इसलिए प्रश्न केवल इतना नहीं कि "आईएएस की वर्दी क्यों नहीं?"प्रश्न इससे कहीं बड़ा है—क्या भारत का लोकतंत्र अपनी सबसे शक्तिशाली प्रशासनिक व्यवस्था को जनता के सामने स्पष्ट रूप से पहचानने योग्य बनाने का साहस करेगा, या फिर अदृश्य सत्ता की यह परंपरा यूँ ही चलती रहेगी?
बस्ती, वशिष्ठनगर,राजेंद्र नाथ तिवारी ,272001
भारत का लोकतंत्र एक अद्भुत विरोधाभास पर खड़ा है। जिस देश में एक साधारण चपरासी से लेकर सेना के जनरल तक की पहचान उसके पद और वेशभूषा से होती है, उसी देश में जिले, मंडल, राज्य और राष्ट्र के प्रशासनिक ढांचे को संचालित करने वाले सबसे शक्तिशाली अधिकारियों की कोई सार्वजनिक पहचान नहीं है। एक सिपाही वर्दी में दिखाई देता है, एक सैनिक वर्दी में दिखाई देता है, एक न्यायाधीश अपने विशिष्ट परिधान में दिखाई देता है, परंतु जिलाधिकारी, आयुक्त, सचिव और मुख्य सचिव जैसे अधिकारी जनता के बीच भीड़ में सामान्य व्यक्ति की तरह दिखाई देते हैं। प्रश्न यह नहीं कि वे क्या पहनते हैं; प्रश्न यह है कि वे जनता के प्रति अपनी प्रत्यक्ष पहचान से मुक्त क्यों हैं?
लोकतंत्र का पहला सिद्धांत है—अधिकार के साथ पहचान और पहचान के साथ जवाबदेही। किंतु भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकार तो अपार हैं, पर पहचान धुंधली है। आदेश देने वाला कौन है, निर्णय लेने वाला कौन है, उत्तरदायी कौन है—यह आम नागरिक के लिए अक्सर स्पष्ट नहीं होता।यह कैसी व्यवस्था है जिसमें एक ट्रैफिक कांस्टेबल की पहचान तत्काल हो जाती है, पर जिले के सर्वोच्च कार्यपालिका अधिकारी की नहीं?
कहा जाता है कि आईएएस "सिविल सेवा" है, इसलिए उसे वर्दी की आवश्यकता नहीं। परंतु यह तर्क अधूरा है। सिविल सेवा का अर्थ नागरिकों की सेवा है, नागरिकों से दूरी नहीं। यदि सेवा का दायित्व सार्वजनिक है तो उसकी पहचान भी सार्वजनिक होनी चाहिए।वास्तव में यह बहस कपड़ों की नहीं, शासन के चरित्र की है। वर्दी केवल वस्त्र नहीं होती; वह उत्तरदायित्व की चलती-फिरती घोषणा होती है। वह व्यक्ति को बताती है कि वह स्वयं नहीं, एक संस्था का प्रतिनिधि है। वह नागरिक को बताती है कि आवश्यकता पड़ने पर वह किससे प्रश्न पूछ सकता है।
आज भारत में प्रशासन का एक बड़ा संकट यह है कि सत्ता दिखाई कम देती है और महसूस अधिक होती है। जनता आदेश सुनती है, नोटिस देखती है, कार्रवाई झेलती है, लेकिन निर्णयकर्ता का चेहरा और पहचान अक्सर उससे दूर रहती है।आचार्य कौटिल्य ने राजधर्म का आधार भय नहीं, उत्तरदायित्व बताया था। उन्होंने राजा को प्रजा के सामने उत्तरदायी माना था, अदृश्य नहीं। पर आधुनिक नौकरशाही ने स्वयं को ऐसी संरचना में ढाल लिया है जहाँ अधिकार का प्रदर्शन है, किंतु उत्तरदायित्व का प्रतीक दुर्लभ है।
प्रश्न उठता है—यदि पुलिस अपनी वर्दी से नहीं डरती, सेना अपनी वर्दी से नहीं डरती, न्यायपालिका अपनी पहचान से नहीं डरती, तो प्रशासनिक सेवा अपनी सार्वजनिक पहचान से क्यों संकोच करती है?क्या यह औपनिवेशिक मानसिकता का अवशेष है, जहाँ अधिकारी स्वयं को "शासक वर्ग" और जनता को "शासित वर्ग" मानता था?भारत स्वतंत्र हो गया, संविधान बन गया, लोकतंत्र स्थापित हो गया; पर क्या नौकरशाही का मानस पूरी तरह लोकतांत्रिक हुआ?
आज आवश्यकता सैन्य वर्दी की नहीं है। आवश्यकता है ऐसी प्रशासनिक पहचान की जो यह घोषित करे कि यह अधिकारी जनता के प्रति उत्तरदायी है, जनता से ऊपर नहीं। एक राष्ट्रीय बैज, एक विशिष्ट ड्रेस कोड, एक औपचारिक प्रशासनिक परिधान—कुछ भी हो सकता है। पर पहचान होनी चाहिए।क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब सत्ता शक्तिशाली हो; सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब सत्ता अदृश्य हो।और जब सत्ता अदृश्य हो जाती है, तब जवाबदेही भी धीरे-धीरे अदृश्य होने लगती है।
इसलिए प्रश्न केवल इतना नहीं कि "आईएएस की वर्दी क्यों नहीं?"प्रश्न इससे कहीं बड़ा है—क्या भारत का लोकतंत्र अपनी सबसे शक्तिशाली प्रशासनिक व्यवस्था को जनता के सामने स्पष्ट रूप से पहचानने योग्य बनाने का साहस करेगा, या फिर अदृश्य सत्ता की यह परंपरा यूँ ही चलती रहेगी?

अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करते हुए अपने प्रकाश डाला है,, बहुत ही सुन्दर और सराहनीय पहल आदरणीय श्री मान जी,, ऐसे ही समसामयिक घटनाचक्र/घटनाक्रम में प्रकाश डालते हुए मार्गदर्शन प्रदान करते रहें।। कोटिश: आभार।।
जवाब देंहटाएंअत्यंत महत्वपूर्ण एवं ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करते हुए अपने प्रकाश डाला है,, बहुत ही सुन्दर और सराहनीय पहल आदरणीय श्री मान जी,, ऐसे ही समसामयिक घटनाचक्र/घटनाक्रम में प्रकाश डालते हुए मार्गदर्शन प्रदान करते रहें।। कोटिश: आभार।।जवाब दें
जवाब देंहटाएंअत्यंत महत्वपूर्ण एवं ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करते हुए अपने प्रकाश डाला है,, बहुत ही सुन्दर और सराहनीय पहल आदरणीय श्री मान जी,, ऐसे ही समसामयिक घटनाचक्र/घटनाक्रम में प्रकाश डालते हुए मार्गदर्शन प्रदान करते रहें।। कोटिश: आभार।।जवाब दें।।
जवाब देंहटाएंआचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल।।