"आस्था पर नहीं, व्यवस्था पर प्रश्न: क्या अयोध्या में जवाबदेही का नया अध्याय शुरू होगा
बस्ती ,272001
अयोध्या केवल एक नगर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की सदियों पुरानी आस्था का केंद्र है। इसलिए राम मंदिर से जुड़ा प्रत्येक निर्णय राष्ट्रीय महत्व का विषय बन जाता है। यदि मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, नियुक्तियों, भूमि खरीद, वित्तीय प्रबंधन अथवा प्रशासनिक निर्णयों को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं, तो उनका समाधान तथ्यों, पारदर्शिता और जवाबदेही के माध्यम से होना चाहिए।
यदि भविष्य में ट्रस्ट के भीतर बड़े बदलाव, ट्रस्टियों की भूमिका की समीक्षा या नेतृत्व परिवर्तन जैसे कदम उठाए जाते हैं, तो उसे किसी व्यक्ति की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण का अवसर होगा जिसमें राम मंदिर का संचालन विवादों से ऊपर और जनविश्वास के अनुरूप दिखाई दे।
करोड़ों श्रद्धालुओं ने राम मंदिर के निर्माण में अपना योगदान दिया है। इसलिए उनका यह अधिकार भी है कि मंदिर से जुड़े सभी आर्थिक और प्रशासनिक निर्णयों का स्पष्ट और विश्वसनीय विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो। आस्था अंधकार में नहीं, विश्वास के प्रकाश में फलती-फूलती है। आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की है जहाँ नियमित ऑडिट, सार्वजनिक रिपोर्ट, पारदर्शी नियुक्तियाँ और उत्तरदायी प्रशासन सुनिश्चित हो। राम मंदिर की प्रतिष्ठा किसी एक ट्रस्टी, पदाधिकारी या प्रबंधक से कहीं बड़ी है। व्यक्ति आते-जाते हैं, लेकिन भगवान राम और उनकी मर्यादा शाश्वत हैं।
यदि पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, तो इससे न केवल अयोध्या बल्कि देश के सभी बड़े धार्मिक संस्थानों के लिए एक नया मानक स्थापित होगा। श्रद्धालु दान इसलिए देते हैं कि उनका योगदान धर्म और समाज के हित में लगे; इसलिए हर प्रश्न का उत्तर भी उतनी ही स्पष्टता से मिलना चाहिए।
"राम मंदिर की सबसे बड़ी सुरक्षा ऊँची दीवारें नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी व्यवस्था है जिस पर हर श्रद्धालु बिना किसी संदेह के विश्वास कर सके।"
राजेंद्र नाथ तिवारी
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