दहेज का दानव और समाज का मौन: आखिर कब तक जलती रहेंगी बेटियाँ?
जौनपुर की रेनू पटेल अब इस दुनिया में नहीं है। अदालत ने पति को 10 वर्ष की सजा सुनाकर न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम अवश्य उठाया है, किंतु यह प्रश्न आज भी समाज के सामने खड़ा है कि क्या किसी बेटी की जान की कीमत केवल दस वर्ष की कैद और कुछ हजार रुपये का अर्थदंड हो सकती है?
रेनू की कहानी किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सामाजिक विकृति का भयावह चेहरा है जिसे हम दहेज प्रथा के नाम से जानते हैं। विडंबना यह है कि इक्कीसवीं सदी में चंद्रयान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चर्चा करने वाला भारत आज भी दहेज की काली सुरंग से बाहर नहीं निकल पाया है। विवाह, जो दो परिवारों के पवित्र मिलन का संस्कार माना जाता है, अनेक स्थानों पर खुलेआम आर्थिक सौदे में बदल चुका है।
सबसे बड़ा अपराध केवल वह पति नहीं है जिसे अदालत ने दोषी ठहराया है। उतने ही दोषी वे लोग भी हैं जो दहेज मांगने वालों को सामाजिक प्रतिष्ठा देते हैं, वे रिश्तेदार जो ऐसी मांगों को "परंपरा" कहकर उचित ठहराते हैं, और वे पड़ोसी जो सब कुछ देखते हुए भी चुप रहते हैं। दहेज की हर मांग हत्या की पूर्वपीठिका होती है। जो व्यक्ति विवाह के समय धन की मांग करता है, वह वस्तुतः मानवता का व्यापार कर रहा होता है।
आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार की है। जिस परिवार पर दहेज मांगने का आरोप सिद्ध हो जाए, उसे समाज में सम्मान नहीं, तिरस्कार मिलना चाहिए। पंचायतों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक मंचों को स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए कि दहेज लेने-देने वालों का सार्वजनिक विरोध होगा। जब तक सामाजिक शर्म पैदा नहीं होगी, तब तक कानूनी भय भी सीमित प्रभाव ही डालेगा।
यह भी चिंताजनक है कि अनेक मामलों में बेटियाँ अत्याचार सहती रहती हैं क्योंकि उन्हें मायके पर बोझ बनने का डर दिखाया जाता है। समाज को बेटियों को यह विश्वास देना होगा कि उनका जीवन किसी भी रकम, रिश्ते या सामाजिक प्रतिष्ठा से अधिक मूल्यवान है।
रेनू की मृत्यु केवल एक आपराधिक घटना नहीं है; यह भारतीय समाज के माथे पर लगा वह कलंक है जो बताता है कि हम अभी भी बेटी को समान मनुष्य के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए हैं। अदालत ने अपना काम कर दिया, अब समाज को अपना दायित्व निभाना होगा।
याद रखिए— दहेज कभी उपहार नहीं होता, वह हत्या की पहली किश्त होता है। और जो समाज इस पहली किश्त को स्वीकार कर लेता है, वह अंततः किसी न किसी रेनू की अर्थी का सहभागी बन जाता है।
जौनपुर की रेनू पटेल अब इस दुनिया में नहीं है। अदालत ने पति को 10 वर्ष की सजा सुनाकर न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम अवश्य उठाया है, किंतु यह प्रश्न आज भी समाज के सामने खड़ा है कि क्या किसी बेटी की जान की कीमत केवल दस वर्ष की कैद और कुछ हजार रुपये का अर्थदंड हो सकती है?
रेनू की कहानी किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सामाजिक विकृति का भयावह चेहरा है जिसे हम दहेज प्रथा के नाम से जानते हैं। विडंबना यह है कि इक्कीसवीं सदी में चंद्रयान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चर्चा करने वाला भारत आज भी दहेज की काली सुरंग से बाहर नहीं निकल पाया है। विवाह, जो दो परिवारों के पवित्र मिलन का संस्कार माना जाता है, अनेक स्थानों पर खुलेआम आर्थिक सौदे में बदल चुका है।
सबसे बड़ा अपराध केवल वह पति नहीं है जिसे अदालत ने दोषी ठहराया है। उतने ही दोषी वे लोग भी हैं जो दहेज मांगने वालों को सामाजिक प्रतिष्ठा देते हैं, वे रिश्तेदार जो ऐसी मांगों को "परंपरा" कहकर उचित ठहराते हैं, और वे पड़ोसी जो सब कुछ देखते हुए भी चुप रहते हैं। दहेज की हर मांग हत्या की पूर्वपीठिका होती है। जो व्यक्ति विवाह के समय धन की मांग करता है, वह वस्तुतः मानवता का व्यापार कर रहा होता है।
आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार की है। जिस परिवार पर दहेज मांगने का आरोप सिद्ध हो जाए, उसे समाज में सम्मान नहीं, तिरस्कार मिलना चाहिए। पंचायतों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक मंचों को स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए कि दहेज लेने-देने वालों का सार्वजनिक विरोध होगा। जब तक सामाजिक शर्म पैदा नहीं होगी, तब तक कानूनी भय भी सीमित प्रभाव ही डालेगा।
यह भी चिंताजनक है कि अनेक मामलों में बेटियाँ अत्याचार सहती रहती हैं क्योंकि उन्हें मायके पर बोझ बनने का डर दिखाया जाता है। समाज को बेटियों को यह विश्वास देना होगा कि उनका जीवन किसी भी रकम, रिश्ते या सामाजिक प्रतिष्ठा से अधिक मूल्यवान है।
रेनू की मृत्यु केवल एक आपराधिक घटना नहीं है; यह भारतीय समाज के माथे पर लगा वह कलंक है जो बताता है कि हम अभी भी बेटी को समान मनुष्य के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए हैं। अदालत ने अपना काम कर दिया, अब समाज को अपना दायित्व निभाना होगा।
याद रखिए— दहेज कभी उपहार नहीं होता, वह हत्या की पहली किश्त होता है। और जो समाज इस पहली किश्त को स्वीकार कर लेता है, वह अंततः किसी न किसी रेनू की अर्थी का सहभागी बन जाता है।
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