वंदे मातरम् : इतिहास, केराष्ट्र और राज्य का अंतर
वंदे मातरम् को समझने से पहले राष्ट्र और राज्य के अंतर को समझना आवश्यक है। राज्य एक राजनीतिक व्यवस्था है। उसकी सीमाएँ बदलती रहती हैं, शासक बदलते रहते हैं, संविधान बदल सकते हैं, प्रशासनिक ढाँचे बदल सकते हैं। किंतु राष्ट्र एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सत्ता है। वह केवल भूमि का टुकड़ा नहीं होता; वह इतिहास, स्मृति, परंपरा, संस्कृति, भाषा, आस्था और साझा जीवन-मूल्यों का जीवंत समुच्चय होता है। भारत का राष्ट्रभाव अंग्रेजों के आने से नहीं बना और न ही 1947 में उसका जन्म हुआ। जब वेदों में ऋषियों ने पृथ्वी को माता कहा, जब उपनिषदों ने संपूर्ण मानवता को एक परिवार माना, जब राम ने "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का आदर्श स्थापित किया, जब कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए कर्म का संदेश दिया,तब भारत राष्ट्र के रूप में जीवित था। वंदे मातरम् उसी शाश्वत राष्ट्रभाव का आधुनिक अभिव्यक्ति-पत्र है। भारत माता की अवधारणा,विश्व के अनेक देशों में राष्ट्र को केवल राजनीतिक इकाई के रूप में देखा गया। भारत ने राष्ट्र को माता के रूप में देखा। यह दृष्टि अद्वितीय है। भारत के लिए भूमि केवल भूगोल नहीं है। यह तप, त्याग, बलिदान और संस्कृति का संचय है।
जब भारतीय "भारत माता" कहते हैं, तो वे किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि उस समग्र राष्ट्रीय चेतना की वंदना करते हैं जिसने उन्हें जन्म दिया, पाला-पोसा, ज्ञान दिया और जीवन का उद्देश्य प्रदान किया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसी भावना को शब्द दिए। उन्होंने भारत को देवी के रूप में चित्रित किया, क्योंकि दासता के अंधकार में डूबे समाज को अपनी शक्ति का स्मरण कराना आवश्यक था। किंतु यह समझना होगा कि भारत माता की अवधारणा बंकिमचंद्र से प्रारंभ नहीं हुई। उन्होंने केवल उस भाव को शब्द दिया जो हजारों वर्षों से भारतीय मानस में विद्यमान था।
वंदे मातरम् : राष्ट्रगीत नहीं, राष्ट्रमंत्र,कई बार वंदे मातरम् को केवल राष्ट्रगीत कह दिया जाता है। राष्ट्रगीत उसका संवैधानिक परिचय हो सकता है, किंतु उसका वास्तविक स्वरूप उससे कहीं व्यापक है।गीत गाए जाते हैं; मंत्र जिए जाते हैं।
गीत मनोरंजन कर सकते हैं; मंत्र परिवर्तन करते हैं।गीत स्मृति में रहते हैं; मंत्र चेतना में उतरते हैं।
वंदे मातरम् ने भारतीयों के भीतर आत्मविश्वास जगाया। अंग्रेजी शासन भारतीयों को यह विश्वास दिलाने में लगा था कि वे हीन हैं, पिछड़े हैं और स्वयं अपना शासन नहीं चला सकते। वंदे मातरम् ने इस मानसिक गुलामी को तोड़ा। इसने भारतीयों से कहा—तुम किसी पराजित जाति के वंशज नहीं, बल्कि उस सभ्यता के उत्तराधिकारी हो जिसने संसार को ज्ञान दिया है।
स्वदेशी आंदोलन : वंदे मातरम् का एक अध्याय
निस्संदेह स्वदेशी आंदोलन में वंदे मातरम् ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु यह उसकी संपूर्ण कहानी नहीं है। स्वदेशी आंदोलन वंदे मातरम् की विशाल यात्रा का केवल एक अध्याय है।यदि हम केवल उसी पर बार-बार लौटते रहेंगे, तो हम उसके अन्य आयामों को खो देंगे। वंदे मातरम् शिक्षा में भी है, साहित्य में भी है, विज्ञान में भी है, सैनिक के साहस में भी है और किसान के श्रम में भी है।
जब कोई वैज्ञानिक भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है, तब वह भी वंदे मातरम् की भावना को आगे बढ़ा रहा होता है। जब कोई शिक्षक राष्ट्रनिर्माण के लिए समर्पित होकर विद्यार्थियों का निर्माण करता है, तब भी वह वंदे मातरम् को जी रहा होता है। जब कोई लेखक राष्ट्रचेतना को शब्द देता है, तब भी वह उसी परंपरा का वाहक होता है।
स्वतंत्रता के बाद का प्रश्न,एक गंभीर प्रश्न यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वंदे मातरम् का क्या हुआ?अंग्रेज चले गए, किंतु क्या राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का कार्य पूर्ण हो गया? क्या भ्रष्टाचार समाप्त हो गया? क्या सामाजिक विभाजन समाप्त हो गए? क्या सांस्कृतिक आत्मविश्वास पूरी तरह लौट आया? यदि उत्तर नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वंदे मातरम् का कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ।आज शत्रु का स्वरूप बदल गया है। कभी विदेशी शासन चुनौती था; आज सांस्कृतिक विस्मृति, ऐतिहासिक अज्ञान, सामाजिक विखंडन और मानसिक उपनिवेशवाद बड़ी चुनौतियाँ हैं। अतः वंदे मातरम् का अर्थ केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौतियों का सामना करना भी है।
आत्मनिर्भर भारत और वंदे मातरम्,आज जब भारत आत्मनिर्भरता की बात करता है, तब हमें समझना चाहिए कि यह स्वदेशी आंदोलन की ही आधुनिक अभिव्यक्ति है। किंतु आज का स्वदेशी केवल कपड़े तक सीमित नहीं है। अब स्वदेशी का अर्थ है,ज्ञान में आत्मनिर्भरता,तकनीक में आत्मनिर्भरता,रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता,
कृषि और उद्योग में आत्मनिर्भरता,सांस्कृतिक आत्मविश्वास में आत्मनिर्भरता।यदि 1905 का स्वदेशी विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आंदोलन था, तो 21वीं सदी का स्वदेशी राष्ट्रीय सामर्थ्य के निर्माण का आंदोलन है।
2047 का भारत और वंदे मातरम्,जब भारत स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब राष्ट्र के सामने केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं होगा। प्रश्न यह होगा कि क्या भारत अपनी आत्मा को पहचान पाया? क्या उसने अपनी सभ्यता की शक्ति को समझा? क्या उसने विश्व को केवल उत्पाद दिए या विचार भी दिए?2047 का भारत तभी जगतगुरु बन सकेगा, जब वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा। वंदे मातरम् इसी जुड़ाव का सूत्र है। यह हमें स्मरण कराता है कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
युवाओं की भूमिका,आज का युवा वंदे मातरम् को केवल इतिहास की पुस्तक में पढ़कर नहीं समझ सकता। उसे इसे अपने जीवन में उतारना होगा।
ईमानदारी से कार्य करना भी वंदे मातरम् है।
राष्ट्रहित को निजी हित से ऊपर रखना भी वंदे मातरम् है। समाज के लिए कुछ करना भी वंदे मातरम् है।अपने ज्ञान और प्रतिभा को भारत की उन्नति में लगाना भी वंदे मातरम् है।
जब राष्ट्र के करोड़ों युवा इस भावना को स्वीकार करेंगे, तब वंदे मातरम् केवल गीत नहीं रहेगा; वह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आधार बन जाएगा।
वंदे मातरम् को बार-बार केवल बंग-भंग, स्वदेशी आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित कर देना उसकी विराटता को छोटा करना है। वह इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का सतत प्रवाह है। वह अतीत का गौरव भी है, वर्तमान का दायित्व भी और भविष्य का संकल्प भी।जब तक भारत की नदियाँ बहती रहेंगी, जब तक हिमालय अडिग खड़ा रहेगा, जब तक इस भूमि पर राष्ट्रभक्ति का एक भी दीप जलता रहेगा, तब तक वंदे मातरम् केवल गाया नहीं जाएगा—जिया जाएगा। और वही दिन भारत के पुनर्जागरण का होगा, जब करोड़ों कंठों से निकला "वंदे मातरम्" केवल उद्घोष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का परिचय बन जाएगा।
यह लेख पिछले लेख का विस्तार है और श्रृंखला को पुनरावृत्ति से निकालकर दार्शनिक एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा में आगे बढ़ाता है।
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