यह विषय अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए व्यंग्य को किसी धर्म या समुदाय पर आक्षेप बनाने के बजाय सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं पर केंद्रित रखना अधिक प्रभावी होगा।
हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य
"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना"— यह पंक्ति भारत में शायद उतनी ही प्रसिद्ध है जितना तिरंगा। वर्षों से इसे सद्भाव का मंत्र मानकर दोहराया जाता रहा है। किंतु आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो लगता है कि यह पंक्ति एक आदर्श कम और एक प्रश्न अधिक बन गई है।
सुबह सोशल मीडिया खोलिए। वहाँ मानवता कम और पहचान की सेनाएँ अधिक दिखाई देंगी। कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है, कोई जाति के नाम पर, कोई भाषा के नाम पर और कोई विचारधारा के नाम पर। हर व्यक्ति शांति का दूत है, बशर्ते सामने वाला उसकी बात बिना प्रश्न किए मान ले।
आज का समाज बड़ा विचित्र है। लोग ईश्वर के लिए मरने को तैयार हैं, लेकिन ईश्वर की सबसे बड़ी रचना— मनुष्य— के साथ जीने को तैयार नहीं। मंदिरों में भीड़ है, मस्जिदों में भीड़ है, गुरुद्वारों में भीड़ है, गिरजाघरों में भीड़ है; यदि कहीं कमी है तो मनुष्य के हृदय में मनुष्य के लिए स्थान की।
राजनीति ने इस विडंबना को एक उद्योग का रूप दे दिया है। चुनाव आते ही नेता भाईचारे की बातें करते हैं, फिर वोटों की गणना शुरू होते ही समाज को टुकड़ों में बाँट देते हैं। कोई बहुसंख्यक का ठेकेदार बन जाता है, कोई अल्पसंख्यक का। कोई जाति का मसीहा बनता है, कोई क्षेत्र का। राष्ट्र पीछे छूट जाता है और पहचान आगे निकल जाती है।
विडंबना यह है कि जो लोग सबसे अधिक सहिष्णुता का भाषण देते हैं, वे आलोचना सुनते ही असहिष्णु हो जाते हैं। जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा उठाते हैं, वे अपनी असुविधा वाली अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित देखना चाहते हैं। जो लोग समानता की बात करते हैं, वे अपने-अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते।
आज मजहब केवल पूजा-पद्धति नहीं रह गया है; वह राजनीति का औजार, बाजार का उत्पाद और सोशल मीडिया का हथियार भी बन गया है। धर्मग्रंथों से अधिक लोग अब व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय के संदेशों पर विश्वास करने लगे हैं। सत्य की जगह वायरल पोस्ट ने ले ली है और तर्क की जगह उत्तेजना ने।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ किसी घटना के बाद लोग यह जानने में अधिक रुचि रखते हैं कि अपराधी कौन था नहीं, बल्कि उसका धर्म क्या था। पीड़ित का दर्द भी उसकी पहचान देखकर तय किया जाता है। न्याय भी कभी-कभी विचारधारा के चश्मे से देखा जाने लगता है।
भारत की आत्मा इससे भिन्न रही है। यह वह भूमि है जहाँ ऋषियों ने कहा— "वसुधैव कुटुम्बकम्"। जहाँ शास्त्रार्थ होते थे, शत्रुता नहीं। जहाँ विचारों का संघर्ष होता था, व्यक्तियों का विनाश नहीं। जहाँ विविधता को संकट नहीं, शक्ति माना गया।
आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि पुराने मूल्यों की पुनर्स्थापना की है। आवश्यकता यह समझने की है कि यदि धर्म हमें बेहतर मनुष्य नहीं बना रहा, तो हम धर्म का अर्थ ही नहीं समझ पाए हैं। यदि हमारी आस्था हमें दूसरों से घृणा करना सिखा रही है, तो समस्या आस्था में नहीं, उसकी हमारी व्याख्या में है।
सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि हर व्यक्ति शांति चाहता है, लेकिन अपनी शर्तों पर। हर व्यक्ति प्रेम चाहता है, लेकिन अपने समूह के लिए। हर व्यक्ति न्याय चाहता है, लेकिन पहले अपने पक्ष के लिए।
इतिहास गवाह है— सभ्यताएँ बाहरी आक्रमणों से कम, भीतर की नफरत से अधिक नष्ट हुई हैं। कोई भी राष्ट्र तब तक महान नहीं बन सकता, जब तक उसके नागरिक अपनी-अपनी पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि न मानें।
इसलिए आज प्रश्न यह नहीं है कि मजहब क्या सिखाता है। प्रश्न यह है कि उसके अनुयायी क्या सीखना चाहते हैं।
क्योंकि सच यह है कि ईश्वर ने कभी मनुष्यों के बीच दीवारें नहीं खड़ी कीं; दीवारें हमने खड़ी कीं। उसने धरती बनाई, हमने सीमाएँ बनाईं। उसने मानव बनाया, हमने पहचानें गढ़ीं। उसने प्रेम दिया, हमने घृणा का व्यापार शुरू कर दिया।
और फिर बड़े गर्व से कहते रहे—
"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना..."
शायद हमारे समय का सबसे तीखा व्यंग्य यही है कि यह पंक्ति जितनी बार बोली गई, उतनी बार उसका अर्थ भुला दिया गया।
सुबह सोशल मीडिया खोलिए। वहाँ मानवता कम और पहचान की सेनाएँ अधिक दिखाई देंगी। कोई धर्म के नाम पर लड़ रहा है, कोई जाति के नाम पर, कोई भाषा के नाम पर और कोई विचारधारा के नाम पर। हर व्यक्ति शांति का दूत है, बशर्ते सामने वाला उसकी बात बिना प्रश्न किए मान ले।
आज का समाज बड़ा विचित्र है। लोग ईश्वर के लिए मरने को तैयार हैं, लेकिन ईश्वर की सबसे बड़ी रचना— मनुष्य— के साथ जीने को तैयार नहीं। मंदिरों में भीड़ है, मस्जिदों में भीड़ है, गुरुद्वारों में भीड़ है, गिरजाघरों में भीड़ है; यदि कहीं कमी है तो मनुष्य के हृदय में मनुष्य के लिए स्थान की।
राजनीति ने इस विडंबना को एक उद्योग का रूप दे दिया है। चुनाव आते ही नेता भाईचारे की बातें करते हैं, फिर वोटों की गणना शुरू होते ही समाज को टुकड़ों में बाँट देते हैं। कोई बहुसंख्यक का ठेकेदार बन जाता है, कोई अल्पसंख्यक का। कोई जाति का मसीहा बनता है, कोई क्षेत्र का। राष्ट्र पीछे छूट जाता है और पहचान आगे निकल जाती है।
विडंबना यह है कि जो लोग सबसे अधिक सहिष्णुता का भाषण देते हैं, वे आलोचना सुनते ही असहिष्णु हो जाते हैं। जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा उठाते हैं, वे अपनी असुविधा वाली अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित देखना चाहते हैं। जो लोग समानता की बात करते हैं, वे अपने-अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते।
आज मजहब केवल पूजा-पद्धति नहीं रह गया है; वह राजनीति का औजार, बाजार का उत्पाद और सोशल मीडिया का हथियार भी बन गया है। धर्मग्रंथों से अधिक लोग अब व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय के संदेशों पर विश्वास करने लगे हैं। सत्य की जगह वायरल पोस्ट ने ले ली है और तर्क की जगह उत्तेजना ने।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ किसी घटना के बाद लोग यह जानने में अधिक रुचि रखते हैं कि अपराधी कौन था नहीं, बल्कि उसका धर्म क्या था। पीड़ित का दर्द भी उसकी पहचान देखकर तय किया जाता है। न्याय भी कभी-कभी विचारधारा के चश्मे से देखा जाने लगता है।
भारत की आत्मा इससे भिन्न रही है। यह वह भूमि है जहाँ ऋषियों ने कहा— "वसुधैव कुटुम्बकम्"। जहाँ शास्त्रार्थ होते थे, शत्रुता नहीं। जहाँ विचारों का संघर्ष होता था, व्यक्तियों का विनाश नहीं। जहाँ विविधता को संकट नहीं, शक्ति माना गया।
आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि पुराने मूल्यों की पुनर्स्थापना की है। आवश्यकता यह समझने की है कि यदि धर्म हमें बेहतर मनुष्य नहीं बना रहा, तो हम धर्म का अर्थ ही नहीं समझ पाए हैं। यदि हमारी आस्था हमें दूसरों से घृणा करना सिखा रही है, तो समस्या आस्था में नहीं, उसकी हमारी व्याख्या में है।
सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि हर व्यक्ति शांति चाहता है, लेकिन अपनी शर्तों पर। हर व्यक्ति प्रेम चाहता है, लेकिन अपने समूह के लिए। हर व्यक्ति न्याय चाहता है, लेकिन पहले अपने पक्ष के लिए।
इतिहास गवाह है— सभ्यताएँ बाहरी आक्रमणों से कम, भीतर की नफरत से अधिक नष्ट हुई हैं। कोई भी राष्ट्र तब तक महान नहीं बन सकता, जब तक उसके नागरिक अपनी-अपनी पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि न मानें।
इसलिए आज प्रश्न यह नहीं है कि मजहब क्या सिखाता है। प्रश्न यह है कि उसके अनुयायी क्या सीखना चाहते हैं।
क्योंकि सच यह है कि ईश्वर ने कभी मनुष्यों के बीच दीवारें नहीं खड़ी कीं; दीवारें हमने खड़ी कीं। उसने धरती बनाई, हमने सीमाएँ बनाईं। उसने मानव बनाया, हमने पहचानें गढ़ीं। उसने प्रेम दिया, हमने घृणा का व्यापार शुरू कर दिया।
और फिर बड़े गर्व से कहते रहे—
"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना..."
शायद हमारे समय का सबसे तीखा व्यंग्य यही है कि यह पंक्ति जितनी बार बोली गई, उतनी बार उसका अर्थ भुला दिया गया।
Rajendra Nath tiwari272001

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