एक अधूरी प्रतीक्षा का अंत: गोर्रा नदी से मिली लापता स्वास्थ्यकर्मी की दर्दनाक कहानी रुद्रपुर/बस्ती। कभी-कभी एक फोन कॉल का इंतजार पूरे परिवार की दुनिया बदल देता है। चार जून के बाद जब दीपक पांडेय का फोन बंद हुआ, तो परिजनों ने सोचा होगा कि शायद किसी व्यस्तता या तकनीकी कारण से संपर्क नहीं हो पा रहा है। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि जिस बेटे, पति और भाई की आवाज सुनने की उम्मीद में परिवार दिन-रात बेचैन था, उसकी पहचान उन्हें पोस्टमार्टम हाउस में करनी पड़ेगी। बस्ती जनपद के कलवारी थाना क्षेत्र स्थित सिकंदरपुर गांव निवासी दीपक पांडेय, जो गोरखपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नदुआ में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) के पद पर कार्यरत थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे। गोर्रा नदी में मिले एक अज्ञात शव की पहचान जब दीपक के रूप में हुई, तो परिवार की बची-खुची उम्मीदें भी टूट गईं। दीपक केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं थे, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा का दायित्व निभाने वाले एक समर्पित स्वास्थ्यकर्मी थे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कार्यरत यह युवा अधिकारी अपने पीछे अनगिनत प्रश्न और अथाह पीड़ा छोड़ गया है। चार जून से परिवार उनसे संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। मोबाइल फोन बंद होने से चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता और हर शाम निराशा छोड़ जाती। परिजन रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से जानकारी जुटाने में लगे रहे। इसी बीच गोर्रा नदी से एक अज्ञात युवक का शव मिलने की सूचना आई। सूचना मिलते ही परिजन आशंका और उम्मीद के बीच रुद्रपुर पहुंचे, लेकिन वहां जो सच सामने आया, उसने पूरे परिवार को शोक के सागर में डुबो दिया। दीपक की पत्नी स्वयं स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्स हैं। जिस परिवार ने लोगों के जीवन बचाने को अपना पेशा बनाया, आज वही परिवार अपने सबसे प्रिय सदस्य को खोने के दर्द से गुजर रहा है। गांव में मातम पसरा है। हर चेहरा गमगीन है और हर आंख नम। मृत्यु का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह एहसास करा दिया है कि जीवन कितना अनिश्चित है। कल तक जो व्यक्ति समाज की सेवा में जुटा था, आज उसकी स्मृतियां ही शेष हैं। दीपक पांडेय की असमय मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है; यह एक परिवार के सपनों का बिखरना, एक पत्नी का सहारा छिनना, माता-पिता की उम्मीदों का टूटना और समाज के एक कर्मठ सेवक का मौन हो जाना है। कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने व्यवहार और सेवा से बड़े होते हैं। दीपक पांडेय उन्हीं लोगों में से एक थे। उनकी स्मृति सदैव जीवित रहेगी, जबकि उनका जाना उन सभी लोगों के हृदय में एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे शायद समय भी पूरी तरह भर नहीं पाएगा। - कौटिल्य का भारत

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मंगलवार, 9 जून 2026

एक अधूरी प्रतीक्षा का अंत: गोर्रा नदी से मिली लापता स्वास्थ्यकर्मी की दर्दनाक कहानी रुद्रपुर/बस्ती। कभी-कभी एक फोन कॉल का इंतजार पूरे परिवार की दुनिया बदल देता है। चार जून के बाद जब दीपक पांडेय का फोन बंद हुआ, तो परिजनों ने सोचा होगा कि शायद किसी व्यस्तता या तकनीकी कारण से संपर्क नहीं हो पा रहा है। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि जिस बेटे, पति और भाई की आवाज सुनने की उम्मीद में परिवार दिन-रात बेचैन था, उसकी पहचान उन्हें पोस्टमार्टम हाउस में करनी पड़ेगी। बस्ती जनपद के कलवारी थाना क्षेत्र स्थित सिकंदरपुर गांव निवासी दीपक पांडेय, जो गोरखपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नदुआ में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) के पद पर कार्यरत थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे। गोर्रा नदी में मिले एक अज्ञात शव की पहचान जब दीपक के रूप में हुई, तो परिवार की बची-खुची उम्मीदें भी टूट गईं। दीपक केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं थे, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा का दायित्व निभाने वाले एक समर्पित स्वास्थ्यकर्मी थे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कार्यरत यह युवा अधिकारी अपने पीछे अनगिनत प्रश्न और अथाह पीड़ा छोड़ गया है। चार जून से परिवार उनसे संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। मोबाइल फोन बंद होने से चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता और हर शाम निराशा छोड़ जाती। परिजन रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से जानकारी जुटाने में लगे रहे। इसी बीच गोर्रा नदी से एक अज्ञात युवक का शव मिलने की सूचना आई। सूचना मिलते ही परिजन आशंका और उम्मीद के बीच रुद्रपुर पहुंचे, लेकिन वहां जो सच सामने आया, उसने पूरे परिवार को शोक के सागर में डुबो दिया। दीपक की पत्नी स्वयं स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्स हैं। जिस परिवार ने लोगों के जीवन बचाने को अपना पेशा बनाया, आज वही परिवार अपने सबसे प्रिय सदस्य को खोने के दर्द से गुजर रहा है। गांव में मातम पसरा है। हर चेहरा गमगीन है और हर आंख नम। मृत्यु का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह एहसास करा दिया है कि जीवन कितना अनिश्चित है। कल तक जो व्यक्ति समाज की सेवा में जुटा था, आज उसकी स्मृतियां ही शेष हैं। दीपक पांडेय की असमय मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है; यह एक परिवार के सपनों का बिखरना, एक पत्नी का सहारा छिनना, माता-पिता की उम्मीदों का टूटना और समाज के एक कर्मठ सेवक का मौन हो जाना है। कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने व्यवहार और सेवा से बड़े होते हैं। दीपक पांडेय उन्हीं लोगों में से एक थे। उनकी स्मृति सदैव जीवित रहेगी, जबकि उनका जाना उन सभी लोगों के हृदय में एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे शायद समय भी पूरी तरह भर नहीं पाएगा।

 एक अधूरी प्रतीक्षा का अंत: गोर्रा नदी से मिली लापता  बस्ती निवासी स्वास्थ्य कर्मी की दर्दनाक कहानी


रुद्रपुर/बस्ती। कभी-कभी एक फोन कॉल का इंतजार पूरे परिवार की दुनिया बदल देता है। चार जून के बाद जब दीपक पांडेय का फोन बंद हुआ, तो परिजनों ने सोचा होगा कि शायद किसी व्यस्तता या तकनीकी कारण से संपर्क नहीं हो पा रहा है। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि जिस बेटे, पति और भाई की आवाज सुनने की उम्मीद में परिवार दिन-रात बेचैन था, उसकी पहचान उन्हें पोस्टमार्टम हाउस में करनी पड़ेगी।

बस्ती जनपद के कलवारी थाना क्षेत्र स्थित सिकंदरपुर गांव निवासी दीपक पांडेय, जो गोरखपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नदुआ में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) के पद पर कार्यरत थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे। गोर्रा नदी में मिले एक अज्ञात शव की पहचान जब दीपक के रूप में हुई, तो परिवार की बची-खुची उम्मीदें भी टूट गईं।

दीपक केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं थे, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा का दायित्व निभाने वाले एक समर्पित स्वास्थ्यकर्मी थे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कार्यरत यह युवा अधिकारी अपने पीछे अनगिनत प्रश्न और अथाह पीड़ा छोड़ गया है।

चार जून से परिवार उनसे संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। मोबाइल फोन बंद होने से चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता और हर शाम निराशा छोड़ जाती। परिजन रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से जानकारी जुटाने में लगे रहे। इसी बीच गोर्रा नदी से एक अज्ञात युवक का शव मिलने की सूचना आई। सूचना मिलते ही परिजन आशंका और उम्मीद के बीच रुद्रपुर पहुंचे, लेकिन वहां जो सच सामने आया, उसने पूरे परिवार को शोक के सागर में डुबो दिया।

दीपक की पत्नी स्वयं स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्स हैं। जिस परिवार ने लोगों के जीवन बचाने को अपना पेशा बनाया, आज वही परिवार अपने सबसे प्रिय सदस्य को खोने के दर्द से गुजर रहा है। गांव में मातम पसरा है। हर चेहरा गमगीन है और हर आंख नम।

मृत्यु का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह एहसास करा दिया है कि जीवन कितना अनिश्चित है। कल तक जो व्यक्ति समाज की सेवा में जुटा था, आज उसकी स्मृतियां ही शेष हैं।

दीपक पांडेय की असमय मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है; यह एक परिवार के सपनों का बिखरना, एक पत्नी का सहारा छिनना, माता-पिता की उम्मीदों का टूटना और समाज के एक कर्मठ सेवक का मौन हो जाना है।

कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने व्यवहार और सेवा से बड़े होते हैं। दीपक पांडेय उन्हीं लोगों में से एक थे। उनकी स्मृति सदैव जीवित रहेगी, जबकि उनका जाना उन सभी लोगों के हृदय में एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे शायद समय भी पूरी तरह भर नहीं पाएगा।कौटिल्य का भारत असमय गई अन्नत  की  यात्रा पर स्मृति शेष दीपक को श्रावंत नमन करता है।

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