति और शक्ति का अद्भुत संगम हैं।
कालिदास की सीता : करुणा और मर्यादा की प्रतिमा
संस्कृत साहित्य के अमर कवि कालिदास ने रघुवंश में रामकथा का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है। उनके यहाँ सीता का चरित्र करुणा और सौम्यता से ओतप्रोत है।
कालिदास की विशेषता यह है कि वे सीता की पीड़ा को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित करते हैं। उनके यहाँ न तो क्रोध का विस्फोट है और न ही विद्रोह का शोर। वहाँ मौन वेदना है, जो पाठक के हृदय को भीतर तक स्पर्श करती है।
रघुवंश में सीता के वन-निर्वासन का वर्णन करते हुए कालिदास ने ऐसी करुणा उत्पन्न की है कि पाठक स्वयं द्रवित हो उठता है।
कालिदास के अनुसार महानता का अर्थ केवल संघर्ष नहीं, बल्कि दुःख को गरिमा के साथ सहन करना भी है। सीता इसी महानता की प्रतिमूर्ति हैं।
तीनों दृष्टियों का तुलनात्मक अध्ययन
यदि वाल्मीकि, कम्बन और कालिदास की सीता को एक साथ देखा जाए तो तीन अलग-अलग आयाम सामने आते हैं।
वाल्मीकि की सीता संघर्षशील और स्वाभिमानी स्त्री हैं।
कम्बन की सीता दिव्य और आध्यात्मिक शक्ति की प्रतीक हैं।
कालिदास की सीता करुणा, धैर्य और मर्यादा की देवी हैं।
किन्तु इन तीनों रूपों के केंद्र में एक ही तत्व है—सत्य के प्रति अटूट निष्ठा।
सीता : भारतीय संस्कृति का नैतिक आदर्श
भारतीय परंपरा में स्त्री को केवल अधिकारों या कर्तव्यों की दृष्टि से नहीं देखा गया, बल्कि शक्ति और सृजन की आधारशिला माना गया है। सीता इसी भारतीय दृष्टि की सर्वोच्च अभिव्यक्ति हैं।
वे त्याग करती हैं, पर पराजित नहीं होतीं।
वे दुःख सहती हैं, पर टूटती नहीं।
वे अपमान झेलती हैं, पर अपने आत्मसम्मान का परित्याग नहीं करतीं।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, चरित्र और सत्य की शक्ति मनुष्य को अजेय बना देती है।
निष्कर्ष
महर्षि वाल्मीकि ने सीता में मानवीय संघर्ष का सौंदर्य देखा, कम्बन ने उनमें दिव्यता का प्रकाश देखा और कालिदास ने करुणा की महिमा देखी। तीनों दृष्टियाँ भिन्न होते हुए भी एक बिंदु पर आकर मिलती हैं—सीता भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं।
वे केवल रामायण की पात्र नहीं, बल्कि भारतीय नारीत्व की शाश्वत परिभाषा हैं।
इसलिए युग बदलते रहेंगे, साहित्य की धाराएँ बदलती रहेंगी, किंतु सीता का आदर्श कभी पुराना नहीं होगा। जब-जब सत्य, मर्यादा, धैर्य और आत्मसम्मान की चर्चा होगी, तब-तब जनकनन्दिनी सीता भारतीय चेतना के आकाश में ध्रुवतारे की भाँति आलोकित होती रहेंगी।
नास्ति सीतासमा नारी, न भूता न भविष्यति।
त्यागे, सत्ये, तपस्यायां, सा एव जगदम्बिका॥
अर्थात—त्याग, सत्य और तपस्या में सीता के समान न कोई स्त्री पहले हुई और न भविष्य में होगी; वे वास्तव में समस्त जगत् की माता हैं।


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