असली,नकली प्रधानमंत्री? - कौटिल्य का भारत

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रविवार, 14 जून 2026

असली,नकली प्रधानमंत्री?

 मुखौटे और नेतृत्व के बीच: नटवर सिंह के बयान से उपजा राजनीतिक प्रश्न


कौटिल्य दृष्टि

भारतीय राजनीति में कुछ वक्तव्य समाचार नहीं होते, वे इतिहास के बंद पड़े कक्षों के द्वार खोल देते हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के नेटवर सिह  का यह कथन कि "मनमोहन सिंह मुखौटा थे, सोनिया गांधी असली प्रधानमंत्री थीं, जबकि मोदी स्वयं प्रधानमंत्री हैं, दबंग हैं और दमदार हैं" ऐसा ही एक वक्तव्य है।इस कथन पर सबसे अधिक पीड़ा उन लोगों को हो रही है जिन्होंने वर्षों तक यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि यूपीए शासन में सत्ता का कोई द्वैत केंद्र नहीं था। किंतु समस्या यह है कि यह आरोप किसी भाजपा प्रवक्ता ने नहीं लगाया, बल्कि उस व्यक्ति ने लगाया है जिसने सत्ता के गलियारों को भीतर से देखा था। कौटिल्य कहते हैं कि राज्य का सबसे बड़ा संकट बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि निर्णय की अस्पष्टता होती है। जहां आदेश देने वाला कोई और हो और उत्तरदायित्व निभाने वाला कोई और, वहां शासन धीरे-धीरे संस्था नहीं बल्कि व्यवस्था का अभिनय बन जाता है।यही प्रश्न आज नटवर सिंह के बयान के केंद्र में है।मनमोहन सिंह निस्संदेह विद्वान थे, सज्जन थे, ईमानदार थे। भारत के आर्थिक इतिहास में उनका योगदान सदैव स्मरण किया जाएगा। किंतु राजनीति केवल ईमानदारी से नहीं चलती, राजनीति निर्णय क्षमता से चलती है। इतिहास किसी शासक का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं करता कि वह कितना विनम्र था, बल्कि इस आधार पर करता है कि संकट के समय अंतिम निर्णय किसने लिया। यूपीए काल में देश ने एक विचित्र स्थिति दिखी, प्रधानमंत्री एक व्यक्ति थे, लेकिन राजनीतिक शक्ति का केंद्र दूसरा माना जाता था। मंत्रियों की जवाबदेही प्रधानमंत्री के प्रति कम और पार्टी नेतृत्व के प्रति अधिक दिखाई देती थी। राष्ट्रीयसलाहकार परिषद जैसी व्यवस्थाओं ने यह धारणा और मजबूत की कि संवैधानिक सत्ता और वास्तविक सत्ता दो अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ऐसी स्थिति को राज्य के लिए घातक माना गया है। वे स्पष्ट लिखते हैं कि राजा ही नीति का अंतिम केंद्र होना चाहिए। यदि आदेश की उत्पत्ति और उत्तरदायित्व का केंद्र अलग-अलग हो जाए तो प्रशासन में भ्रम, भ्रष्टाचार और शक्ति संघर्ष अनिवार्य हो जाते हैं।यही कारण है कि यूपीए के अंतिम वर्षों में सरकार की छवि एक ऐसी व्यवस्था की बन गई जो निर्णय लेने से अधिक निर्णय टालने में विश्वास करती थी। घोटाले केवल आर्थिक नहीं थे, वे नेतृत्व के संकट के प्रतीक भी थे।

इसके विपरीत नरेंद्र मोदी का राजनीतिक मॉडल बिल्कुल अलग है। उनके समर्थक हों या विरोधी, दोनों इस तथ्य से सहमत हैं कि निर्णयों का केंद्र स्पष्ट है। यदि नोटबंदी सफल होती है तो श्रेय मोदी का, यदिआलोचना होती है तो निशाना भी मोदी। यदि अनुच्छेद 370 हटता है तो उसका राजनीतिक लाभ मोदी को मिलता है, यदि कोई विवाद उत्पन्न होता है तो उसका उत्तर भी मोदी को देना पड़ता है।लोकतंत्र में नेतृत्व की यही कसौटी होती है,सत्ता के साथ उत्तरदायित्व भी स्वीकार करना।यहां प्रश्न मोदी बनाम मनमोहन सिंह का नहीं है। प्रश्न यह है कि भारत को किस प्रकार का शासन चाहिए? मुखौटे वाला शासन या उत्तरदायी नेतृत्व वाला शासन?कौटिल्य का उत्तर स्पष्ट है। राज्य में शक्ति का केंद्र छिपा हुआ नहीं होना चाहिए। जनता को पता होना चाहिए कि निर्णय कौन ले रहा है और उसके परिणामों के लिए उत्तरदायी कौन है। यदि सत्ता पर्दे के पीछे बैठी हो और मंच पर कोई दूसरा व्यक्ति खड़ा हो, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रतिनिधित्व से अभिनय में बदल जाता है।

आज कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं है। उसकी सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना अतीत है। नटवर सिंह जैसे लोग जब बोलते हैं तो वे विपक्ष की आलोचना नहीं करते, वे इतिहास की फाइलें खोल देते हैं। और इतिहास की फाइलें बंद करना किसी राजनीतिक दल के बस में नहीं होता।भारत की जनता अब नेतृत्व में स्पष्टता चाहती है। वह यह जानना चाहती है कि संकट आए तो निर्णय कौन लेगा, सफलता मिले तो श्रेय किसे मिलेगा और विफलता हो तो जवाबदेह कौन होगा?कौटिल्य की दृष्टि में राज्य का प्रथम धर्म उत्तरदायित्व है। जहां उत्तरदायित्व नहीं, वहां सत्ता केवल आभूषण बन जाती है। और जहां सत्ता आभूषण बन जाए, वहां राष्ट्र की ऊर्जा क्षीण होने लगती है।

नटवर सिंह का बयान इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसमें मोदी की प्रशंसा है। वह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने भारतीय राजनीति के सामने एक पुराना प्रश्न फिर खड़ा कर दिया है,क्या लोकतंत्र में जनता को वास्तविक नेतृत्व मिला था, या केवल उसका मुखौटा दिखाया गया था? इसका  उत्तर  जनता  और  इतिहास  का  विद्यार्थी  बार  बार  खोजते  और  उठाते  भी  रहेंगे.!

यही प्रश्न आने वाले वर्षों में भी भारतीय राजनीति की बहस का केंद्र बना रहेगा। और इतिहास, अंततः, मुखौटों को नहीं, नेतृत्व को याद रखता है।

राजेन्द्र  नाथ  तिवारी 


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