"जब सत्ता चेतावनियाँ सुनना बंद कर दे, तब इतिहास टाइटेनिक की तरह दोहराया जाता है।" - कौटिल्य का भारत

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सोमवार, 15 जून 2026

"जब सत्ता चेतावनियाँ सुनना बंद कर दे, तब इतिहास टाइटेनिक की तरह दोहराया जाता है।"


कौटिल्य दृष्टि : टीएमसी का टाइटेनिक या उसका सत्ता का अभिशप्त जहाज़ क्यों डूबा?




टाइटेनिक इसलिए नहीं डूबा कि वह बड़ा जहाज था। वह इसलिए डूबा क्योंकि उसके निर्माताओं ने स्वयं को प्रकृति से बड़ा समझ लिया था। राजनीति में भी पतन का कारण विपक्ष नहीं होता, बल्कि वह क्षण होता है जब सत्ता स्वयं को जनता से ऊपर समझने लगती है।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का संकट केवल चुनावी चुनौती नहीं थी । यह उस राजनीतिक मॉडल का संकट है जो एक समय परिवर्तन के नाम पर पैदा हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे स्वयं व्यवस्था बन गया। कौटिल्य कहते हैं कि जब राज्य और शासक में अंतर समाप्त हो जाता है, तब प्रजा राज्य को नहीं, व्यक्ति को देखना शुरू कर देती है। यही किसी भी सत्ता के पतन की प्रस्तावना होती है। टीएमसी की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं थी। भाजपा तो केवल उस असंतोष का राजनीतिक माध्यम थी  जो वर्षों से समाज में जमा होता रहा। इतिहास गवाह है कि कोई भी साम्राज्य बाहरी आक्रमण से उतना नहीं टूटा जितना आंतरिक क्षरण से टूटा। मुगल साम्राज्य, सोवियत संघ और कांग्रेस की दशकों पुरानी राजनीतिक पकड़—सभी का पतन भीतर से शुरू हुआ था। कौटिल्य के अनुसार राज्य की सबसे बड़ी शक्ति सेना या धन नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। जब जनता को लगने लगे कि सत्ता जवाबदेह नहीं रही, संस्थाएँ निष्पक्ष नहीं रहीं और नेतृत्व आलोचना सुनने को तैयार नहीं है, तब पतन का हिमखंड सामने आ चुका होता है। जहाज तब भी चलता दिखाई देता है, लेकिन उसकी दिशा मृत्यु की ओर होती है।

टाइटेनिक की त्रासदी यह नहीं थी कि वह हिमखंड से टकराया। त्रासदी यह थी कि चेतावनियाँ पहले ही मिल चुकी थीं। राजनीति में भी संदेश पहले आते हैं—पंचायत चुनावों की हिंसा, भ्रष्टाचार के आरोप, संगठन के भीतर असंतोष, युवाओं की बेचैनी और बदलता जनमत। यदि सत्ता इन्हें विरोधियों का प्रचार समझकर नकार दे तो वही चेतावनियाँ अंततः हिमखंड बन जाती हैं।कौटिल्य का एक कठोर सिद्धांत है—"प्रजा का भय राजा के पतन का प्रारंभ है और प्रजा का क्रोध उसके अंत का संकेत।" किसी भी लोकतंत्र में जनता अंततः अंतिम निर्णायक होती है। वह देर से निर्णय देती है, लेकिन उसका निर्णय अंतिम होता है।इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि टीएमसी टाइटेनिक    थी  या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या टीएमसी उन संकेतों को पढ़ रही. थीं  जिन्हें इतिहास बार-बार दोहराता रहा,क्योंकि सत्ता का समुद्र निर्मम होता है। वहाँ कल का अजेय जहाज आज का मलबा बन सकता है।टाइटेनिक समुद्र में डूबा था, लेकिन राजनीतिक टाइटेनिक जनविश्वास के समुद्र में डूबते हैं। और जब जनता विश्वास वापस ले लेती है, तब सबसे शक्तिशाली दल भी केवल इतिहास की एक केस स्टडी बनकर रह जाता है,ममता  का  अहंकार  और  उनकी     टीमएमसी  इसी  हादसे  का  परीणाम  है!

"सत्ता का सबसे बड़ा शत्रु विपक्ष नहीं, बल्कि वह अहंकार है जो सत्ता को यह विश्वास दिला देता है कि जनता के बिना भी उसका अस्तित्व सुरक्षित है। जिस दिन शासक यह भूल जाता है कि सिंहासन जनता की देन है, उसी दिन उसके टाइटेनिक की यात्रा डूबने की दिशा में शुरू हो जाती है।"

राजेन्द्र नाथ  तिवारी ,272001

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