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बुधवार, 24 जून 2026

भवभूति की सीता:जिसे अयोध्या ने कभी न माना और न जाना!

 भवभूति की सीता:जिसे  अयोध्या  ने  कभी  न  माना और  न  जाना!


उत्तर रामचरित की सीता : करुणा, तप और आत्मगौरव की शाश्वत गाथा,भारतीय साहित्य के इतिहास में कुछ चरित्र ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर शाश्वत प्रतीक बन जाते हैं। सीता ऐसा ही एक चरित्र हैं। वे केवल मिथिला की राजकुमारी नहीं, केवल अयोध्या की महारानी नहीं, केवल राम की अर्धांगिनी नहीं; वे भारतीय संस्कृति के हृदय में धड़कती हुई करुणा, त्याग, धैर्य और आत्मगौरव की अमर प्रतिमा हैं।

















महर्षि वाल्मीकि ने सीता को इतिहास के धरातल पर प्रतिष्ठित किया, गोस्वामी तुलसीदास ने उन्हें भक्ति के आकाश में प्रतिष्ठा दी, किन्तु महाकवि भवभूति ने उन्हें मानव हृदय की सबसे गहरी वेदना और सबसे ऊँची नैतिक गरिमा का स्वर बना दिया। यही कारण है कि उत्तर रामचरित की सीता केवल एक पात्र नहीं रह जातीं; वे भारतीय मानस की सामूहिक पीड़ा और उसकी नैतिक विजय का प्रतीक बन जाती हैं।भवभूति करुण रस के अप्रतिम साधक हैं। उनका प्रसिद्ध कथन,"एको रसः करुण एव निमित्तभेदात्"भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास में एक उद्घोष की तरह गूँजता है। भवभूति के अनुसार जीवन का मूल अनुभव करुणा है। सुख क्षणिक है, वैभव नश्वर है, सत्ता परिवर्तनशील है; किन्तु दुःख और संवेदना मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान कराते हैं। इसलिए उत्तररामचरित में सीता केवल दुःख की पात्र नहीं, बल्कि करुणा की दार्शनिक व्याख्या बन जाती हैं।
लोकापवाद के कारण गर्भवती सीता का वन में परित्याग भारतीय साहित्य की सबसे मर्मांतक घटनाओं में से एक है। यह केवल एक स्त्री का निष्कासन नहीं; यह समाज द्वारा अपने ही आदर्शों की परीक्षा है। जिस स्त्री ने रावण के महल में रहते हुए भी अपने सतीत्व की ज्योति को अक्षुण्ण रखा, जिस स्त्री ने अग्नि को साक्षी बनाकर अपनी पवित्रता सिद्ध की, उसी स्त्री को पुनः लोकमत की वेदी पर चढ़ा दिया गया।
किन्तु सीता का चरित्र यहीं से दिव्यता प्राप्त करता है। वे विद्रोह नहीं करतीं, किंतु पराजित भी नहीं होतीं। वे रोती हैं, किंतु टूटती नहीं। वे अपमानित होती हैं, किंतु अपनी गरिमा का परित्याग नहीं करतीं। उनका मौन एक साधारण मौन नहीं है; वह इतिहास के समक्ष खड़ा हुआ एक गंभीर प्रश्न है।
वाल्मीकि आश्रम में सीता का जीवन भारतीय नारीत्व की दूसरी यात्रा प्रारम्भ करता है। अब वे केवल पत्नी नहीं हैं; वे माता हैं। लव और कुश का पालन-पोषण करते हुए वे यह सिद्ध करती हैं कि मातृत्व प्रतिशोध का नहीं, सृजन का नाम है। यदि वे चाहतीं तो अपने पुत्रों के मन में अयोध्या और राम के प्रति कटुता भर सकती थीं, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने उन्हें धर्म, मर्यादा, शौर्य और सत्य का संस्कार दिया। यही कारण है कि लव-कुश केवल राजकुमार नहीं बने; वे भारतीय संस्कृति के आदर्श बालक बन गए।
भवभूति की सीता की सबसे बड़ी शक्ति उनका आत्मगौरव है। वे किसी सभा में खड़ी होकर अपने लिए न्याय नहीं माँगतीं। वे संसार से प्रमाणपत्र नहीं चाहतीं। उन्हें ज्ञात है कि चरित्र का मूल्य भीड़ की राय से नहीं, आत्मा की निर्मलता से निर्धारित होता है। यह आत्मविश्वास ही उन्हें साधारण स्त्री से शाश्वत आदर्श बना देता है।
उत्तररामचरित का सबसे करुण पक्ष राम की अंतर्वेदना है। राम राजा हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, किन्तु वे मनुष्य भी हैं। राजधर्म ने उनसे सीता का त्याग कराया, किन्तु हृदय कभी उस निर्णय को स्वीकार नहीं कर पाया। भवभूति ने राम के हृदय की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है—
"दलति हृदयं गाढोद्वेगं द्विधा तु न भिद्यते।
वहति विकलः प्राणो मोहं न मुञ्चति चेतनाम्॥"
यह केवल राम का विलाप नहीं, बल्कि उस प्रत्येक मनुष्य की व्यथा है जिसने कर्तव्य और प्रेम के संघर्ष में अपने हृदय का एक भाग खो दिया हो।
सीता और राम का संबंध उत्तररामचरित में दाम्पत्य की सीमाओं से ऊपर उठ जाता है। वे दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रह जाते; वे धर्म और करुणा, कर्तव्य और प्रेम, सत्ता और संवेदना के बीच चलने वाले शाश्वत संवाद का रूप ले लेते हैं। राम राजधर्म की वेदी पर स्वयं को बलिदान करते हैं, और सीता लोकापवाद की अग्नि में अपने जीवन को तपाती हैं। दोनों विजयी भी हैं और दोनों पीड़ित भी।
अंततः जब पृथ्वी माता अपनी पुत्री को पुनः अपने अंक में समेट लेती हैं, तब भारतीय साहित्य का एक सबसे मार्मिक दृश्य सामने आता है। यह मृत्यु नहीं है; यह पृथ्वी की गोद में सत्य की वापसी है। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं धरती कह रही हो—जिस समाज ने मेरी पुत्री को नहीं पहचाना, मैं उसे अपने पास वापस बुला रही हूँ।
सीता का पृथ्वी-प्रवेश अन्याय के सामने आत्मगौरव की अंतिम घोषणा है। वे संसार को यह सिखाती हैं कि आत्मसम्मान का मूल्य किसी राजसिंहासन से अधिक है। सत्य को बार-बार सिद्ध करना उसकी गरिमा का अपमान है।
आज के युग में जब नारी-अधिकार, समानता और गरिमा पर व्यापक चर्चा होती है, तब भवभूति की सीता का पुनर्पाठ आवश्यक हो जाता है। वे आधुनिक अर्थों में विद्रोही नहीं हैं, किन्तु आत्मगौरव की दृष्टि से अत्यंत प्रखर हैं। उनका जीवन बताता है कि नारी की शक्ति केवल प्रतिरोध में नहीं, बल्कि अपने सत्य पर अडिग रहने में भी निहित होती है।
यदि भारतीय संस्कृति को एक वाक्य में व्यक्त करना हो, तो कहा जा सकता है कि वह राम का धर्म और सीता की करुणा का संगम है। राम बिना सीता के अपूर्ण हैं, और सीता बिना राम के अधूरी नहीं, बल्कि और भी विराट दिखाई देती हैं। यही भवभूति की मौलिकता है।
उत्तररामचरित की सीता इतिहास की नहीं, अनन्त काल की नायिका हैं। वे पीड़ा में भी प्रकाश हैं, परित्याग में भी प्रतिष्ठा हैं, मौन में भी वाणी हैं और करुणा में भी शक्ति हैं। जब तक मानव हृदय में संवेदना जीवित रहेगी, जब तक अन्याय के सामने आत्मगौरव की आवश्यकता रहेगी, जब तक नारी की गरिमा पर विमर्श होता रहेगा, तब तक भवभूति की सीता भारतीय चेतना के आकाश में ध्रुवतारे की भाँति चमकती है. 
भवभूति  सीता आदर्श, मर्यादा,परम्परा, विद्वत्ता और सहिष्णुता की साक्षात.  प्रतिमूर्ति हैं.   लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती की त्रिवेणी का नाम है भवभूति की सीता!
राजेन्द्र  नाथ  तिवारी सीतायण...से 

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