भारत में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी शक्ति धन नहीं, बल्कि दंडमुक्ति है। - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

रविवार, 14 जून 2026

भारत में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी शक्ति धन नहीं, बल्कि दंडमुक्ति है।

  बस्ती में लोक निर्माण विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप,  क्या व्यवस्था स्वयं अपने विरुद्ध जांच करेगी?

बस्ती ,272001,सम्वाददाता 

बस्ती में लोक निर्माण विभाग के एक अधिकारी पर लगे गंभीर आरोप केवल किसी एक व्यक्ति की कार्यशैली का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि यह उस प्रशासनिक संस्कृति का दर्पण हैं जिसमें शिकायतें वर्षों तक फाइलों में दम तोड़ती रहती हैं और जवाबदेही का स्थान प्रभावशाली संरक्षण ले लेता है।यदि समाचार में प्रकाशित आरोपों में सत्यता का अंश भी है, तो यह मामला केवल विभागीय अनियमितता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास पर सीधा आघात है। जिस विभाग पर सड़कों, भवनों और सार्वजनिक संसाधनों की जिम्मेदारी हो, वहां यदि कमीशनखोरी, पक्षपात, प्रभाव दुरुपयोग और शिकायतों की अनदेखी जैसी बातें सामने आती हैं, तो नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं होता, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा खोखली हो जाती है।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि शिकायतें शासन स्तर तक पहुंचने के बाद भी यदि वर्षों तक निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तो फिर आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे? क्या व्यवस्था इतनी निर्बल हो चुकी है कि प्रभावशाली अधिकारी जांच प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकें? यदि नहीं, तो फिर कार्रवाई में यह विलंब क्यों?

भारत में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी शक्ति धन नहीं, बल्कि दंडमुक्ति  है। जब अधिकारियों को यह विश्वास हो जाता है कि शिकायतें आएंगी, जांच बैठेगी, फाइलें घूमेंगी और अंततः सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाएगा, तब भ्रष्टाचार एक अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।जनता यह भी जानना चाहती है कि यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित अधिकारी को सार्वजनिक रूप से क्लीन चिट क्यों नहीं दी जाती? और यदि आरोप गंभीर हैं, तो अब तक कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लोकतंत्र में अनिश्चितता स्वयं संदेह को जन्म देती है।

कौटिल्य ने लिखा था कि "राजकोष से चोरी करने वाला अधिकारी उसी प्रकार पकड़ना कठिन है जैसे पानी में तैरती मछली पानी पी रही है या नहीं।" लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य आंखें बंद कर ले। इसका अर्थ यह है कि निगरानी और दंड व्यवस्था और अधिक कठोर होनी चाहिए।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की है। यदि आरोप सत्य हैं तो कठोर दंड हो, और यदि असत्य हैं तो आरोप लगाने वालों को भी उत्तरदायी बनाया जाए। किंतु सबसे खतरनाक स्थिति वह है जिसमें न जांच पूरी हो, न सत्य सामने आए और न दोषी तय हो।बस्ती का यह प्रकरण एक बार फिर पूछ रहा है,क्या शासन भ्रष्टाचार के विरुद्ध केवल बयान देगा, या व्यवस्था के भीतर बैठे प्रभावशाली लोगों पर भी वही कानून लागू होगा जो एक सामान्य नागरिक पर होता है?

 कौटिल्य दृष्टि,"जब शिकायतों की फाइलें धूल खाती हैं, तब भ्रष्टाचार केवल अपराध नहीं रहता, वह शासन की मौन स्वीकृति बन जाता है।"

1 टिप्पणी:

Post Bottom Ad