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मंगलवार, 2 जून 2026

पचास पार शिक्षक और टीईटी का प्रश्न: क्या अनुभव की कोई कीमत नहीं?

 

पचास पार शिक्षक और टीईटी का प्रश्न: क्या अनुभव की कोई कीमत नहीं?

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भारत में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो रही है। जिन शिक्षकों ने 25 से 35 वर्ष तक विद्यालयों में सेवा दी, लाखों विद्यार्थियों को शिक्षित किया, समाज निर्माण में योगदान दिया, आज वही शिक्षक अपने जीवन के उत्तरार्ध में पुनः पात्रता परीक्षा की कसौटी पर खड़े किए जा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि टीईटी आवश्यक है या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या अनुभव, सेवा और उपलब्धियों का कोई मूल्य नहीं है?

शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। टीईटी इसी उद्देश्य से लागू की गई थी। परंतु जब 50 या 55 वर्ष की आयु पार कर चुके शिक्षक, जिन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षण में बिताया है, उनसे पुनः परीक्षा देने की अपेक्षा की जाती है, तब यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक न्याय का विषय बन जाता है।

देश को यह तय करना होगा कि शिक्षक की योग्यता का मापदंड केवल एक लिखित परीक्षा है या दशकों का अनुभव भी उसकी योग्यता का प्रमाण है। यदि अनुभव का कोई महत्व नहीं, तो सेवा पुस्तिका, वार्षिक मूल्यांकन और कार्यकाल की उपलब्धियों का औचित्य क्या है?

इस बहस का दूसरा पक्ष न्यायपालिका से जुड़ता है। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियाँ कॉलेजियम व्यवस्था के माध्यम से होती हैं। इस प्रणाली की स्वतंत्रता के पक्ष में अनेक तर्क हैं, किंतु इसकी पारदर्शिता पर भी लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। ऐसे में सामान्य नागरिक के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिन संस्थाओं की अपनी चयन प्रक्रिया सार्वजनिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा से नहीं गुजरती, क्या वे अन्य वर्गों के लिए कठोरतम मानकों की अपेक्षा करते समय नैतिक विमर्श से परे रह सकती हैं?

यह प्रश्न न्यायपालिका की गरिमा पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व पर है। लोकतंत्र में हर संस्था सम्माननीय है, किंतु कोई भी संस्था प्रश्नों से ऊपर नहीं हो सकती।

समाधान टकराव में नहीं है। यदि सरकार चाहे तो संसद में ऐसा विधायी समाधान ला सकती है, जिसमें दीर्घकालीन सेवा दे चुके शिक्षकों के लिए विशेष प्रावधान, प्रशिक्षण या वैकल्पिक मूल्यांकन की व्यवस्था हो। इससे शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहेगी और अनुभवी शिक्षकों की गरिमा भी सुरक्षित रहेगी।

राष्ट्र निर्माण में शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं होते; वे पीढ़ियों के निर्माता होते हैं। इसलिए नीति निर्माण करते समय कानून की भाषा के साथ न्याय की आत्मा को भी सुनना आवश्यक है। अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ यह प्रश्न अवश्य पूछेंगी कि जिसने जीवन भर बच्चों को पढ़ाया, उसे अपने अनुभव का प्रमाण देने के लिए अंततः परीक्षा कक्ष में क्यों भेजा गया ।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सामयिक एवं ज्वलंत मुद्दा है,, शिक्षकों के उपर सरासर अन्याय किया जा रहा है,, इससे शिक्षकों में असंतोष व्याप्त है,,हम ऐसे नीतिगत फैसले का विरोध करते हैं,,

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