भारतीय सभ्यता के दीर्घ इतिहास में यदि किसी एक नारी चरित्र ने सहस्राब्दियों तक जनमानस को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वह सीता हैं। वे केवल रामायण की पात्र नहीं हैं, वे भारतीय संस्कृति की चेतना हैं। वे केवल मिथिला की राजकुमारी नहीं हैं, वे भारतीय नारीत्व की सर्वोच्च प्रतिमा हैं। वे केवल श्रीराम की अर्धांगिनी नहीं हैं, बल्कि धर्म, त्याग, स्वाभिमान, साहस, करुणा और शक्ति के अद्वितीय समन्वय का नाम हैं। दुर्भाग्यवश आधुनिक समय में सीता के चरित्र को अत्यंत सीमित करके प्रस्तुत किया गया। उन्हें केवल त्याग की मूर्ति, पीड़ा की प्रतिमा और पतिव्रता नारी के रूप में चित्रित किया गया। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी के सामने सीता का आधा व्यक्तित्व ही पहुँच पाया। जबकि सत्य यह है कि सीता भारतीय नारी शक्ति की ऐसी अधिष्ठात्री हैं, जिनमें दुर्गा का तेज, सरस्वती का ज्ञान, लक्ष्मी का सौम्य संतुलन और पृथ्वी का धैर्य एक साथ समाहित है।
वैदिक परंपरा और नारी का गौरव:भारतीय संस्कृति का मूल आधार वेद हैं। वेदों में नारी को कभी हीन नहीं माना गया। ऋग्वेद में अनेक ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है। गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने ज्ञान के क्षेत्र में पुरुषों के समान योगदान दिया।मनुस्मृति का प्रसिद्ध वचन है—
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।"अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।यह केवल सामाजिक व्यवस्था का नियम नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत है। भारतीय चिंतन में नारी को शक्ति कहा गया। यहाँ ईश्वर भी शक्ति के बिना अपूर्ण माना गया।
"शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं।"अर्थात शक्ति के बिना शिव भी सृजन और संचालन में समर्थ नहीं होते। ऐसी संस्कृति में सीता का उदय हुआ। इसलिए उन्हें केवल एक गृहस्थ नारी के रूप में समझना उनके विराट स्वरूप के साथ अन्याय होगा।
मिथिला : ज्ञान और शक्ति की भूमि:सीता का जन्म मिथिला में हुआ। मिथिला केवल एक राज्य नहीं था; वह ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन की भूमि थी। वहाँ राजर्षि जनक का शासन था। जनक ऐसे राजा थे जिनके दरबार में ऋषि और दार्शनिक शास्त्रार्थ करते थे।अष्टावक्र और जनक का संवाद भारतीय दर्शन की अमूल्य धरोहर है। गार्गी जैसी विदुषी उसी परंपरा की प्रतिनिधि थीं।ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी सीता केवल राजमहल की सुविधाओं में जीवन बिताने वाली कन्या नहीं थीं। वे ज्ञान, विवेक और आत्मबल से परिपूर्ण थीं।उनकी शिक्षा केवल राजकुमारी की शिक्षा नहीं थी; वह एक सभ्यता की उत्तराधिकारी की शिक्षा थी।
भूमिजा : पृथ्वी की पुत्री:सीता को भूमिजा कहा गया है। यह केवल जन्म की कथा नहीं है, बल्कि प्रतीक है।पृथ्वी सब कुछ सहन करती है। वह अन्न देती है, जीवन देती है, पोषण करती है। किंतु जब अन्याय अपनी सीमा पार कर देता है, तो वही पृथ्वी ज्वालामुखी बन जाती है।सीता उसी पृथ्वी की पुत्री हैं।उनके व्यक्तित्व में धैर्य भी है और शक्ति भी।उनमें करुणा भी है औआत्मसम्मान भी।उनमें प्रेम भी है और प्रतिरोध की क्षमता भी।यही कारण है कि वे भारतीय नारी शक्ति की सर्वोच्च प्रतीक बनती हैं।
शिवधनुष और सीता का सामर्थ्य:लोकपरंपरा में वर्णित है कि बाल्यकाल में सीता ने शिवधनुष को सहजता से उठा लिया था। चाहे इसे ऐतिहासिक तथ्य मानें या सांकेतिक प्रसंग, इसका संदेश अत्यंत गहरा है।शिवधनुष केवल एक अस्त्र नहीं था; वह दिव्य शक्ति का प्रतीक था।सीता का उससे सहज संबंध यह संकेत देता है कि वे साधारण व्यक्तित्व नहीं थीं।राजा जनक ने तभी निश्चय किया कि जो पुरुष इस धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा, वही सीता का पति बनने योग्य होगा।यह स्वयं सीता की गरिमा का प्रमाण है।राम और सीता : मर्यादा और शक्ति राम और सीता को अलग-अलग समझना असंभव है।राम मर्यादा हैं।सीता शक्ति हैं।राम धर्म के रक्षक हैं।
सीता धर्म की प्रेरणा हैं।राम नीति हैं।सीता संवेदना हैं।राम आदर्श राजा हैं।सीता आदर्श नारी हैं।इसीलिए रामायण केवल राम की कथा नहीं है। यह मर्यादा और शक्ति के दिव्य मिलन की कथा है।
"शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं।"अर्थात शक्ति के बिना शिव भी सृजन और संचालन में समर्थ नहीं होते। ऐसी संस्कृति में सीता का उदय हुआ। इसलिए उन्हें केवल एक गृहस्थ नारी के रूप में समझना उनके विराट स्वरूप के साथ अन्याय होगा।
मिथिला : ज्ञान और शक्ति की भूमि:सीता का जन्म मिथिला में हुआ। मिथिला केवल एक राज्य नहीं था; वह ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन की भूमि थी। वहाँ राजर्षि जनक का शासन था। जनक ऐसे राजा थे जिनके दरबार में ऋषि और दार्शनिक शास्त्रार्थ करते थे।अष्टावक्र और जनक का संवाद भारतीय दर्शन की अमूल्य धरोहर है। गार्गी जैसी विदुषी उसी परंपरा की प्रतिनिधि थीं।ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी सीता केवल राजमहल की सुविधाओं में जीवन बिताने वाली कन्या नहीं थीं। वे ज्ञान, विवेक और आत्मबल से परिपूर्ण थीं।उनकी शिक्षा केवल राजकुमारी की शिक्षा नहीं थी; वह एक सभ्यता की उत्तराधिकारी की शिक्षा थी।
भूमिजा : पृथ्वी की पुत्री:सीता को भूमिजा कहा गया है। यह केवल जन्म की कथा नहीं है, बल्कि प्रतीक है।पृथ्वी सब कुछ सहन करती है। वह अन्न देती है, जीवन देती है, पोषण करती है। किंतु जब अन्याय अपनी सीमा पार कर देता है, तो वही पृथ्वी ज्वालामुखी बन जाती है।सीता उसी पृथ्वी की पुत्री हैं।उनके व्यक्तित्व में धैर्य भी है और शक्ति भी।उनमें करुणा भी है औआत्मसम्मान भी।उनमें प्रेम भी है और प्रतिरोध की क्षमता भी।यही कारण है कि वे भारतीय नारी शक्ति की सर्वोच्च प्रतीक बनती हैं।
शिवधनुष और सीता का सामर्थ्य:लोकपरंपरा में वर्णित है कि बाल्यकाल में सीता ने शिवधनुष को सहजता से उठा लिया था। चाहे इसे ऐतिहासिक तथ्य मानें या सांकेतिक प्रसंग, इसका संदेश अत्यंत गहरा है।शिवधनुष केवल एक अस्त्र नहीं था; वह दिव्य शक्ति का प्रतीक था।सीता का उससे सहज संबंध यह संकेत देता है कि वे साधारण व्यक्तित्व नहीं थीं।राजा जनक ने तभी निश्चय किया कि जो पुरुष इस धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा, वही सीता का पति बनने योग्य होगा।यह स्वयं सीता की गरिमा का प्रमाण है।राम और सीता : मर्यादा और शक्ति राम और सीता को अलग-अलग समझना असंभव है।राम मर्यादा हैं।सीता शक्ति हैं।राम धर्म के रक्षक हैं।
सीता धर्म की प्रेरणा हैं।राम नीति हैं।सीता संवेदना हैं।राम आदर्श राजा हैं।सीता आदर्श नारी हैं।इसीलिए रामायण केवल राम की कथा नहीं है। यह मर्यादा और शक्ति के दिव्य मिलन की कथा है।
वनगमन : साहस का निर्णय:जब राम को वनवास मिला, तब सीता के सामने विकल्प था कि वे राजमहल में रहें।किन्तु उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे राम के बिना नहीं रहेंगी।यह निर्णय भावुकता का नहीं था।यह साहस का निर्णय था।वन का जीवन कठिन था। वहाँ न सुख था, न सुरक्षा।
फिर भी सीता ने उस मार्ग को चुना।यह उनके आत्मबल का प्रमाण है।आज की भाषा में कहें तो यह एक स्वतंत्र और स्वायत्त निर्णय था।
रावण के सामने अडिग स्वाभिमान:रामायण का सबसे प्रेरणादायक पक्ष सीता का स्वाभिमान है।
रावण समस्त लंका का सम्राट था।उसके पास असीम शक्ति थी।उसके पास वैभव था।उसके पास साम्राज्य था।किन्तु वह सीता का आत्मसम्मान नहीं जीत सका।अशोक वाटिका में सीता का चरित्र नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है।वे भयभीत नहीं हुईं।वे विचलित नहीं हुईं।
वे झुकी नहीं।उन्होंने स्पष्ट कहा कि अधर्म के सामने समर्पण असंभव है।
यह केवल एक स्त्री का साहस नहीं था।यह धर्म की विजय थी।
अशोक वाटिका : मानसिक युद्ध: विश्व इतिहास में अनेक युद्ध हुए हैं।किन्तु अशोक वाटिका का युद्ध अद्वितीय है।यह युद्ध तलवारों से नहीं लड़ा गया।यह युद्ध आत्मबल से लड़ा गया।एक ओर रावण था।दूसरी ओर सीता।रावण के पास शक्ति थी।सीता के पास सत्य था।और अंततः विजय सत्य की हुई।यह प्रसंग बताता है कि नारी की वास्तविक शक्ति केवल शारीरिक नहीं होती; उसका सबसे बड़ा बल उसका चरित्र होता है।
अग्निपरीक्षा का दार्शनिक पक्ष:अग्निपरीक्षा का प्रसंग आधुनिक समय में विवाद का विषय बनता है।किन्तु भारतीय परंपरा इसे प्रतीकात्मक दृष्टि से भी देखती है।अग्नि सत्य और पवित्रता का प्रतीक है।सीता उस अग्नि से अक्षुण्ण निकलती हैं।यह केवल उनकी पवित्रता का नहीं, बल्कि उनके आत्मबल का प्रतीक है।
वाल्मीकि आश्रम और मातृत्व:सीता का जीवन केवल संघर्ष नहीं था।वह निर्माण भी थावाल्मीकि आश्रम में उन्होंने लव और कुश का पालन-पोषण किया।उन्होंने उन्हें केवल युद्धकला नहीं सिखाई।उन्होंने धर्म, ज्ञान और संस्कृति का संस्कार दिया।यहीं से भारतीय नारी का एक और स्वरूप सामने आता है—राष्ट्रनिर्माता माता का स्वरूप।
सीता और दुर्गा:भारतीय संस्कृति में शक्ति के अनेक रूप हैं।दुर्गा शस्त्र धारण करती हैं।काली अधर्म का विनाश करती हैं।सरस्वती ज्ञान देती हैं।लक्ष्मी समृद्धि प्रदान करती हैं।सीता इन सबके मध्य संतुलन का स्वरूप हैं।वे दिखाती हैं कि शक्ति केवल युद्ध नहीं है।धैर्य भी शक्ति है।त्याग भी शक्ति है।सत्य भी शक्ति है।इतिहास की नारी शक्तियाँ भारत के इतिहास में अनेक महान स्त्रियाँ हुईं—गार्गी,मैत्रेयी,रानी दुर्गावती,अहिल्याबाई होल्कररानी लक्ष्मीबाई,रानी चेन्नम्मा,इन सभी में सीता की परंपरा दिखाई देती है।इन सभी ने अपने-अपने युग में नारी शक्ति का परिचय दिया।
आधुनिक नारी और सीता:आज नारी सशक्तिकरण की चर्चा बहुत होती है।किन्तु भारतीय दृष्टि में सशक्तिकरण का अर्थ केवल अधिकार नहीं है।उसका अर्थ है—आत्मविश्वास,शिक्षा
आत्मनिर्भरता,चरित्रबल,सांस्कृतिक चेतना,राष्ट्रधर्म के प्रति निष्ठा,सीता इन सभी गुणों की प्रतीक हैं। वे आधुनिक भारत की महिलाओं के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी त्रेतायुग में थीं।
भारत माता और सीता:भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे सुंदर अवधारणा है—भारत माता।भारत को माता कहने की प्रेरणा भारतीय शक्ति परंपरा से आती है।सीता पृथ्वी की पुत्री हैं।भारत माता राष्ट्र की चेतना है।दोनों में मातृत्व, करुणा और शक्ति का अद्भुत समन्वय है।इसीलिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मातृभूमि की वंदना की गई।"वन्दे मातरम्।"यह केवल भूमि की वंदना नहीं थी।यह उस शक्ति की वंदना थी जो सीता, दुर्गा और भारत माता के रूप में भारतीय मानस में जीवित है।
2047 का भारत और सीता;जब भारत स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण करेगा, तब केवल आर्थिक प्रगति पर्याप्त नहीं होगी।भारत को अपनी सांस्कृतिक आत्मा भी सुरक्षित रखनी होगी।उस आत्मा के केंद्र में सीता जैसे आदर्श होंगे। यदि भारत की बेटियाँ शिक्षा, आत्मविश्वास, संस्कार और राष्ट्रचेतना से युक्त होंगी, तो भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा।
सीता को केवल आँसुओं में मत खोजिए।उन्हें मिथिला के ज्ञान में खोजिए।उन्हें शिवधनुष के सामर्थ्य में खोजिए।उन्हें वनगमन के साहस में खोजिए।उन्हें अशोक वाटिका के स्वाभिमान में खोजिए।उन्हें वाल्मीकि आश्रम के मातृत्व में खोजिए।उन्हें भारत माता की चेतना में खोजिए।
सीता केवल एक पात्र नहीं हैं।वे भारतीय नारी शक्ति की अधिष्ठात्री हैं।वे करुणा की प्रतिमा हैं, किंतु करुणा से कहीं अधिक शक्ति की ज्योति हैं।वे त्याग की देवी हैं, किंतु त्याग से कहीं अधिक स्वाभिमान की मूर्ति हैं।वे भारतीय सभ्यता की आत्मा हैं।और जब तक भारत की पुत्रियाँ सीता के इस स्वरूप को स्मरण रखेंगी, तब तक यह राष्ट्र केवल जीवित ही नहीं रहेगा, बल्कि विश्व को मार्गदर्शन भी देता रहेगा।
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"
सीता उसी शक्ति की सनातन अभिव्यक्ति हैं।
फिर भी सीता ने उस मार्ग को चुना।यह उनके आत्मबल का प्रमाण है।आज की भाषा में कहें तो यह एक स्वतंत्र और स्वायत्त निर्णय था।
रावण के सामने अडिग स्वाभिमान:रामायण का सबसे प्रेरणादायक पक्ष सीता का स्वाभिमान है।
रावण समस्त लंका का सम्राट था।उसके पास असीम शक्ति थी।उसके पास वैभव था।उसके पास साम्राज्य था।किन्तु वह सीता का आत्मसम्मान नहीं जीत सका।अशोक वाटिका में सीता का चरित्र नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है।वे भयभीत नहीं हुईं।वे विचलित नहीं हुईं।
वे झुकी नहीं।उन्होंने स्पष्ट कहा कि अधर्म के सामने समर्पण असंभव है।
यह केवल एक स्त्री का साहस नहीं था।यह धर्म की विजय थी।
अशोक वाटिका : मानसिक युद्ध: विश्व इतिहास में अनेक युद्ध हुए हैं।किन्तु अशोक वाटिका का युद्ध अद्वितीय है।यह युद्ध तलवारों से नहीं लड़ा गया।यह युद्ध आत्मबल से लड़ा गया।एक ओर रावण था।दूसरी ओर सीता।रावण के पास शक्ति थी।सीता के पास सत्य था।और अंततः विजय सत्य की हुई।यह प्रसंग बताता है कि नारी की वास्तविक शक्ति केवल शारीरिक नहीं होती; उसका सबसे बड़ा बल उसका चरित्र होता है।
अग्निपरीक्षा का दार्शनिक पक्ष:अग्निपरीक्षा का प्रसंग आधुनिक समय में विवाद का विषय बनता है।किन्तु भारतीय परंपरा इसे प्रतीकात्मक दृष्टि से भी देखती है।अग्नि सत्य और पवित्रता का प्रतीक है।सीता उस अग्नि से अक्षुण्ण निकलती हैं।यह केवल उनकी पवित्रता का नहीं, बल्कि उनके आत्मबल का प्रतीक है।
वाल्मीकि आश्रम और मातृत्व:सीता का जीवन केवल संघर्ष नहीं था।वह निर्माण भी थावाल्मीकि आश्रम में उन्होंने लव और कुश का पालन-पोषण किया।उन्होंने उन्हें केवल युद्धकला नहीं सिखाई।उन्होंने धर्म, ज्ञान और संस्कृति का संस्कार दिया।यहीं से भारतीय नारी का एक और स्वरूप सामने आता है—राष्ट्रनिर्माता माता का स्वरूप।
सीता और दुर्गा:भारतीय संस्कृति में शक्ति के अनेक रूप हैं।दुर्गा शस्त्र धारण करती हैं।काली अधर्म का विनाश करती हैं।सरस्वती ज्ञान देती हैं।लक्ष्मी समृद्धि प्रदान करती हैं।सीता इन सबके मध्य संतुलन का स्वरूप हैं।वे दिखाती हैं कि शक्ति केवल युद्ध नहीं है।धैर्य भी शक्ति है।त्याग भी शक्ति है।सत्य भी शक्ति है।इतिहास की नारी शक्तियाँ भारत के इतिहास में अनेक महान स्त्रियाँ हुईं—गार्गी,मैत्रेयी,रानी दुर्गावती,अहिल्याबाई होल्कररानी लक्ष्मीबाई,रानी चेन्नम्मा,इन सभी में सीता की परंपरा दिखाई देती है।इन सभी ने अपने-अपने युग में नारी शक्ति का परिचय दिया।
आधुनिक नारी और सीता:आज नारी सशक्तिकरण की चर्चा बहुत होती है।किन्तु भारतीय दृष्टि में सशक्तिकरण का अर्थ केवल अधिकार नहीं है।उसका अर्थ है—आत्मविश्वास,शिक्षा
आत्मनिर्भरता,चरित्रबल,सांस्कृतिक चेतना,राष्ट्रधर्म के प्रति निष्ठा,सीता इन सभी गुणों की प्रतीक हैं। वे आधुनिक भारत की महिलाओं के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी त्रेतायुग में थीं।
भारत माता और सीता:भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे सुंदर अवधारणा है—भारत माता।भारत को माता कहने की प्रेरणा भारतीय शक्ति परंपरा से आती है।सीता पृथ्वी की पुत्री हैं।भारत माता राष्ट्र की चेतना है।दोनों में मातृत्व, करुणा और शक्ति का अद्भुत समन्वय है।इसीलिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मातृभूमि की वंदना की गई।"वन्दे मातरम्।"यह केवल भूमि की वंदना नहीं थी।यह उस शक्ति की वंदना थी जो सीता, दुर्गा और भारत माता के रूप में भारतीय मानस में जीवित है।
2047 का भारत और सीता;जब भारत स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण करेगा, तब केवल आर्थिक प्रगति पर्याप्त नहीं होगी।भारत को अपनी सांस्कृतिक आत्मा भी सुरक्षित रखनी होगी।उस आत्मा के केंद्र में सीता जैसे आदर्श होंगे। यदि भारत की बेटियाँ शिक्षा, आत्मविश्वास, संस्कार और राष्ट्रचेतना से युक्त होंगी, तो भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा।
सीता को केवल आँसुओं में मत खोजिए।उन्हें मिथिला के ज्ञान में खोजिए।उन्हें शिवधनुष के सामर्थ्य में खोजिए।उन्हें वनगमन के साहस में खोजिए।उन्हें अशोक वाटिका के स्वाभिमान में खोजिए।उन्हें वाल्मीकि आश्रम के मातृत्व में खोजिए।उन्हें भारत माता की चेतना में खोजिए।
सीता केवल एक पात्र नहीं हैं।वे भारतीय नारी शक्ति की अधिष्ठात्री हैं।वे करुणा की प्रतिमा हैं, किंतु करुणा से कहीं अधिक शक्ति की ज्योति हैं।वे त्याग की देवी हैं, किंतु त्याग से कहीं अधिक स्वाभिमान की मूर्ति हैं।वे भारतीय सभ्यता की आत्मा हैं।और जब तक भारत की पुत्रियाँ सीता के इस स्वरूप को स्मरण रखेंगी, तब तक यह राष्ट्र केवल जीवित ही नहीं रहेगा, बल्कि विश्व को मार्गदर्शन भी देता रहेगा।
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"
सीता उसी शक्ति की सनातन अभिव्यक्ति हैं।
सीतायण से साभार!क्रमश:

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