"‘आवश्यक कार्रवाई करें’ : भारतीय नौकरशाही का सबसे बड़ा छलावा"
"तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आँकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।-अदम गोंडवी
कौटिल्य का कौटिल्य उवाच, 272001
देश में लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि समस्याएँ हैं; विडंबना यह है कि समस्याओं के समाधान का पूरा सरकारी तंत्र अक्सर उनके निस्तारण का केवल अभिनय करता दिखाई देता है। शासन से लेकर तहसील तक, मंत्रालय से लेकर ब्लॉक तक, शिकायतों और जनसमस्याओं का विशाल पहाड़ खड़ा है, लेकिन उसके समाधान की जगह फाइलों पर लिखे कुछ घिसे-पिटे वाक्य राज कर रहे हैं— "आवश्यक कार्रवाई करें", "नियमानुसार निस्तारण करें", "आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित"।यही वाक्य आज की नौकरशाही का कवच भी हैं और हथियार भी। ऊपर बैठे अधिकारी को लगता है कि उसने आदेश दे दिया, नीचे बैठे कर्मचारी को लगता है कि उसने रिपोर्ट भेज दी, और जनता को लगता है कि शायद कहीं कोई काम हो रहा होगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि हजारों शिकायतें फाइलों के कब्रिस्तान में दफन हो जाती हैं।
आज स्थिति यह है कि किसी नागरिक की शिकायत का मूल्य उसके तथ्यों से नहीं, बल्कि उससे जुड़ी राजनीतिक, प्रशासनिक या सामाजिक शक्ति से तय होता दिखाई देता है। साधारण नागरिक महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाता है, पोर्टलों पर शिकायत दर्ज करता है, डाक से पत्र भेजता है, जनसुनवाई में गुहार लगाता है, लेकिन अंत में उसे वही घिसा-पिटा उत्तर मिलता है— "मामले का निस्तारण कर दिया गया है।"निस्तारण कहाँ हुआ? किस स्तर पर हुआ? किस अधिकारी ने जांच की? क्या कार्रवाई हुई? दोषी कौन पाया गया? दंड किसे मिला? इन प्रश्नों का उत्तर अधिकांश मामलों में कहीं नहीं मिलता।
दरअसल, शिकायत निवारण की व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब समाधान का नहीं, सांख्यिकी का खेल बन चुका है। पोर्टल पर शिकायतें कम दिखनी चाहिए, लंबित प्रकरणों का प्रतिशत घटाना चाहिए, रिपोर्ट समय पर भेजनी चाहिए। समस्या हल हो या न हो, आंकड़े चमकने चाहिए। यही कारण है कि कई बार शिकायतकर्ता को उसकी समस्या के समाधान से पहले निस्तारण का संदेश प्राप्त हो जाता है।सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस देश में नागरिकों को संविधान ने अधिकार दिए हैं, वहीं उन्हें अपने अधिकारों के लिए बार-बार उसी व्यवस्था के सामने याचक बनना पड़ता है, जिसे उनकी सेवा के लिए बनाया गया था। जनता कर देती है, वेतन देती है, व्यवस्था चलाती है, लेकिन जब न्याय मांगती है तो उसे कागजी जवाबों की दीवार से टकराना पड़ता है।
आदम गोंडवी ने वर्षों पहले जिस व्यवस्था पर चोट की थी, वह आज और भी प्रासंगिक लगती है। फाइलों में विकास है, रिपोर्टों में प्रगति है, प्रस्तुतियों में उपलब्धियाँ हैं, लेकिन गाँव की टूटी सड़क, अस्पताल की बदहाली, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और भ्रष्टाचार की जड़ें कुछ और ही कहानी कहती हैं।प्रशासन का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी फाइलें बंद कीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसने कितनी समस्याएँ समाप्त कीं। दुर्भाग्य यह है कि आज कई विभागों में फाइल बंद करना ही समस्या का समाधान मान लिया गया है।
यदि शिकायतों के निस्तारण का अर्थ केवल पत्र लिखना, रिपोर्ट भेजना और पोर्टल अपडेट करना रह गया है, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। जनता को उत्तर नहीं, परिणाम चाहिए; टिप्पणी नहीं, कार्रवाई चाहिए; आश्वासन नहीं, जवाबदेही चाहिए।अन्यथा आने वाले समय में इतिहास यही लिखेगा कि भारत की नौकरशाही ने समस्याओं से लड़ने की बजाय उन्हें फाइलों में छिपाने की कला सबसे अधिक विकसित की थी।

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