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बुधवार, 10 जून 2026

राम मंदिर,"करोड़ों श्रद्धालुओं का प्रश्न: सच आखिर छिपाया क्यों जा रहा है?"


राम के नाम पर कोई प्रश्न अछूत नहीं

बस्ती,वशिष्ठनगर,272001


अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। यह किसी व्यक्ति, समूह या संस्था की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की श्रद्धा का प्रतीक है। इसलिए मंदिर की व्यवस्था, दान राशि, नियुक्तियों और प्रशासनिक निर्णयों पर उठने वाले प्रश्नों को दबाने का प्रयास स्वयं आस्था के साथ अन्याय होगा।वर्षों तक देश ने संघर्ष किया, लाखों लोगों ने योगदान दिया और करोड़ों श्रद्धालुओं ने विश्वास के साथ अपना अंशदान समर्पित किया। ऐसे में यदि मंदिर प्रबंधन को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो उनका उत्तर भावनात्मक अपीलों से नहीं, बल्कि तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। जो लोग यह मानते हैं कि राम मंदिर से जुड़े किसी भी विषय पर प्रश्न पूछना अपराध है, वे वस्तुतः राम की नहीं, व्यक्तियों की प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

आस्था का सबसे बड़ा शत्रु प्रश्न नहीं, बल्कि अपारदर्शिता होती है। यदि सब कुछ सही है तो जांच से डर कैसा? यदि व्यवस्था निष्कलंक है तो स्वतंत्र ऑडिट और सार्वजनिक समीक्षा से परहेज क्यों? और यदि कहीं कोई चूक हुई है तो उसे छिपाने का प्रयास किसके हित में किया जा रहा है?राम भारतीय संस्कृति में मर्यादा के प्रतीक हैं। मर्यादा का अर्थ है—सत्ता हो या संस्था, कोई भी उत्तरदायित्व से ऊपर नहीं। मंदिर प्रबंधन भी इस सिद्धांत का अपवाद नहीं हो सकता। श्रद्धालुओं का अधिकार है कि उन्हें बताया जाए कि दान की राशि का उपयोग किस प्रकार हो रहा है, निर्णय कैसे लिए जा रहे हैं और निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा यदि राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में उठे प्रश्नों को राजनीतिक चश्मे से देखा जाए। मुद्दा किसी दल, संगठन या व्यक्ति का नहीं है। मुद्दा यह है कि राम के नाम पर स्थापित व्यवस्था राम के आदर्शों के अनुरूप है या नहीं।देश को स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि राम मंदिर में न तो किसी प्रकार की गोपनीयता का संरक्षण होगा और न ही किसी पदाधिकारी को केवल पद के कारण प्रश्नों से छूट मिलेगी। जहां करोड़ों लोगों की श्रद्धा जुड़ी हो, वहां जवाबदेही भी करोड़ों लोगों के प्रति होनी चाहिए।

राम मंदिर केवल भव्यता का प्रतीक नहीं, बल्कि नैतिकता का भी प्रतीक बनना चाहिए। यदि व्यवस्था पर प्रश्न उठे हैं तो उनका समाधान कठोरतम पारदर्शिता से हो। यदि कोई दोषी है तो उसे दंड मिले। यदि आरोप असत्य हैं तो उन्हें भी प्रमाण सहित खारिज किया जाए। किंतु किसी भी स्थिति में सत्य पर पर्दा डालने का प्रयास स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।राम के नाम पर बना मंदिर तभी वास्तव में राष्ट्रमंदिर कहलाएगा, जब वहां आस्था के साथ-साथ जवाबदेही भी उतनी ही पवित्र मानी जाएगी।

— राजेन्द्र नाथ तिवारी

अध्यक्ष, कौटिल्य फाउंडेशन

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